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राजा लूणकरण एवं महमद खां तथा समराथल ….भाग 6

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राजा लूणकरण एवं महमद खां तथा समराथल ….भाग 6

 

 

राजा लूणकरण एवं महमद खां तथा समराथल ….भाग  6

राजा लूणकरण एवं महमद खां तथा समराथल ....भाग 6
राजा लूणकरण एवं महमद खां

                                                       संवत् 1542 में बिश्नोई पंथ की स्थापना हो चुकी थी। तब बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर आदि रजवाड़े तो हिन्दुओं के थे तथा नागौर, अजमेर, दिल्ली अशोक राजवाड़े मुसलमानों के हुआ करते थे। सम्भराथल स्थान स्वयं तो बीकानेर तथा नागौर की सीमा ऊपर ही स्थित था तथा दोनों धर्मों की सीमा को जोड़ने वाला भी सम्भराथल परम पवित्र स्थान सिद्ध हो रहा था।

वहां पर मुसलमान भी श्रद्धापूर्वक आते थे तथा हिन्दू भी आया करते थे। उस जगह पर ऐसी मान्यता थी कि कोई भी धर्म अच्छा या बुरा या छोटा-बड़ा नहीं है किन्त धर्म के अनुनायी लोग उस धर्म को बदनाम कर देते है। इसलिये सभी धर्मों के समीकरण का वह एक क्षेत्र उपलब्ध था वहां पर आकर समस्याओं का समाधान हो सकता था।

एक समय नागौर का सूबेदार मोहम्मद पीपासर आया था। वहां पर कहते हैं कि तम्बू में हाथी बांधकर सम्भराथल पर स्वयं जम्भदेव जी के दर्शनार्थ पहुंचा था। वहां पर जाकर पूछा था कि यदि आप स्वयं सिद्ध पुरूष योगेश्वर हैं तो यह बतलाने का कष्ट कीजिये कि मैं तम्बू में क्या छोड़कर आया हूं। तब जम्भदेव जी ने कहा कि तम्बू में तो तूं भेड़ का बच्चा बांधकर आया है जाकर देख ले।

तब महमद खां ने कहा-महाराज आपने हाथी को भेड़ का बच्चा बतला दिया है यह कैसी आपकी करामात है। वापिस जाकर मोहम्मद खान ने देखा था वैसा ही भेड़ का बच्चा बंधा खड़ा था। सम्भराथल पर

वापिस पहुंचकर दण्डवत प्रणाम करते हुए क्षमा याचना करने लगा, तब पुनः भेड़िये से हाथी हो गया। इसी प्रकार से मोहम्मद खान को शिकार से भी निवृत्त किया था। तभी से जम्भगुरु जी का शिष्य बनना अहमद खां ने स्वीकार कर लिया था और सच्चे मार्ग का अनुसरण करने लगा था।

उसी समय ही कुछ वर्ष पूर्व राव बीकाजी ने बीकानेर राज्य की स्थापना की थी और यदाकदा सम्भराथल पर जम्भदेव जी के दर्शनार्थ आया करता था। जम्भदेव जी ने बीकाजी के पिता राव जोधा जी को एक नगाड़ा भी भेंट स्वरूप में दिया था। उसी नगाड़े को बीकाजी ने अपने पिताजी से राज्य में रखने के लिये प्राप्त कर लिया था। उसकी पूजा राजघराने में होती थी,

उसी परंपरा का पालन राव लूणकरण भी करता आ रहा था लूणकरण भी अपने दादा तथा पिता की भांति जम्भदेव जी का शिष्य था, उनकी आज्ञाओं पर चला करता था। एक समय राजा लूणकरण पीपासर पहुंचा था, वहीं पर महमद खा तथा लूणकरण की भेंट हो चुकी थी।

अहमद खां ने तो कहा कि जम्भदेव जी मुसलमानों के पीर है तथा लूणकरण ने कहा था कि ये तो हमारे हिन्दुओं के देवता हैं। इस प्रकार से विवाद बढ़ चुका था। इसका निर्णय करने के लिये मुहम्मद खां ने तो काजी को सम्भराथल  पर भेजा था और लूणकरण ने पुरोहित को भेजा था कि तुम दोनों जम्भदेवजी के पास जाकर पूछकर आओ कि किसके देव है।

इस प्रकार से ये दोनों सम्भराथल पर पहुंचे थे तो उनके विवाद की इच्छा को सम्भराथल पर विराजमान जम्भदेव जी ने जान लिया और प्रथम पुरोहित को पास में बुला करके शब्द नं. 7″हिन्दू होय कर” सुनाया और कहा कि न तो हम हिन्दूओं के देव हैं और न ही हम मुसलमानों के पीर ही हैं,

हम तो सच्चों के ही स्वामी हैं। जो सत्य मानवता के धर्मो को अपनाता है वही मुझे अति प्रिय है और मैं भी उनका अति प्रिय हूं। मुझे किसी जाति-पांति से कुछ भी प्रयोजन नहीं है। तो कोई जन्मजात हिन्दू होने से महान ही हो सकता और न ही कोई जन्मजात मुसलमान होने से हीन हो सकता है।

 पुरोहित को शब्द श्रवण करवाने के पश्चात् उस काजी को अपने पास बुलाया और उसे शब्द नं. 8 से 12 तक अबाध गति से श्रवण करवाया और उनकी शंकाओं का समाधान प्रस्तुत किया और बताया कि मैं न तो मुसलमानों का पीर ही हूं और न ही हिन्दुओं का देव ही। क्योंकि मुझे किसी मजहब से प्रयोजन नहीं है, मैं किसी का पक्षपाती नहीं हूं जो जैसा कर्म करेगा वैसा दण्ड उसे अवश्य ही प्राप्त होगा। मैं तो केवल मात्र मानवता का पक्षपाती हूं।

सच्चे मानव ही मुझे अति प्रिय हैं। जो जीव हत्यादि अघोर पाप में संलिप्त हैं वे पापीजन कदापि ईश्वरीय कृपा के अधिकारी नहीं हो सकते।

इस प्रकार से काजी तथा पुरोहित को संदेशा देकर पुन: महमद तथा लूणकरण के पास में भेजा और उन्होनें जाकर उस धर्ममय वार्ता से अवगत करवाया जिससे जीवनपर्यन्त ये दोनों ही जम्भदेव जी की आज्ञा का पालन करते हुए राज्य कार्य करते रहे थे जब भी मनमुखी होकर चले तभी उनको विपत्तियों का सामना करते हुए प्राणों को भी गंवाना पड़ा था। इसलिये सम्भराथल की पवित्र भूमि पर जो धर्म उदय हुआ वह मानव मात्र में समता लाने वाला सर्वग्राह्य धर्म था।

भाग 7 

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Sandeep Bishnoi

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