कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी, देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। मान्यता है कि आषाढ़ की देवशयनी एकादशी से चार महीने योगनिद्रा में रहने के बाद भगवान विष्णु इसी दिन जागते हैं। इसी के साथ चातुर्मास पूरा होता है और शादी-ब्याह, गृह प्रवेश जैसे शुभ काम फिर शुरू होते हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में इसे देव उठनी ग्यारस भी कहा जाता है। नीचे दी गई तारीखें और समय हर साल अपने आप अगले साल के अनुसार बदल जाते हैं।
देवउठनी एकादशी 2026: तारीख और समय
| एकादशी | देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी, कार्तिक शुक्ल एकादशी |
| गृहस्थ (स्मार्त) व्रत | 20 नवंबर 2026, शुक्रवार |
| वैष्णव व्रत | 21 नवंबर 2026, शनिवार |
| एकादशी तिथि शुरू | 20 नवंबर, सुबह 7:16 |
| एकादशी तिथि समाप्त | 21 नवंबर, सुबह 6:32 |
| पारण (गृहस्थ व्रत) | 21 नवंबर, दोपहर 1:10 से 3:18 |
| पारण (वैष्णव व्रत) | 22 नवंबर, सुबह 6:48 से 8:56 |
| सूर्योदय और सूर्यास्त (20 नवंबर) | सुबह 6:47 और शाम 5:25 |
| तुलसी विवाह (द्वादशी) | 21 नवंबर 2026, शनिवार |
| विक्रम संवत | 2083 |
समय नई दिल्ली के अनुसार है और जम्भ भक्ति की अपनी खगोलीय गणना (लाहिड़ी अयनांश) से निकाला गया है। एकादशी तिथि के शुरू और खत्म होने का समय पूरे भारत में एक ही रहता है, पर पारण का समय सूर्योदय पर निर्भर करता है, इसलिए दूसरे शहरों में यह कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। अपने शहर का समय आज का पंचांग में देखें।
20 नवंबर या 21 नवंबर: व्रत किस दिन रखें?
इस बार एकादशी तिथि 20 नवंबर को सूर्योदय (सुबह 6:47) के बाद, सुबह 7:16 पर शुरू होगी और 21 नवंबर को सूर्योदय से पहले, सुबह 6:32 पर खत्म हो जाएगी। यानी किसी भी दिन के सूर्योदय के समय एकादशी नहीं रहेगी। ऐसी स्थिति में गृहस्थ (स्मार्त) लोग 20 नवंबर को व्रत रखते हैं, क्योंकि उस दिन लगभग पूरे दिन और रात एकादशी रहती है। वैष्णव परंपरा मानने वाले अगले दिन, 21 नवंबर को व्रत रखते हैं।
ज़्यादातर घरों में 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को व्रत और शाम को देव उठाने की पूजा होगी। अगर आपके परिवार, गाँव या मंदिर की परंपरा अलग है, तो उसी का पालन करें।
देवउठनी एकादशी का महत्व
- चातुर्मास का समापन: देवशयनी एकादशी से शुरू हुए चार महीने इसी दिन पूरे होते हैं।
- शुभ कामों की शुरुआत: विवाह, सगाई, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे संस्कार इसके बाद फिर से किए जाते हैं। राजस्थान में इस दिन को अबूझ सावा (बिना मुहूर्त देखे शुभ दिन) मानकर बहुत सी शादियाँ होती हैं।
- तुलसी विवाह: इसी समय तुलसी जी का विवाह भगवान शालिग्राम (विष्णु) से कराया जाता है।
- भीष्म पंचक: कार्तिक शुक्ल एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक के पाँच दिन भीष्म पंचक कहलाते हैं, जिनमें व्रत और दान का खास महत्व है।
देवउठनी एकादशी पूजा विधि
सुबह की पूजा
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। पीले कपड़े शुभ माने जाते हैं।
- भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक जलाकर व्रत का संकल्प लें।
- भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, फल, धूप और नैवेद्य अर्पित करें। तुलसी दल एक दिन पहले तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और विष्णु चालीसा का पाठ करें।
शाम को देव उठाने की पूजा
- सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूजा की जगह या आँगन को साफ करें। गेरू या आटे से चौक बनाकर भगवान के चरणों के निशान बनाएँ।
- चौक पर गन्ने का मंडप सजाएँ और मौसम के फल-सब्ज़ी, जैसे सिंघाड़ा, शकरकंद, बेर और गन्ना रखें।
- घी का दीपक जलाएँ और इन सब चीज़ों को एक डलिया या परात से ढक दें।
- परिवार के साथ थाली, घंटी या शंख बजाते हुए “उठो देव, बैठो देव” कहकर भगवान को जगाएँ।
- इसके बाद ॐ जय जगदीश हरे आरती करें, प्रसाद बाँटें और घर में दीपक जलाएँ। रात को भजन-कीर्तन और जागरण करें।
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥अर्थ: हे गोविंद, उठिए और नींद छोड़िए। हे जगन्नाथ, आपके सोने से यह सारा संसार सोया रहता है।
तुलसी विवाह 2026 कब है?
तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल द्वादशी को करने की परंपरा है, जो इस साल 21 नवंबर 2026, शनिवार को है। कई परिवार देवउठनी एकादशी की शाम (20 नवंबर) को ही तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराते हैं, और कुछ जगह यह कार्तिक पूर्णिमा (24 नवंबर) तक किया जाता है। तुलसी विवाह से जुड़े पाठ: तुलसी विवाह की पौराणिक कथा, तुलसी आरती और तुलसी मंगलाष्टक।
व्रत के नियम: क्या खाएँ, क्या न खाएँ
- व्रत से एक दिन पहले (दशमी को) शाम को सादा, सात्विक भोजन करें।
- एकादशी पर चावल और किसी भी तरह का अनाज नहीं खाया जाता।
- फलाहार में फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक ले सकते हैं।
- सेहत ठीक हो तो कई लोग निर्जल व्रत भी रखते हैं। बुज़ुर्ग, बीमार और गर्भवती महिलाएँ फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें।
- लहसुन-प्याज़ और तामसिक भोजन से दूर रहें, झूठ, क्रोध और निंदा से बचें।
पारण कैसे और कब करें?
पारण यानी व्रत खोलना। एकादशी के अगले दिन द्वादशी तिथि में, हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई हिस्सा) खत्म होने के बाद पारण किया जाता है। इस बार 21 नवंबर को हरि वासर दोपहर 12:08 तक है, इसलिए सुबह का पारण-समय इसी में निकल जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण नहीं किया जाता, इसलिए गृहस्थ व्रत का पारण 21 नवंबर, दोपहर 1:10 से 3:18 के बीच करें। वैष्णव व्रत रखने वाले 22 नवंबर, सुबह 6:48 से 8:56 के बीच पारण करें।
पारण से पहले भगवान को भोग लगाएँ, तुलसी दल और जल लें, फिर सात्विक भोजन करें। ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और अन्न-वस्त्र का दान शुभ माना जाता है।
देवउठनी एकादशी व्रत कथा
एक राज्य में राजा से लेकर प्रजा तक सब एकादशी का व्रत रखते थे। उस दिन वहाँ किसी को भी अन्न नहीं दिया जाता था। एक दिन दूसरे राज्य का एक आदमी राजा के पास नौकरी माँगने आया। राजा ने शर्त रखी कि नौकरी तो मिलेगी, पर एकादशी के दिन अन्न नहीं मिलेगा। आदमी ने शर्त मान ली।
अगली एकादशी पर उसे फलाहार दिया गया। भूख से परेशान होकर वह राजा के पास गया और बोला, “महाराज, फलों से मेरा पेट नहीं भरता, मुझे अन्न दीजिए।” राजा ने शर्त याद दिलाई, पर वह नहीं माना। तब राजा ने उसे आटा, दाल और चावल दे दिए। वह नदी किनारे गया, स्नान करके भोजन बनाया और भगवान को पुकारा, “आइए भगवान, भोजन तैयार है।” उसकी सच्ची पुकार सुनकर भगवान विष्णु पीतांबर पहने चतुर्भुज रूप में आए और उसके साथ प्रेम से भोजन किया।
अगली एकादशी पर उसने राजा से दोगुना सामान माँगा और कहा कि पिछली बार भगवान भी साथ खाने आए थे, इसलिए उसका पेट नहीं भरा। राजा को विश्वास नहीं हुआ और वह छिपकर देखने गया। उस दिन बार-बार बुलाने पर भी भगवान नहीं आए। तब उस आदमी ने कहा, “भगवान, आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण दे दूँगा।” जैसे ही वह कूदने लगा, भगवान प्रकट हुए, उसे रोका और साथ बैठकर भोजन किया। फिर उसे अपने साथ अपने धाम ले गए।
यह देखकर राजा समझ गया कि व्रत-उपवास के साथ मन का साफ और सच्चा होना सबसे ज़रूरी है। उस दिन से वह भी पूरे मन से व्रत करने लगा और अंत में उसे भी उत्तम गति मिली। एकादशी की बाकी कथाएँ, जैसे रमा एकादशी व्रत कथा और देवशयनी एकादशी व्रत कथा, भी पढ़ें।
इसके बाद आने वाली एकादशी
- उत्पन्ना एकादशी: 4 दिसंबर 2026, शुक्रवार
- मोक्षदा एकादशी: 20 दिसंबर 2026, रविवार
- सफला एकादशी: 3 जनवरी 2027, रविवार
हर एकादशी की तारीख और पारण का समय एकादशी कब है पेज पर रोज़ अपडेट होता है। पूरे साल की सूची एकादशी लिस्ट में और महीने भर के व्रत-त्योहार हिंदू कैलेंडर में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
गृहस्थ (स्मार्त) व्रत 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को और वैष्णव व्रत 21 नवंबर 2026, शनिवार को है। एकादशी तिथि 20 नवंबर, सुबह 7:16 से 21 नवंबर, सुबह 6:32 तक है।
देवउठनी एकादशी 2026 का पारण कब है?
गृहस्थ व्रत का पारण 21 नवंबर, दोपहर 1:10 से 3:18 के बीच और वैष्णव व्रत का पारण 22 नवंबर, सुबह 6:48 से 8:56 के बीच करें (नई दिल्ली)।
देवउठनी एकादशी को और किन नामों से जाना जाता है?
प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, हरि प्रबोधिनी एकादशी और राजस्थान-मध्य प्रदेश में देव उठनी ग्यारस।
तुलसी विवाह 2026 कब है?
कार्तिक शुक्ल द्वादशी के अनुसार 21 नवंबर 2026, शनिवार को। कई परिवार देवउठनी एकादशी की शाम को ही तुलसी-शालिग्राम विवाह कराते हैं।
देवउठनी एकादशी की पूजा किस समय करें?
सुबह स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें और शाम को सूर्यास्त (शाम 5:25) के बाद प्रदोष काल में देव उठाने की पूजा करें।
क्या देवउठनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी पर चावल और अनाज नहीं खाए जाते। फलाहार में फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा ले सकते हैं।
देवउठनी एकादशी के बाद शादी के मुहूर्त कब से हैं?
देवउठनी एकादशी से विवाह जैसे शुभ काम फिर शुरू होते हैं और राजस्थान में इसे अबूझ सावा माना जाता है। अपनी शादी की तारीख पंडित से कुंडली और मुहूर्त देखकर ही तय करें।
चातुर्मास 2026 कब खत्म होगा?
चातुर्मास देवउठनी एकादशी के दिन, यानी 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को पूरा होगा।








