
गोपी गीत – जयति तेऽधिकं जन्मना (Gopi Geet – Jayati Te Dhikam Janmana)
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । दयित दृश्यतां दिक्षु

जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि । दयित दृश्यतां दिक्षु

बिन पानी के नाव खे रही है, माँ नसीब से ज्यादा दे

सुखी मेरा परिवार है, ये तेरा उपकार है, मेरे घर का एक

सीता राम जी प्यारी राजधानी लागे, राजधानी लागे, मोहे मिठो मिठो, सरजू

चटक मटक चटकीली चाल, और ये घुंघर वाला बाल, तिरछा मोर मुकट

मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो

ये मेरी अर्जी है, मै वैसी बन जाऊँ, जो तेरी मर्जी है

जय श्री वल्लभ, जय श्री विट्ठल, जय यमुना श्रीनाथ जी । कलियुग

श्याम के बिना तुम आधी, तुम्हारे बिना श्याम आधे, राधे राधे राधे

हम तो दीवाने मुरलिया के, अजा अजा रे लाल यशोदा के ।

कबहुँ ना छूटी छठि मइया, हमनी से बरत तोहार हमनी से बरत

पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार । करिहा क्षमा छठी

आदितमल के पक्की रे सड़कीया, कुजडा छानेला दोकान, कुजडा छानेला दोकान ।

डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै उगऽ हो सुरुज देव, अरघ केर

छठी माई के घटिया पे, आजन बाजन, बाजा बजवाईब हो । छठी

सोना सट कुनिया, हो दीनानाथ हे घूमइछा संसार, हे घूमइछा संसार सोना

काँच ही बाँस बसहर घरवा, हे कदम जुड़े गाछ, हे कदम जुड़े

केलवा के पात पर उगेलन सुरुज मल झांके ऊंके केलवा के पात

कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाय बहंगी लचकत जाय होई

मत रोवे ऐ धौली धौली गाय, दुनियाँ में अड़े कोई ना सुखी,