
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा (Purushottam Mas Mahatmya Katha)
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पुरुषोत्तम मास माहात्म्य ? पुराणों में अधिकमास अर्थात
भगवान विष्णु, नारायण, नरसिंह और जगन्नाथ जी की आरती, स्तोत्र, भजन और एकादशी व्रत कथाएँ।

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पुरुषोत्तम मास माहात्म्य ? पुराणों में अधिकमास अर्थात

कल्पवृक्ष के समान भक्तजनों के मनोरथ को पूर्ण करने वाले वृन्दावन की

सूतजी बोले, ‘हे तपोधन! आप लोगों ने जो प्रश्न किया है वही

सूतजी बोले, ‘हे तपोधन! विष्णु और श्रीकृष्ण के संवाद को सुन सन्तुष्टमन

नारद जी बोले, ‘हे तपोनिधे! परम क्रोधीदुर्वासा मुनि ने विचार करके उस

ऋषिगण बोले, ‘हे महाभाग! नर के मित्र नारायण नारद के प्रति जो

नारद जी बोले, ‘हे महाभाग! हे तपोनिधे! इस प्रकार अधिमास के वचनों

नारदजी बोले, ‘भगवान् गोलोक में जाकर क्या करते हैं? हे पापरहित! मुझ

सूतजी बोले, ‘तदनन्तर विस्मय से युक्त नारद मुनि ने मेधावी ऋषि की

नारदजी बोले, ‘सब मुनियों को भी जो दुष्कर कर्म है ऐसा बड़ा

नारदजी बोले, ‘जब भगवान् शंकर चले गये तब हे प्रभो! उस बाला

ऋषि लोग बोले, ‘हे सूत! हे महाभाग! हे सूत! हे बोलने वालों

श्रीनारायणजी बोले, ‘इसके बाद चिन्ता से आतुर राजा दृढ़धन्वा के घर बाल्मीकि

श्रीनारायण बोले, ‘नारद! सुदेव शर्मा ब्राह्मण हाथ जोड़कर गद्गद स्वर से भक्तवत्सल

श्रीनारायण बोले, ‘हे महाप्राज्ञ! हे नारद! बाल्मीकि ऋषि ने जो परम अद्भुत

नारदजी बोले, ‘हे कृपा के सिन्धु! उसके बाद जागृत अवस्था को प्राप्त

नारद जी बोले, ‘हे तपोनिधे! उसके बाद साक्षात् भगवान् बाल्मीकि मुनि ने

पद्मिनी एकादशी का महत्त्व: धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि, हे जनार्दन! आपने

श्रीसूत जी बोले, ‘हे तपस्वियो! इस प्रकार कहते हुए श्रीनारायण को मुनिश्रेष्ठ

सूतजी बोले, ‘हे विप्रो! नारायण के मुख से राजा दृढ़धन्वा के पूर्वजन्म