
पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा: अध्याय 19 (Purushottam Mas Mahatmya Katha: Adhyaya 19)
श्रीसूत जी बोले, ‘हे तपस्वियो! इस प्रकार कहते हुए श्रीनारायण को मुनिश्रेष्ठ

श्रीसूत जी बोले, ‘हे तपस्वियो! इस प्रकार कहते हुए श्रीनारायण को मुनिश्रेष्ठ

सूतजी बोले, ‘हे विप्रो! नारायण के मुख से राजा दृढ़धन्वा के पूर्वजन्म

बाल्मीकि मुनि बोले, ‘इसके बाद फिर प्रतिभा की अनलोत्तारण क्रिया करके प्राणप्रतिष्ठा

दृढ़धन्वा राजा बोला, ‘हे तपोधन! पुरुषोत्तम मास के व्रतों के लिए विस्तार

परमा एकादशी का महत्त्व: अर्जुन ने कहा, हे कमलनयन! आपने शुक्ल पक्ष

मणिग्रीव बोला, ‘हे द्विज! विद्वानों से पूर्ण और सुन्दर चमत्कारपुर में धर्मपत्नी

दृढ़धन्वा बोला, ‘हे ब्रह्मन्! हे मुने! अब आप पुरुषोत्तम मास के व्रत

अब उद्यापन के पीछे व्रत के नियम का त्याग कहते हैं। बाल्मीकि

श्रीनारायण बोले, ‘इस प्रकार कह कर मौन हुए मुनिश्वर बाल्मीकि मुनि को

पुण्यशील-सुशील बोले, ‘हे विभो! गोलोक को चलो, यहाँ देरी क्यों करते हो?

यदु वंशी श्रीकृष्ण दुर्वासा ऋषि को अपना कुलगुरु मानते थे। जब श्रीकृष्ण

Ashadha Sankashti Ganesh Chaturthi Vrat Katha

श्री कृष्ण के लीला काल का समय था, गोकुल में एक मोर

सूतजी बोले, ‘राजा परीक्षित् के पूछने पर भगवान् शुक द्वारा कथित परम

श्रीनारायण बोले, ‘हे नारद! भगवान् पुरुषोत्तम के आगे जो शुभ वचन अधिमास

श्रीनारायण बोले, ‘चित्रगुप्त धर्मराज के वचन को सुनकर अपने योद्धाओं से बोले,

नारदजी बोले, ‘हे तपोनिधे! तुमने पहले पतिव्रता स्त्री की प्रशंसा की है

दृढ़धन्वा राजा बोला, ‘हे मुनियों में श्रेष्ठ! हे दीनों पर दया करने

आशा दशमी की पौराणिक व्रत कथा, जो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को

प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था।