सबद 116: आयसां मृगछला पावोड़ी कांय फिरावों
शब्दवाणी का सबद 116 "आयसां मृगछला पावोड़ी कांय फिरावों" से शुरू होता है। इसमें 10 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् आयसां मृगछला पावोड़ी कांय फिरावों,मतूंत आयसां ऊगंतो भांण थंभाऊं।दोनों परबत मेर उजागर, मतूंत अध बिच आन भिड़ाऊं।तीन भवन की राही रूक्मण, मतूंत थलसिर आंण बसाऊं।नवसै नदी निवासी नाला, मतूंत थलसिर आन बहाऊं।सीत बहोड़ी लंका तोड़ी, ऐसो कियो संग्रामूं।जां बाणै म्हें रावण मार्यो, मतूंत कोवड सोखा हाथे सांह।कैरू पांडव जादम जोधा, मतूंत गढ़ हथनापुर आंणि दिखाऊं।अति अनेरा बाग सवाया, मतूंत सोवन म्रिगा करि चराऊं।अति अनेरा पावस पाणी, मतूंत घण पाहण बरसाऊं।आयसां! मृगछला पावोड़ी कांय फिरावो, मतूंतो उगंतो भाण थंभाऊं।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 116 कौन सा है?
सबद 116 की पहली पंक्ति है: ओ३म् आयसां मृगछला पावोड़ी कांय फिरावों,मतूंत आयसां ऊगंतो भांण थंभाऊं।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
