सबद 44: खरतर झोली खरतर कंथा
शब्दवाणी का सबद 44 "खरतर झोली खरतर कंथा" से शुरू होता है। इसमें 7 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् खरतर झोली खरतर कंथा, कांध सहै दुख भारूं।जोग तणी थे खबर नहीं पाई, कांय तज्या घर बारूं।ले सूई धागा सीवण लागा, करड़ कसीदी मेखलियों।जड़ जटा धारी लंघै न पारी, बाद विवाद बे करणों।थे वीर जपो बेताल धियावो, कांय न खोजो तत कणों।आयसां डंडत डंडूं मुंडत मूंडूं, मुंडत माया मोह किसो।भरमी वादी वादे भूला, कांय न पाली जीव दयों।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 44 कौन सा है?
सबद 44 की पहली पंक्ति है: ओ३म् खरतर झोली खरतर कंथा, कांध सहै दुख भारूं।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
