सबद 107: सहजे शीले सहज बिछयो
शब्दवाणी का सबद 107 "सहजे शीले सहज बिछयो" से शुरू होता है। इसमें 6 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् सहजे शीले सहज बिछयो, उनमन रह्या उदासूं।जुगे जुगन्तर भवे भवन्तर, कहो कहाणी कासूं।रवि ऊगा जब उल्लू अन्धा, दुनिया भया उजासूं।सतगुरु मिलियो सत पंथ बतायो भ्रान्त चुकाई, सुगरा भयो विश्वासूं।जां जां जांण्यो तहां प्रवाण्यों, सहज समाणों, जिहिं के मन की पूगी आसूं।जहां गुरु न चीन्हों पन्थ न पायो, तहां गल पड़ी परासूं।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
सभी सबद
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 107 कौन सा है?
सबद 107 की पहली पंक्ति है: ओ३म् सहजे शीले सहज बिछयो, उनमन रह्या उदासूं।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
