सबद 54: अरण विवाणे रै रिव भांणे
शब्दवाणी का सबद 54 "अरण विवाणे रै रिव भांणे" से शुरू होता है। इसमें 8 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् अरण विवाणे रै रिव भांणे, देव दिवाणें, विष्णु पुराणें।बिंबा बांणे सूर उगाणें, विष्णु विवाणे कृष्ण पुराणे।कांय झंख्यो तै आल पिराणी, सुर नर तणों सबेरूं।इंडो फूटो बेला बरती, ताछै हुई बेर अबेरूं।मेरे परे सो जोयण बिंबा लोयण, पुरुष भलो निज बाणी।बांकी म्हारी एका जोती, मनसा सास विवांणी।को आचारी आचारे लेणा, संजमें शीले सहज पतीना।तिहि आचारी नै चीन्हत कौण, जांकी सहजै चूकै आवागौण।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 54 कौन सा है?
सबद 54 की पहली पंक्ति है: ओ३म् अरण विवाणे रै रिव भांणे, देव दिवाणें, विष्णु पुराणें।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
