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श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 1

श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 1
श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 1

             श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 1

                          श्री  राम कथा 

वील्हा उवाच- हे गुरुदेव  आपने मुझे अनेकानेक दिव्य चरित्र एवं ईश्वरीय शक्ति की कथा सुनाई। सुनकर में कृतार्थ हुआ। अब आगे मैं आपके श्री मुख से राम कथा सुनना चाहता हूं, वैसे तो राम अनन्त राम कथा अनन्ता ‘ राम की कथा भी अनन्त अपार है फिर भी आपने श्री गुरु जाम्भोजी से सुना है,वही कथा विशेष सुनना चाहता हूं।

नाथोजी उवाच- हे शिष्य- एक समय सम्भराचल पर श्री देवजी विराजमान थे उसी समय आगन्तुक श्रद्धालुओ ने श्री विष्णु जाम्भोजी से पूछा था कि हे गुरुदेव हमने आपके श्री मुख से सुना है। आप राम रूप की कोई अद्भूत घटना यदि है तो अवश्य ही सुनाइये। हम आपके आधीन है। ऐसी वार्ता सुनकर श्री जाम्भेश्वरजी ने शब्द सुनाया था वही मैं आपसे बतलाता हूं।

 राजा दशरथ राम नेम किया जासु राम लछमण अवतार हुआ। राम लछमण पै वनवास हुवौ। अठार पदम सेन्या करि । राम लछमण लंका वीढी। रावण लछमण को जत छौलवण नु काली ब्राही मेल्ही । लछमण को जत छीलवो तो माहनै मारण हारो को नहीं । क्योकि मैने जोतको बुझया। कोई राम की सेन्या मां मने मारण हारो न सूझै ।

लड़कियां लछमण कुवर बतायों। खुध्या,त्रिषा,निंद्रा नहीं। काछ वाच को निकलंक। रावण काली ब्राह्मी नैं डेल्ही । काली ब्राही लछमण कंवार आगै हाथ जोड़ी उभी रही। लक्ष्मण |कुवार कहै क्यों । ब्राही कहै एक वचन मांगा। लछमण कुवार कहै मागो ब्राही कहे थे महाने वरो। लछमन कहै, म्है तो भारत करिया कुण जाण वचा क न वचां ब्राही कह म्हे थांहरा गाढा जतन करेस्यां लछमण कह थे वचन द्यौ ।

माह के घाव घोबो चोट फेट लागी तो मांहरी वाच अवाच छः न लागो तो थानुं वरस्य। काली ब्राही ठलट छल हुवो। नागण्य होय डस्य गइ राम लक्ष्मण भारथ कियो । लंका लूटी। दत स्यघारयां लछमन कुंवार

साढा तीन स कोश आपको सरीर लांबो असवानी वर्यो । नींव कोस मां देह चौड़ी कीवी राकसणीयां सु जंतर हुवा नही। लछमन रावण की मुंछ बरोबरय टी। हीर तीर सुं भुंवरो मारयौ। सगति बाण सु लछमण धर पड़यो। राम विसुरणा कर। श्री राम वायक –

                         शब्द 60 

ओ३म् एक दुख लक्ष्मण बंधु हड्डियों,एक दुख बूढै घर तरणी अइयों।

एक दुख बालक की मां भाइयों,एक दुख ओछै को जमवारू। एक दुख तूटे से व्यवहार,तेरे लक्षणे अन्त न पारूं, सहै न शक्ति भारू।

 कैते परशुराम का धनुष जे पड़यो, कै तै दाव दाव न जाण्यौ भइयूं।

लक्ष्मण बाण जे दहसिर हुड़का, ऐतो जूझ हमें नहीं जाण्यो।

 तो बिन ऊभा पह प्रधानो,तो बिन सूना त्रिभुवन थानों।

जे कोई जाणै हमारा नाऊं,तो लक्ष्मण ले बैकुण्ठे जाऊं।

कहा हुआ जे लंका लडियो,कहा हुओ जे रावण हड़वों।

 कहा हुआ जे सीता अइयों,कहा करूं गुणवंता भइयो।

 खल के साटे हीरा गइयो।

श्री जाम्भेश्वर जी ने राम कथा स्वयं इस प्रकार से बतलायी- त्रेतायुग में रघुवंश में राजा दशरथ हुऐ। अयोध्यापति दशरथ की आयु साठ वर्ष की हो गयी। तब भी उनके संतान नहीं हुई। कुल गुरु वशिष्ठ की आज्ञा से ऋष्यश्रृंग से दशरथ ने यज्ञ करवाया जिससे उनके तीन रानियों से चार संताने हुई। सबसे बड़ा राम, भरत,लक्ष्मण, एवं शत्रुघ्न ।

 राम बड़े हुए युवराज बनने की तैयारी होने वाली थी किन्तु देव योग से दशरथ द्वारा वनवास दिया गया। राम लक्ष्मण एवं सीता तीनों चौदह वर्षों का वनवास पंचवटी में व्यतीत कर रहे थे। किन्तु रावण ने कपटी मृग बना कर छल किया और सीता का हरण कर के लंका में ले गया।

हनुमानजी ने सीता की खोज की और सुग्रीव मित्र की सहायता से लंका पर चढाई कर दी। समुद्र पर पाज बंधवायी और सेना सहित लंका में प्रवेश किया। राम की सेना लंका में प्रवेश कर गयी थी तब रावण ने ज्योतिषियों से पूछा था कि राम की सेना में मुझे मारने वाला कौन है।ज्योतिषियों ने बतलाया कि राम की सेना में लक्ष्मण यति है जो तृष्णा, भूख,नींद आदि को जीत चुका है तथा यति ब्रहाचारी है वही रावण को मार सकता है।

 हमारे यदि किसी प्रकार की चोट,पावन लागे, यदि लग गयी तो हमारा वचन अवचन। यदि घाव लग गया तो मैं तुम्हारे से विवाह नहीं करूंगा। यदि घाव नहीं लगे तो ही मैं तुम्हारे से विवाह करूगां । इस प्रकार से काली आयी तो थी लक्ष्मण के साथ छल करने के लिये किन्तु स्वयं ही छली गयी खाली हाथ जैसे आयी थी वैसे वापिस लौट गयी। लक्ष्मण के यतित्व को भंग नहीं कर सकी।

गीन हो कर के लक्ष्मण को डस गयी। राम लक्ष्मण ने युद्ध किया। लंका लूट ली, दैत्यों का संहार किया। लक्ष्मण कुमार ने साढे तीन सौ कोश अपना शरीर बढाया। नौ कोश देह को चौड़ी की। इसलिये राक्षसणियों से यंत्र नहीं हुआ।

रावण लक्ष्मण ने अपनी मूंछे बढाई दोनो की बराबर हुई। लक्ष्मण ने हीरे के बाण से रावण के भवो- जीव को मारा। लक्ष्मण के बाण से रावण मारा गया किन्तु इससे पूर्व मेघनाद द्वारा चलाया हुआ शक्ति बाण को लक्ष्मण सहन नहीं कर सका। युद्ध भूमि में मूर्छित होकर गिर पड़ा। राम ने लक्ष्मण के वियोग में विलाप किया।

 साथरियों ने पूछा- हे गुरुदेव ! राम ने लंका में लक्ष्मण के वियोग में विलाप किया था। वह विलाप आप हमें सुनाइये आपके मुख से राम विलाप सुनना चाहते है। क्योंकि राम रूप धारण करने वाले तो आप स्वंय ही है।

जाम्भोजी ने शब्द सुनाया- हे भाई लक्ष्मण | संसार में दुःख तो बहुत आते है किन्तु लक्ष्मण जैसे भाई का बिछोह हो जाना,इससे बढकर तो दुनिया में कोई दुःख नहीं है दूसरा दुःख संसार में बूढे के घर पर तरूणी स्त्री का पत्नी के रूप में आ जाना। तीसरा दुख छोटे बालक की मां का मर जाना है चौथा दुख धन हीन का जीवन है पांचवा दुख व्यवहार लेन देन में टूट जाना है ऐसे दुख तो संसार में बहुत है कहां तक गिनाये किन्तु भाई लक्ष्मण के बिना जो इस समय मुझे जो दुख हो रहा है उसका कोई आर पार नहीं है।

 हे लक्ष्मण- तू शक्ति बाण को सहन नहीं कर सका। हे भाई । तुम्हारे पास परशुराम का दिया हुआ धनुष था। जो जनक धनुष यज्ञ में परशुराम ने दिया था। क्या उस धनुष को उठाया नहीं था। हे भाई। क्या तुमने दैत्यों के दाव दाव नीति नीति को नहीं समझ सका। लक्ष्मण के बाण से रावण मारा जायेगा, मैं तो ऐसा ही समझता था में यह नहीं समझता था कि ऐसा भयंकर युद्ध होगा और मेरा भाई लक्ष्मण मूर्छित जायेगा।

 हे लक्ष्मण-आज मैं स्वंय तुम्हारे सामने विपति में हूं मेरा तो कोई नाम भी ले ले तो बैकुण्ठ में पहुंच जाता है किन्तु मैं इस समय असहाय होकर कुछ भी नहीं हूँ। हे लक्ष्मण उठ जाओ देखो कर पा रहा तुम्हारे बिना तो सभी प्रधान खड़े हुऐ है कुछ भी नहीं कर पा रहे है तुम्हारे बिना तो तीनों भवन लोक शून्य 

हो गये हैं।

 हे भाई । अब क्या होगा यदि मैं लंका ले लू और क्या होगा यदि रावण को मार दूं। और क्या होग यदि सीता को वापिस ले लूं। हे मेरे गुणवान भाई। मैंने खली के लिये हीरा खोदिया। कहां तो सीता कहा भाई लक्ष्मण। मैंने सीता प्राप्ति हेतु भाई लक्ष्मण को खो दिया। मैं हानि को प्राप्त हुआ हूँ।

 मै बिना भाई लक्ष्मण के अयोध्या कैसे जाएंगे? वहां मेरी माताऐँ पूछेगी के लक्ष्मण कहा है तो मैं क्या जवाब दूंगा। लक्ष्मण को मूर्छित अवस्था में प्रधानो ने देखा तो युद्ध रूक गया।

 राम ने विलाप करते हुए कहा- कोई होगा अपनी सेना में सूरवीर जो संजीवनी बूटी ले आवै । जिससे यति लक्ष्मण ठीक हो सके। वैद्य जी ने बतलाया है कि पवन पराक्रम से जावे भूत दैत्यों से डरे नहीं और सूर्योदय से पूर्व में ही वापिस लौट कर आवे। वह संजीवनी बूटी कौन लायेगा। लक्ष्मण कंवर को ठोक करेगा। मैं इस विपति काल में किससे कहूं।

यदि मेरे पिता दशरथ होते तो उनसे कहता किन्तु वो तो स्वर्गवासी हो चके है। भाई भरत अयोध्या म है। अयोध्या यहां से बहुत दूर है। अब मेरी पीड़ा को कौन मिटाये। अपना हो अपनी पीड़ा को समझता है,पराया भला क्या समझे। हनुमान ने कहा – हे राम ! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं आपका सेवक जाऊं और सूर्योदय से पूर्व ही आपकी कृपा से लौट आऊं। राम ने कहा- अच्छा भाई हनुमान तुम्ही जाओ। और यहां हैं भी कौन ? हनुमान जड़ी बूंटी लेने चले पीछे रामजी ने पुनः विलाप किया।

 हनुमान गया तो अवश्य ही है किन्तु समय पर शायद ही लौट कर आये।” काज पराया सीवला,जां दुखै तां पीड़,” पराया कार्य ठण्डा ही होता है जिसके पीड़ा होती है दुख भी उसी को होता है हनुमान जी पर्वत पर पहुंच तो गये किन्तु जड़ी बूटी की पहचान नहीं थी, इसीलिये सम्पूर्ण पहाड़ ही उखाड़ लिया और सूर्योदय से पूर्व ही जड़ी बूंटी लाकर सौंप दी वैद्य जी ने जड़ी घोस कर लगायी और लक्ष्मण तुंरत उठ बैठे। उसी समय राम जी ने पूछा 

 अठारै दोषण है,रामचन्द्र कहै, तैं कोण दोष कौ। कंवार कहै, कोई म्हाई दोषण दाखवी रामचंद्र प्रदूषण का नाम कहै – श्री वायक कहै-

श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 2

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