रामदेव जी का समाधि दिवस 2027: 11 सितंबर 2027, शनिवार (भाद्रपद शुक्ल एकादशी, रामदेवरा)
तारीखें जम्भ भक्ति के पंचांग (सूर्योदय की तिथि) से हैं और हर साल अपने आप अगले साल की हो जाती हैं।
बाबा रामदेव जी राजस्थान के सबसे ज़्यादा पूजे जाने वाले लोकदेवताओं में से हैं। हिंदू उन्हें भगवान कृष्ण का अवतार मानते हैं और मुस्लिम भक्त रामसा पीर के नाम से पूजते हैं। उनका मुख्य धाम जैसलमेर ज़िले में पोकरण के पास रामदेवरा (रुणिचा) है, जहाँ भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से भादवा मेला भरता है और लाखों लोग पैदल चलकर दर्शन करने आते हैं। छुआछूत के खिलाफ़ और सबको बराबर मानने की उनकी सीख के कारण हर समाज में उनकी गहरी आस्था है।
बाबा रामदेव जी: एक नज़र में
| पिता और माता | अजमल जी तंवर और मैणादे |
| वंश | तंवर राजपूत |
| जन्म स्थान | ज़्यादातर स्रोतों के अनुसार बाड़मेर ज़िले का उंडू-काश्मीर गाँव |
| पत्नी | नेतलदे, अमरकोट के दलजी सोढा की पुत्री |
| मुख्य धाम | रामदेवरा (रुणिचा), पोकरण, जैसलमेर |
| समाधि | रामदेवरा में, भाद्रपद शुक्ल एकादशी को। कई स्रोत इसे 1458 ई. बताते हैं। |
| मुख्य मेला | भादवा मेला, भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से दशमी तक |
| दूसरे नाम | रामसा पीर, रामदेव पीर, रुणिचा रा धणी, पीरों के पीर |
| प्रतीक | पगल्ये (चरण चिह्न) और नेजा (ध्वजा) |
बाबा रामदेव जी की कथा
लोक कथाओं के अनुसार अजमल जी तंवर और रानी मैणादे संतान न होने से दुखी थे। अजमल जी द्वारकाधीश के बड़े भक्त थे और द्वारका जाकर उन्होंने भगवान से विनती की। मान्यता है कि भगवान ने वरदान दिया कि वे स्वयं उनके घर पुत्र रूप में आएँगे। इसके बाद अजमल जी के घर पहले वीरमदेव और फिर रामदेव जी का जन्म हुआ।
बचपन से ही रामदेव जी के चमत्कारों (परचों) की कथाएँ प्रचलित हैं। लोक मान्यता में उन्होंने भैरव नाम के राक्षस का अंत करके लोगों को उसके डर से मुक्त किया। एक प्रसिद्ध कथा में मक्का से पाँच पीर उनकी परीक्षा लेने आए, और रामदेव जी के चमत्कार देखकर उन्होंने उन्हें “पीरों का पीर” माना। इसी से वे रामसा पीर कहलाए।
रामदेव जी ने ऊँच-नीच और छुआछूत का खुलकर विरोध किया। उनकी शिष्या डाली बाई मेघवाल समाज से थीं, जिन्हें उन्होंने बहन जैसा मान दिया। उन्होंने कामड़िया पंथ की नींव रखी, जिसके भक्त आज भी उनके भजन गाते हैं। भाद्रपद शुक्ल एकादशी को उन्होंने रुणिचा में जीवित समाधि ली। डाली बाई की समाधि भी उन्हीं के पास है।
पूजा और परंपराएँ
- पगल्ये की पूजा: घरों और थानों में रामदेव जी के चरण चिह्न (पगल्ये) की पूजा होती है।
- नेजा चढ़ाना: मन्नत पूरी होने पर भक्त रंगीन ध्वजा (नेजा) चढ़ाते हैं।
- जम्मा जागरण: रात भर रामदेव जी के भजन और जागरण को जम्मा कहते हैं।
- पैदल यात्रा: भादवा महीने में राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश से लाखों जातरू पैदल रामदेवरा पहुँचते हैं। रास्ते भर सेवा शिविर लगते हैं।
- तेरहताली नृत्य: कामड़ समाज की महिलाएँ रामदेव जी की स्तुति में तेरहताली नृत्य करती हैं।
- भजन और हरजस: जम्मा जागरण में रामदेव जी के भजन और डाली बाई व हरजी भाटी जैसे भक्तों के रचे पद गाए जाते हैं।
रामदेवरा मेला कब है?
भादवा मेला भाद्रपद शुक्ल द्वितीया, यानी बाबा री बीज से शुरू होता है और दशमी तक चलता है। एकादशी को बाबा का समाधि दिवस माना जाता है। आने वाले सालों की तारीखें:
| पर्व या मेला | तारीख | तिथि | स्थान |
|---|---|---|---|
| बाबा रामदेव जयंती (बाबा री बीज) और भादवा मेला शुरू | 2 सितंबर 2027, गुरुवार | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | रामदेवरा (रुणिचा), जैसलमेर |
| बाबा रामदेव जयंती (बाबा री बीज) और भादवा मेला शुरू | 22 अगस्त 2028, मंगलवार | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | रामदेवरा (रुणिचा), जैसलमेर |
| बाबा रामदेव जयंती (बाबा री बीज) और भादवा मेला शुरू | 10 सितंबर 2029, सोमवार | भाद्रपद शुक्ल द्वितीया | रामदेवरा (रुणिचा), जैसलमेर |
| रामदेव जी का समाधि दिवस | 11 सितंबर 2027, शनिवार | भाद्रपद शुक्ल एकादशी | रामदेवरा |
| रामदेव जी का समाधि दिवस | 30 अगस्त 2028, बुधवार | भाद्रपद शुक्ल एकादशी | रामदेवरा |
| रामदेव जी का समाधि दिवस | 18 सितंबर 2029, मंगलवार | भाद्रपद शुक्ल एकादशी | रामदेवरा |
रामदेवरा कैसे पहुँचें?
- रामदेवरा पोकरण से लगभग 12 किलोमीटर दूर है और जोधपुर-जैसलमेर रेल मार्ग पर इसका अपना रेलवे स्टेशन है।
- जोधपुर और जैसलमेर से रामदेवरा के लिए बसें चलती हैं। मेले के दिनों में विशेष रेलगाड़ियाँ और बसें भी चलाई जाती हैं।
- मंदिर परिसर के पास बाबा का बनवाया राम सरोवर और परचा बावड़ी भी दर्शनीय हैं।
- मेले में भारी भीड़ रहती है, इसलिए बच्चों और बुज़ुर्गों का खास ध्यान रखें और पानी साथ रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बाबा रामदेव जी को रामसा पीर क्यों कहते हैं?
लोक कथा के अनुसार मक्का से आए पाँच पीर उनके चमत्कार देखकर उन्हें पीरों का पीर मान गए। तभी से मुस्लिम भक्त उन्हें रामसा पीर कहते हैं और हिंदू कृष्ण का अवतार मानते हैं।
रामदेव जयंती कब मनाई जाती है?
भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को, जिसे बाबा री बीज कहते हैं। इसी दिन से रामदेवरा में भादवा मेला शुरू होता है। इस साल की तारीख ऊपर दी गई है।
रामदेव जी ने समाधि कब ली?
भाद्रपद शुक्ल एकादशी को रुणिचा (रामदेवरा) में। कई ऐतिहासिक स्रोत इसका साल 1458 ई. बताते हैं।
रामदेव जी के माता-पिता कौन थे?
पिता अजमल जी तंवर और माता मैणादे। उनके बड़े भाई का नाम वीरमदेव था।
डाली बाई कौन थीं?
डाली बाई मेघवाल समाज की रामदेव जी की परम भक्त थीं। रामदेव जी ने उन्हें बहन का मान दिया। उनकी समाधि भी रामदेवरा में बाबा की समाधि के पास है।
रामदेवरा कहाँ है?
राजस्थान के जैसलमेर ज़िले में पोकरण के पास। जोधपुर-जैसलमेर रेल मार्ग पर रामदेवरा रेलवे स्टेशन है।
यह जानकारी लोक परंपरा, इतिहास की पुस्तकों और समाज में प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। कई बातों पर अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा अंतर मिलता है, ऐसी जगह हमने यह साफ़ लिखा है। कोई जानकारी गलत लगे या आप कुछ जोड़ना चाहें, तो हमें बताएँ। जाँच के बाद हम इसे ठीक करेंगे।
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