सबद 19: रूप अरूप रमूं पिण्डे ब्रह्मण्डे
शब्दवाणी का सबद 19 "रूप अरूप रमूं पिण्डे ब्रह्मण्डे" से शुरू होता है। इसमें 5 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् रूप अरूप रमूं पिण्डे ब्रह्मण्डे, घट घट अघट रहायो।अनन्त जुगां में अमर भणीजूं, ना मेरे पिता न मायो।ना मेरे माया न छया, रूप न रेखा, बाहर भीतर अगम अलेखा।लेखा एक निरंजन लेसी, जहां चीन्हों तहां पायो।अड़सठ तीर्थ हिरदा भीतर, कोई कोई गुरु मुख बिरला न्हायो।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 19 कौन सा है?
सबद 19 की पहली पंक्ति है: ओ३म् रूप अरूप रमूं पिण्डे ब्रह्मण्डे, घट घट अघट रहायो।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
