सबद 97: विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी
शब्दवाणी का सबद 97 "विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी" से शुरू होता है। इसमें 13 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी, जो मन मांनै रे भाई।दिन का भूला रात न चेता, कांय पड़ा सूता आस किसी मन थाई।तेरी कुड़काची लगवाड़ घणों छै, कुशल किसी मन भाई।हिरदै नाम विष्णु को जंपो, हाथे करो टवाई।हर पर हरि की आंण न मानी, भूला भूल जपी महमाई।पाहन प्रीत फिटाकर प्राणी, गुरु बिन मुक्त न जाई।पंच करोड़ी ले प्रहलाद उतरियो, जिन खरतर करी कमाई।सात करोड़ी ले राजा हरिचंद उतरियो,तारा दे रोहिताश हरिचंद हाटो हाट बिकाई।नव क्रोड़ी राव युधिष्ठिर ले उतरियो, धन धन कुंती माईर्।बारा क्रोड़ समाहन आयो, प्रहलादा सूं वाचा कवल जु थाई।किसकी नारी वस्त पियारी, किसका बहन रू भाई।भूली दुनिया मर मर जावै, ना चीन्हों सुरराई।पाहण नाऊं लोहा सक्ता, नुगरा चीन्हत कांई।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 97 कौन सा है?
सबद 97 की पहली पंक्ति है: ओ३म् विष्णु विष्णु तूं भण रे प्राणी, जो मन मांनै रे भाई।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
