
जानकी स्तुति – भई प्रगट कुमारी (Janaki Stuti – Bhai Pragat Kumari)
भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जन हितकारी भयहारी । अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी

भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जन हितकारी भयहारी । अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी

छोटी छोटी गैया, छोटे छोटे ग्वाल । छोटो सो मेरो मदन गोपाल

बृज के नंदलाला राधा के सांवरिया, सभी दुःख दूर हुए, जब तेरा

कैसे जिऊ मैं राधा रानी तेरे बिना, मेरा मन ही ना लागे

राधा कौन से पुण्य किये तूने, जो हरि रोज तेरे घर आते

सारी दुनियां है दीवानी, राधा रानी आप की, कौन है! जिस पर

खुल गया बैंक राधा, रानी के नाम का, बैठा बनके मैनेजर, कान्हा

जय जय राधा रमण हरी बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल

पूछ रही राधा बताओ गिरधारी, मैं लगु प्यारी या बंसी है प्यारी

राधा ढूंढ रही किसी ने मेरा श्याम देखा, श्याम देखा, घनश्याम देखा,

मीठे रस से भरीयो री, राधा रानी लागे। श्लोक: राधा तू बड़भागिनी,

गलियां चारों बंद हुई, मिलूं कैसे हरी से जाये । ऊंची नीची

अरे रे मेरी जान है राधा, तेरे पे क़ुर्बान मैं राधा, अरे

राधा रानी को भयो अवतार, बधाई बाज रही, ऐ जी हाँ बधाई

रघुनन्दन राघव राम हरे सिया राम हरे सिया राम हरे । रघुनन्दन

जहाँ ले चलोगे, वही मैं चलूँगा, जहाँ नाथ रख लोगे, वही मैं

श्री राम नवमी, विजय दशमी, सुंदरकांड, रामचरितमानस कथा, हनुमान जन्मोत्सव और अखंड

हरि तुम हरो जन की भीर। द्रोपदी की लाज राखी, तुम बढ़ायो

श्री राम नवमी, विजय दशमी, सुंदरकांड, रामचरितमानस कथा और अखंड रामायण के

मुझे रास आ गया है, तेरे दर पे सर झुकाना । तुझे