सबद 98: जिहिं गुरु कै खिण ही ताऊं
शब्दवाणी का सबद 98 "जिहिं गुरु कै खिण ही ताऊं" से शुरू होता है। इसमें 12 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् जिहिं गुरु कै खिण ही ताऊं, खिण ही सीऊं।खिण ही पवणा खिण ही पाणी, खिण ही मेघ मंडाणों।कृष्ण करंता बार न होई, थलसिर नीर नीवाणों।भूला प्राणी विष्णु जंपो रे, ज्यूं मौत टले जिरवाणों।भीगा है पण भेद्या नांही, पाणी मांह पखाणों।जीवत मरो रे जीवत मरो, जिन जीवन की विध जांणी।जे कोई आवै हो हो कर, आप जै हुइये पांणी।जाकै बहुती नवणी बहुती खवणी, बहुती क्रिया समाणी।जांकी तो निज निर्मल काया, जोय जोय देखो ले चढ़ियो अस्मानी।यह मढ़ देवल मूल न जोयबा, निज कर जंपो पिराणी।अनन्त रूप जोवो अभ्यागत, जिहिं का खोज लहो सुरवाणी।सेतम सेतूं जेरज जेरूं, इंडस इंडूं, अइयालो उरध जे खैणी।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 98 कौन सा है?
सबद 98 की पहली पंक्ति है: ओ३म् जिहिं गुरु कै खिण ही ताऊं, खिण ही सीऊं।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
