सबद 34: फुंरण फुंहारे कृष्णी माया
शब्दवाणी का सबद 34 "फुंरण फुंहारे कृष्णी माया" से शुरू होता है। इसमें 9 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् फुंरण फुंहारे कृष्णी माया, घण बरसंता सरवर नीरे।तिरी तिरन्तै तीर, जे तिस मरै तो मरियो।अन्नों धन्नों दूधूं दहीयूं, घीयूं मेऊ टेऊ जे लाभंता।भूख मरै तो जीवन ही बिन सरियो।खेत मुक्तले कृष्णों अर्थो, जे कंध हरे तो हरियो।विष्णु जपन्ता जीभ जु थाकै, तो जीभड़ियां बिन सरीयूं।हरि हरि करता हरकत आवै, तो ना पछतावो करियो।भीखी लो भिखीयारी लो, जे आदि परम तत लाधों।जांकै बाद विराम विरांसो सांसो, तानै कौण कहसी साल्हिया साधों।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 34 कौन सा है?
सबद 34 की पहली पंक्ति है: ओ३म् फुंरण फुंहारे कृष्णी माया, घण बरसंता सरवर नीरे।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
