सबद 59: पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं
शब्दवाणी का सबद 59 "पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं" से शुरू होता है। इसमें 6 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं, भूला भूले झंख्या आलूं।अह निश आव घटंती जावै, तेरा सास सबी कसवारूं।कइया चंदा कइया सूरूं, कइया काल बजावत तूरूं।उर्द्धक चन्दा निरधक सूरूं, सुन घट काल बजावत तूरूं।ताछै बहुत हुई कसवारूं।रक्तस बिन्दू परहस निंदू, आप सहै तेपण बूझे नहीं गवारूं।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 59 कौन सा है?
सबद 59 की पहली पंक्ति है: ओ३म् पढ़ कागल वेदूं शास्त्र शब्दूं, भूला भूले झंख्या आलूं।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
