तारीखें जम्भ भक्ति के पंचांग (सूर्योदय की तिथि) से हैं और हर साल अपने आप अगले साल की हो जाती हैं।
पाबूजी राठौड़ मारवाड़ के लोकदेवता हैं, जिन्हें गायों और ऊँटों का रक्षक माना जाता है। उन्होंने एक चारण स्त्री की गायें छुड़ाने के लिए अपने विवाह के फेरे बीच में छोड़ दिए और युद्ध में प्राण दिए। उनका मुख्य थान कोलू (कोलूमंड) में है, जहाँ चैत्र अमावस्या को मेला भरता है। राईका-रेबारी समाज में उनकी विशेष आस्था है, और भोपे रावणहत्था बजाकर पाबूजी की फड़ बाँचते हैं।
पाबूजी: एक नज़र में
| पिता | धांधल जी राठौड़ |
| वंश | राठौड़ |
| मुख्य थान | कोलू (कोलूमंड), फलोदी क्षेत्र, मारवाड़। कुछ स्रोतों में इसे बाड़मेर से जोड़ा गया है। |
| जन्म | स्रोतों में अलग-अलग साल मिलते हैं (विक्रम संवत 1313 या 1239 ई.) |
| पत्नी | अमरकोट के सूरजमल सोढा की पुत्री |
| घोड़ी | केसर कालमी, जो देवल चारणी की थी |
| मुख्य मेला | चैत्र अमावस्या को कोलू में |
| मान्यता | लक्ष्मण का अवतार, ऊँटों के देवता, गायों के रक्षक, पंच पीरों में एक |
पाबूजी की कथा
कथा के अनुसार देवल चारणी ने अपनी केसर कालमी घोड़ी पाबूजी को इस वचन पर दी थी कि वे उसकी गायों की रक्षा करेंगे। पाबूजी के विवाह के दिन, जब फेरे चल रहे थे, खबर आई कि जींदराव खींची देवल की गायें ले गया है। वचन निभाने के लिए पाबूजी फेरे बीच में ही छोड़कर निकल पड़े।
उन्होंने गायें छुड़ा लीं, पर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। इसी त्याग और वचनबद्धता के कारण वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाने लगे। लोक मान्यता है कि मारवाड़ में ऊँट लाने का श्रेय भी पाबूजी को है, इसलिए ऊँट पालने वाले राईका-रेबारी समाज उन्हें ऊँटों का देवता मानता है। ऊँट या दूसरे पशु बीमार होने पर उनके नाम की तांती बाँधी जाती है।
पाबूजी की फड़
फड़ कपड़े पर बनी लंबी चित्र-कथा होती है। पाबूजी की फड़ लगभग 30 फुट लंबी और 5 फुट चौड़ी होती है, जिसमें उनके जीवन की घटनाएँ चित्रों में दिखाई जाती हैं। भोपा और भोपी रात में इस फड़ के सामने रावणहत्था बजाते हुए गीतों में पूरी कथा सुनाते हैं, जिसे फड़ बाँचना कहते हैं। यह राजस्थान की सबसे पुरानी लोक कलाओं में से एक है।
पंच पीर कौन हैं?
राजस्थान में पाँच लोकदेवताओं को पंच पीर कहा जाता है: पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और गोगाजी। इनके बारे में एक प्रसिद्ध दोहा भी प्रचलित है, जिसमें इन पाँचों को पधारने का आमंत्रण दिया जाता है। बाबा रामदेव जी और गोगाजी के बारे में भी पढ़ें।
कोलू मेला कब है?
| पर्व या मेला | तारीख | तिथि | स्थान |
|---|---|---|---|
| कोलू का मेला | 6 अप्रैल 2027, मंगलवार | चैत्र अमावस्या | कोलू (फलोदी) |
| कोलू का मेला | 26 मार्च 2028, रविवार | चैत्र अमावस्या | कोलू (फलोदी) |
| कोलू का मेला | 15 मार्च 2029, गुरुवार | चैत्र अमावस्या | कोलू (फलोदी) |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पाबूजी को ऊँटों का देवता क्यों कहते हैं?
लोक मान्यता है कि मारवाड़ में ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को है। इसलिए ऊँट पालने वाले राईका-रेबारी समाज उन्हें ऊँटों का देवता मानता है और पशु बीमार होने पर उनकी तांती बाँधता है।
पाबूजी की फड़ क्या है?
कपड़े पर बनी लगभग 30 फुट लंबी चित्र-कथा, जिसे भोपे रावणहत्था बजाकर गीतों में बाँचते हैं। इसमें पाबूजी के जीवन की घटनाएँ होती हैं।
पाबूजी का मेला कब और कहाँ लगता है?
चैत्र अमावस्या को कोलू (कोलूमंड) में। इस साल की तारीख ऊपर दी गई है।
पाबूजी की घोड़ी का नाम क्या था?
केसर कालमी, जो देवल चारणी ने उन्हें दी थी।
पंच पीर में कौन-कौन हैं?
पाबूजी, हड़बूजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और गोगाजी।
यह जानकारी लोक परंपरा, इतिहास की पुस्तकों और समाज में प्रचलित मान्यताओं पर आधारित है। कई बातों पर अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा अंतर मिलता है, ऐसी जगह हमने यह साफ़ लिखा है। कोई जानकारी गलत लगे या आप कुछ जोड़ना चाहें, तो हमें बताएँ। जाँच के बाद हम इसे ठीक करेंगे।
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