
गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र – श्री विष्णु (Gajendra Moksham Stotram)
श्री शुक उवाच – एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि । जजाप
भगवान विष्णु, नारायण, नरसिंह और जगन्नाथ जी की आरती, स्तोत्र, भजन और एकादशी व्रत कथाएँ।

श्री शुक उवाच – एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि । जजाप

अच्युतं केशवं रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं जानकीनायकं रामचंद्रं

1. श्री विष्णु मूल मंत्र ॐ नमोः नारायणाय॥ 2. श्री विष्णु भगवते

॥ विष्णु शान्ताकारं मंत्र ॥ शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगन सदृशं

॥ दोहा॥ विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय । कीरत कुछ वर्णन

॥ दोहा ॥ जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी । नमो नमो

जगन्नाथ जगन्नाथ जगन्नाथ जगन्नाथ चारों धाम में सबसे बड़ा है ,जगन्नाथ धाम

नर से नारायण बन जायें, प्रभु ऐसा ज्ञान हमें देना॥ दुखियों के

हरि कर दीपक, बजावें संख सुरपति, गनपति झाँझ, भैरों झालर झरत हैं

हरि जी! मेरी लागी लगन मत तोडना, लाला* जी! मेरी लागी लगन

हरि हरि, हरि हरि, सुमिरन करो, हरि चरणारविन्द उर धरो हरे राम

नाचे नन्दलाल, नचावे हरि की मईआ ॥ नचावे हरि की मईआ, नचावे

हरि सुंदर नंद मुकुंदा हरि नारायण हरि ॐ हरि सुंदर नंद मुकुंदा

हरि तुम हरो जन की भीर। द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो

मन तड़पत हरि दर्शन को आज मोरे तुम बिन बिगड़े सकल काज

हरि नाम नहीं तो जीना क्या अमृत है हरि नाम जगत में,

श्रीमन्नारायण नारायण नारायण नारायण ।टेक। लक्ष्मीनारायण नारायण नारायण नारायण बद्रीनारायण नारायण नारायण

प्रेम हो तो श्री हरि का प्रेम होना चाहिए जो बने विषयों

जिनके हृदय हरि नाम बसे, तिन और का नाम लिया ना लिया

जपूँ नारायणी तेरो नाम, राणीसती माँ झुँझनवाली, राणीसती माँ झुँझनवाली, सांचो तेरो