सबद 46: जिहिं जोगी के मन ही मुद्रा
शब्दवाणी का सबद 46 "जिहिं जोगी के मन ही मुद्रा" से शुरू होता है। इसमें 9 पंक्तियाँ हैं। नीचे गुरु जम्भेश्वर भगवान का यह सबद मूल पाठ में दिया गया है।
ओ३म् जिहिं जोगी के मन ही मुद्रा, तन ही कंथा पिण्डे अगन थंभायो।जिहिं जोगी की सेवा कीजै, तूठों भव जल पार लंघावै।नाथ कहावै मर मर जावै, से क्यों नाथ कहावै।नान्ही मोटी जीवां जूणी, निरजत सिरजत फिर फिर पूठा आवै।हम ही रावल हम ही जोगी, हम राजा के रायों।जो ज्यूं आवै सो त्यूं थरपां, सांचा सूं सत भायों।पाप न छिपां पुण्य न हारा, करां न करतब लावां बारूं।जीव तड़े को रिजक न मेटूं, मूवां परहथ सारूं।दौरे भिस्त बिचालै ऊभा, मिलिया काम सवारूं।
शब्दवाणी का पाठ
बिश्नोई समाज में हवन के समय शब्दवाणी के सबदों का पाठ किया जाता है और हर सबद पूरा होने पर "स्वाहा" बोलकर आहुति दी जाती है। अमावस्या के व्रत, जागरण और पाहल के समय भी सबदों का पाठ होता है। अगली अमावस्या का समय बिश्नोई कैलेंडर में देखें। और पढ़ें: बिश्नोई समाज के 29 नियम • जाम्भोजी का इतिहास • जम्भेश्वर भगवान आरती
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शब्दवाणी का सबद 46 कौन सा है?
सबद 46 की पहली पंक्ति है: ओ३म् जिहिं जोगी के मन ही मुद्रा, तन ही कंथा पिण्डे अगन थंभायो।
शब्दवाणी में कुल कितने सबद हैं?
शब्दवाणी में गुरु जम्भेश्वर भगवान के 120 सबद हैं। सभी सबदों की सूची शब्दवाणी पेज पर है।
