सबद 67 (शुक्ल हंस): श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी
शब्दवाणी का सबद 67 (शुक्ल हंस) "श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी" से शुरू होता है। इसमें 49 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी, म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयो।अठगां ठंगण अदगां दागण, अगजा गंजण, ऊनथ नाथन, अनू निवावण।कांहि को मैं खैंकाल कीयों, कांही सुरग मुरादे देसां, कांही दौरे दीयूं।होम करीलो दिन ठाविलो, सहस रचीलो, छपर नीबी दूणपूरूं।गांव सुंदरियो छीलै बालदियो, छन्दे मन्दे बाल दीयों।अजम्हे होता नागो बाड़ै, रैण थंभै गढ़ गागरणों।कुं कुं कंचन सोरठ मरहठ, तिलंग दीप गढ़ गागरणों।गढ़ दिल्ली कंचन अर दुणायर, फिर फिर दुनिया परखे लीयो।थटे भवणिया अरू गुजरात, आछे जांई सवा लाख मालवै।पर्वत मांडू मांही ज्ञान कथूं।खुरासाण गढ़ लंका भीतर, गूगल खेऊं पैर ठयो।ईडर कोट उजैणी नगरी, काहिंदा सिंध पुरी विश्राम लीयो।कांय रे सायरा गाजै बाजै, घुरै घुर हरै करै इवांणी आप बलूं।किहिं गुण सायरा मीठा होता, किहिं अवगुण हुआ खार खरूं।जद वासग नेतो मेर मथाणी, समंद बिरोल्यो ढ़ोय उरू।रैणायर डोहण पाणी पोहण, असुरां बेधी करण छलूं।दहशिर ने जद वाचा दीन्ही, तद म्हे मेल्ही अनंत छलूं।दहशिर का दश मस्तक छेद्या, ताणूं बाणूं लड़ूं कलूं।सोखा बाणूं एक बखाणूं, जाका बहु परमाणूं, निश्चय राखी तास बलूं।राय विष्णु से वाद न कीजै, कांय बधारो दैत्य कुलूं।म्हे पण म्हेई थे पण थेई, सा पुरूषा की लच्छूं कुलूं।गाजै गुड़कै से क्यूं वीहै, जेझल जाकी संहस फणूं।मेरे माय न बाप न बहण न भाई, साख न सैण न लोक जणों।वैकुण्ठे विश्वास विलंबण, पार गिराये मात खिणूं।विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी, विष्णु भणन्ता अनन्त गुणूं।सहंसे नावें, सहंसै ठावै, सहंसै गावै, गाजे बाजे हीरे नीरे।गगन गहीरे चवदा भवणें, तिहूं तृलोके, जम्बू दीपे, सप्त पताले।अई अमाणों तत समाणों, गुरु फरमाणों, बहु परमाणों।अइयां उइयां निरजत सिरजत।नान्ही मोटी जीया जूणीं, एति सास फुरंतै सारूं।कृष्णी माया घन बरषंता, म्हे अगिणि गिणूं फूहारूं।कुण जाणै म्है देव कुदेवों, कुण जाणै म्है अलख अभेवों।कुण जाणें म्है सुरनर देवों, कुण जाणै म्हारा पहला भेवों।कुण जाणै म्हे ग्यानी के ध्यानी, कुण जाणै म्हे केवल ज्ञानी।कुण जाणे म्हे ब्रह्म ज्ञानी, कुण जाणें म्है ब्रह्माचारी।कुण जाणै म्हे अल्प अहारी, कुण जाणै म्हे पुरुष क नारी।कुण जाणै म्हे बाद विवादी, कुण जाणै म्हे लुब्ध सवादी।कुण जाणै म्हे जोगी के भोगी, कुण जाणै म्हे आप संयोगी।कुण जाणै म्हे भावत भोगी, कुण जाणै म्है लील पती।कुण जाणें म्हे सूम क दाता, कुण जाणें म्हे सती कुसती।आपही सूम र आप ही दाता, आप कुसती आप सती।नव दाणूं निरवंश गुमाया, कैरव किया फती फती।राम रूप कर राक्षस हड़िया, बाण के आगे वनचर जुड़िया।तद म्हे राखी कमल पती, दया रूप म्हे आप बखाणां।संहार रूप म्हे आप हती।सोलै सहंस नवरंग गोपी, भोलम भालम टोलम टालम।छेलम छलम, सहजै राखीलों, म्हे कन्हड़ बालो आप जती।छेलवियां म्हे तपी तपेश्वर, छेलब कीया फती फती।राखण मतां तो पड़दै राखां, ज्यूं दाहै पांन बणास पति।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 67 कौन सा है?
सबद 67 की पहली पंक्ति है: ओ३म् श्री गढ़ आल मोत पुर पाटण भुंय नागोरी, म्हे ऊंडे नीरे अवतार लीयो।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
