मार्गशीर्ष (अगहन) महीने की पूर्णिमा को मार्गशीर्ष पूर्णिमा या अगहन पूर्णिमा कहते हैं। भगवद् गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ, इसलिए इस महीने की पूर्णिमा पर स्नान, दान और जप का खास महत्व है। इसी दिन भगवान दत्तात्रेय की जयंती मनाई जाती है और कई जगह अन्नपूर्णा जयंती भी। नीचे दी गई तारीखें और समय हर साल अपने आप अगले साल के अनुसार बदल जाते हैं।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2026: तारीख और समय
| पूर्णिमा | मार्गशीर्ष पूर्णिमा (मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा) |
| व्रत और स्नान-दान | 23 दिसंबर 2026, बुधवार |
| पूर्णिमा तिथि शुरू | 23 दिसंबर, सुबह 10:48 |
| पूर्णिमा तिथि समाप्त | 24 दिसंबर, सुबह 6:58 |
| सूर्योदय (23 दिसंबर) | सुबह 7:10 |
| चंद्रोदय (23 दिसंबर) | शाम 4:36 |
| सूर्यास्त (23 दिसंबर) | शाम 5:30 |
| दत्तात्रेय जयंती | 23 दिसंबर 2026, बुधवार |
| विक्रम संवत | 2083 |
समय नई दिल्ली के अनुसार है और जम्भ भक्ति की अपनी खगोलीय गणना (लाहिड़ी अयनांश) से निकाला गया है। पूर्णिमा तिथि के शुरू और खत्म होने का समय पूरे भारत में एक ही रहता है, पर सूर्योदय और चंद्रोदय हर शहर में अलग होते हैं। अपने शहर का समय आज का पंचांग में देखें।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा का महत्व
- भगवान कृष्ण का प्रिय महीना: गीता के दसवें अध्याय के 35वें श्लोक में भगवान ने खुद को महीनों में मार्गशीर्ष बताया है। इस महीने की पूर्णिमा को महीने भर की भक्ति का समापन माना जाता है।
- दत्तात्रेय जयंती: ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त रूप भगवान दत्तात्रेय का जन्मोत्सव इसी दिन होता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश में यह बड़ा पर्व है।
- अन्नपूर्णा जयंती: कई परंपराओं में इसी दिन माता अन्नपूर्णा की जयंती मानी जाती है। इस दिन अन्नदान और रसोई की पूजा की जाती है।
- स्नान-दान और सत्यनारायण कथा: हर पूर्णिमा की तरह इस दिन भी पवित्र स्नान, सत्यनारायण कथा, चंद्रमा को अर्घ्य और दान की परंपरा है।
भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?
भगवान दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और सती अनसूया के पुत्र हैं। उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और शिव, तीनों का संयुक्त रूप माना जाता है, इसलिए उनकी मूर्ति में तीन मुख और छह भुजाएँ होती हैं। उनके साथ एक गाय और चार कुत्ते दिखाए जाते हैं, जिन्हें पृथ्वी और चार वेदों का प्रतीक माना जाता है। वे योग और ज्ञान के आदि गुरु माने जाते हैं, और नाथ परंपरा तथा कई संप्रदाय उन्हें अपना गुरु मानते हैं।
दत्तात्रेय जन्म की कथा
सती अनसूया अपने पतिव्रत धर्म के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं। उनकी परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधु के वेश में महर्षि अत्रि के आश्रम पहुँचे और भिक्षा माँगी। अनसूया ने अपने तप के बल से तीनों को छोटे बालक बना दिया और माँ की तरह उन्हें भोजन कराया।
जब तीनों देवियाँ, सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, अपने पतियों को ढूँढती हुई आश्रम पहुँचीं, तो उन्होंने अनसूया से उन्हें लौटाने की प्रार्थना की। अनसूया ने तीनों देवों को उनका रूप लौटा दिया। प्रसन्न होकर त्रिदेव ने वरदान दिया कि वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। इसी वरदान से भगवान दत्तात्रेय का जन्म हुआ, और यह मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन था।
दत्तात्रेय के 24 गुरु
श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में एक अवधूत राजा यदु को बताते हैं कि उन्होंने 24 गुरुओं से सीखा है। परंपरा में इन अवधूत को भगवान दत्तात्रेय माना जाता है। इसका संदेश यह है कि जिसकी आँखें खुली हों, वह प्रकृति की हर चीज़ से कुछ सीख सकता है:
| गुरु | क्या सिखाया |
|---|---|
| 1. पृथ्वी | सब कुछ सहकर भी दूसरों का भला करना, यानी धैर्य और क्षमा। |
| 2. वायु | हर जगह रहकर भी किसी चीज़ से न बँधना। |
| 3. आकाश | आत्मा सब में है, फिर भी किसी से लिप्त नहीं। |
| 4. जल | स्वच्छ, मीठा और दूसरों को पवित्र करने वाला बनना। |
| 5. अग्नि | जो मिले उसे ग्रहण करके भी तेजस्वी और निर्दोष रहना। |
| 6. चंद्रमा | घटना-बढ़ना शरीर का होता है, आत्मा का नहीं। |
| 7. सूर्य | जो लिया उसे समय पर लौटाना, जैसे सूर्य जल लेकर वर्षा देता है। |
| 8. कबूतर | हद से ज़्यादा मोह आख़िर में दुख देता है। |
| 9. अजगर | जो अपने आप मिल जाए, उसी में संतोष रखना। |
| 10. समुद्र | सुख में फूलना नहीं, दुख में सूखना नहीं; गहरा और शांत रहना। |
| 11. पतंगा | रूप के आकर्षण में अपना नाश न करना। |
| 12. मधुमक्खी | हर फूल से थोड़ा-थोड़ा सार लेना, यानी हर जगह से अच्छी बात सीखना। |
| 13. हाथी | वासना के मोह में बँधने से बचना। |
| 14. शहद निकालने वाला | जो सिर्फ़ जमा करता है, उसका धन आख़िर में कोई और ले जाता है। |
| 15. हिरण | मीठी आवाज़ और संगीत के मोह में भी फँसा जा सकता है। |
| 16. मछली | जीभ के स्वाद का लालच बंधन बनता है। |
| 17. पिंगला | आशा छोड़ देने पर ही मन को सच्ची शांति मिलती है। |
| 18. कुरर पक्षी | जिस चीज़ के लिए सब लड़ें, उसे छोड़ देने में ही सुख है। |
| 19. बालक | चिंता छोड़कर सहज आनंद में रहना। |
| 20. कुमारी कन्या | साधना अकेले में अच्छी होती है, भीड़ में शोर होता है। |
| 21. बाण बनाने वाला | काम में ऐसी एकाग्रता कि आसपास का पता न चले। |
| 22. सर्प | अकेले रहना और घर-संग्रह के झंझट से दूर रहना। |
| 23. मकड़ी | ईश्वर संसार को अपने से रचते हैं और फिर अपने में समेट लेते हैं। |
| 24. भृंगी कीट | जिसका लगातार ध्यान करो, मन वैसा ही बन जाता है। |
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पूजा विधि
- सुबह सूर्योदय से पहले स्नान करें। नदी में स्नान न हो सके तो पानी में गंगाजल मिलाएँ और सूर्य को अर्घ्य दें।
- भगवान विष्णु या सत्यनारायण भगवान की पूजा करें। पीले फूल, तुलसी दल, पंचामृत, फल और पंजीरी का भोग लगाएँ, कथा सुनें और सत्यनारायण जी की आरती करें।
- भगवान दत्तात्रेय के चित्र के सामने दीपक जलाएँ, “श्री गुरुदेव दत्त” का जप करें और दत्तात्रेय स्तोत्रम् या दत्तात्रेय के 108 नाम का पाठ करें। महाराष्ट्र की परंपरा में दत्ताची आरती गाई जाती है।
- शाम को चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को दूध और जल से अर्घ्य दें।
- अन्न, गर्म कपड़े, कंबल या गुड़-तिल का दान करें। सर्दी का मौसम होने से ज़रूरतमंदों को कंबल देना बहुत अच्छा माना जाता है।
अन्नपूर्णा जयंती पर क्या करें?
माता अन्नपूर्णा अन्न की देवी हैं, जिनकी कृपा से घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। अन्नपूर्णा जयंती पर सुबह रसोई को अच्छी तरह साफ करें, चूल्हे और अन्न के भंडार की पूजा करें और माँ को ताज़ा बना भोजन अर्पित करें। इसके बाद अन्नपूर्णा आरती गाएँ और अन्नपूर्णा स्तोत्रम् या अन्नपूर्णा चालीसा का पाठ करें। इस दिन किसी भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ी पूजा मानी जाती है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर क्या न करें
- मांस-मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें।
- घर आए किसी भिखारी, साधु या ज़रूरतमंद को खाली हाथ न लौटाएँ। दत्तात्रेय भगवान को भिक्षु रूप में भी पूजा जाता है।
- अन्न का अपमान न करें, थाली में खाना न छोड़ें।
इसके बाद आने वाली पूर्णिमा
- पौष पूर्णिमा: 22 जनवरी 2027, शुक्रवार (शाकंभरी पूर्णिमा, माघ स्नान आरंभ)
- माघ पूर्णिमा: 20 फ़रवरी 2027, शनिवार (संत रविदास जयंती)
- फाल्गुन पूर्णिमा: 22 मार्च 2027, सोमवार (होलिका दहन (शाम) 21 मार्च को, होली (धुलंडी))
अगली पूर्णिमा की तारीख और समय पूर्णिमा कब है पेज पर रोज़ अपडेट होता है। पूरे साल की सूची पूर्णिमा लिस्ट में और महीने भर के व्रत-त्योहार हिंदू कैलेंडर में देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2026 कब है?
व्रत और स्नान-दान दोनों 23 दिसंबर 2026, बुधवार को हैं। पूर्णिमा तिथि 23 दिसंबर, सुबह 10:48 से 24 दिसंबर, सुबह 6:58 तक रहेगी। इसी दिन दत्तात्रेय जयंती भी है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर चंद्रोदय कितने बजे होगा?
नई दिल्ली में 23 दिसंबर को चंद्रोदय शाम 4:36 पर होगा। अपने शहर का समय आज का पंचांग में देखें।
दत्तात्रेय जयंती 2026 कब है?
भगवान दत्तात्रेय का जन्मोत्सव मार्गशीर्ष पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो इस बार 23 दिसंबर 2026, बुधवार को है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा को और क्या कहते हैं?
इसे अगहन पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी दिन भगवान दत्तात्रेय की जयंती और कई जगह अन्नपूर्णा जयंती मनाई जाती है।
भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?
भगवान दत्तात्रेय महर्षि अत्रि और सती अनसूया के पुत्र हैं। उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों का संयुक्त रूप माना जाता है और वे आदि गुरु के रूप में पूजे जाते हैं।
मार्गशीर्ष महीना इतना पवित्र क्यों माना जाता है?
भगवद् गीता (अध्याय 10, श्लोक 35) में भगवान कृष्ण कहते हैं कि महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इसलिए इस महीने में स्नान, दान, जप और कृष्ण भक्ति का विशेष महत्व है।








