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जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 1

        जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 1

जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना
जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना

रावल जैतसी जैसलमेर उजवणो जियो । च्यार वरा गुरुमुखी दीन्हा। जाम्भोजी श्रीवायक कहे

                         शब्द-88

ओ३म् गोरख लो गोपाल लो, लाल गवाल लो,

लाल लिंग देवो, नव खंड पृथिवी प्रगटियो,

कोई बिरला जाणत म्हारी आद मूल का भेवों।

 जाम्भोजी के समय में अनेक राजा हुए। उनमें मुख्य रूप से जैसलमेर के राजा जैतसी का नाम अग्रगण्य है। जैसलमेर की राज परम्परा में जायसी उस समय राजगद्दी पर विराजमान थे। राजा पूर्णतया धार्मिक विचारों से ओतप्रोत था।दया,दान 

,जरणा,युक्ति,शौच,शील,स्नान आदि नियमों का दृढ़ता से पालन करता था। पापकर्म करने से डरता था। धर्म की तरफ राजा का रूझान स्वाभाविक ही था।

रावल जैतसी ने जयसमंद बांध का निर्माण करवाया था। जिसमें जल ठहरे और वन तथा वन्य जीव जन्तु जल पी सके, सभी का भला होवे। जैतसमंद का कार्य पूर्ण होने पर उसका उद्घाटन प्रतिष्ठा के लिए उन्होनें जाम्भोजी को बुलाने की योजना बनायी थीं हमारे यज्ञ में श्री देवजी पधारे तो हमारा कार्य पूर्ण हो जाये। मैं उनके चरणों की रज ले सके, अपने को कृतार्थ करूं। हमारे यज्ञ में चार चांद लग जाये।

वे मुझे जैसा आदेश देगे वैसा मैं करूंगा। यज्ञ में होने वाले अदृष्टों से मैं बच जाऊँगा। ऐसा शुभ विचार जैतसी ने किया और अपना एक विश्वासपात्र सेवक जाम्भोजी के पास भेजा।

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सतगुरु समराथल पर विराजमान थे। सतगुरु के पास जेतसी का भेजा हुआ दूत आया बड़े ही आशा एवं विश्वास के साथ देवजी का दर्शन अश्रुपूर्ण नेत्रों से किया, चरणों में वंदना करके श्रीदेवजी के पास बैठा। दूत ने हाथ जोड़कर जैसा जेतसी ने निवेदन किया था, वैसा कहने लगा

हे देव! रावलजी ने कहा है कि मैं आपका सेवक हूं। आप जेतसमंद की प्रतिष्ठा में जैसलमेर पधारों। आपके बारे में श्रद्धा भरे वचनों से कहा है कि धन्य है कलयुग के लोग जो आपका दर्शन कर रहे हैं। हे देव! आपने सतयुग का धर्म कलयुग में प्रकट किया है। कुमार्ग पर चलते हुए लोगों को आपने सुमार्ग पर चलाया है। अज्ञानी जनों को ज्ञानी बनाया है। आपको जिसने भी पहचान लिया है उसके हृदय का ताला खुल गया है।

आपने जिस पर भी कृपा की है, उन्हें रिद्धि सिद्धि सभी कुछ प्रदान की है। अब कृपा करके हमारे देश जैसलमेर भी पधारो। हम आपकी आशा में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अब हमारी आशापूर्ण होने का समय आ गया है। यदि आप यज्ञ में आ जाओ तो हमारी सभी कामना पूर्ण हो जायेगी।

 देवजी ने कहा- हे दूत! आप वापिस जाओ, और रावल से पूछो कि मैं आउंगा तो वहां पर मेरी ही बात चलेगी। किसी अन्य की नीति, वार्ता किसी भी प्रकार का जोर नहीं चलेगा। तुम्हारे वहां पर ठाकुर, राजा, प्रधान, योगी, सन्यासी, तपस्वी, तीर्थवासी, पण्डित, ज्योतिषी इत्यादि वहां पर एकत्रित होंगे। वे सभी अपनी अपनी बात चलायेंगे। यदि उनका कहना मानना है तो मेरे का मत बुलाओ।

मुझे बुलाना है तो जसा कहू वैसा ही करना होगा। जैसलमेर से जो दूत आया था उसको तो देवजी ने अपने पास ही बिठा वा और अपना दूसरा आदमी जैसलमेर के लिए रवाना किया। जो देवजी ने राजा को संदेश भेजा था वही ठीक प्रकार से कहने वाला विश्वासपात्र व्यक्ति था। वह जाम्भोजी द्वारा भेजा गया दूत जैसलमेर के राजदरबार में जैतसी को समाचार यथावत सुनाया।

रावल ने कहा- हम राजा लोग पढ़े लिखे पंडितो की सेवा अवश्य ही करते हैं उनके कथनानुसार चलते हैं किन्तु अब जाम्भोजी को बुला रहे हैं तो जैसा वो आदेश देंगे वैसा ही हम करेंगे रावलजी ने विनती करते हुए कहा- हमारे तो गुरु चरणों की ही आरत-इच्छा है। देवजी आयेंगे तो सर्वप्रथम पूजा उनकी ही करूंगा। मैं स्वयं जैसलमेर की सीमा तक सामने आउंगा और उनकी आगवानी करके स्वागत करके अपनी नगर में प्रवेश करवाउंगा। हमारे सतगुरु देव पधारेंगे तो हमारे सभी पाप नष्ट हो जायेंगे।

 रावल की वार्ता उस सेवक ने सुनी, श्रद्धा का भाव देखा और समझा कि रावल वास्तव में प्रेमी आदमी है। इसके यहां तो जाम्भोजी का आना आवश्यक है। रावल से सीख मांगी और वापिस सम्भराथल को तरफ रवाना हुआ। कुछ ही दिनों में देवजी के पास वापिस सम्भराथल पर आ गया और रावल की भक्ति प्रेम की वार्ता विस्तार से बतलाई और कहा-

 हे देव। आपको उनकी इच्छा अवश्य ही पूर्ण करनी चाहिए, अन्यथा राजा आपसे, ज्ञान,ध्यान,श्रद्धा से दूर हट जायेगा, उसका दिल टूट जायेगा। अवश्य ही आपकी आज्ञा के अनुसार ही कार्य होंगे उन्होनें आपकी आज्ञा पूर्ण करने की प्रतिज्ञा की है। रावल ने विशेष रूप से कहा है कि हे देव। आप ही हमारी इच्छा को पूर्ण करने वाले हैं, दुःखों को मिटाने वाले हैं। तुम्हारे आने से ही हमारी लज्जा रहेगी।

 जाम्भोजी ने रावल के दूत को वापिस भेजा और कहा कि मैं जैतसी के समंद प्रतिष्ठा में अपनी मण्डली सहित अवश्य ही आउंगा। किन्तु तुम रावल से कहना है कि मेरे स्वागत हेतु कोई बहुत बड़ी सेना या ठाकुरो के साथ लाने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि जिस जिस गांव से सेना आएगी तो वहां के लोगों को कष्ट होगा। राजा स्वागत हेतु आयेगा तो आम जनता को परेशानी उठानी पड़ेगी। अधिक घोड़ा ऊंट आयेगे तो वे बेचारे मूक प्राणी बेवजह दुःख पायेगे।

 मैं जीवो को सताना नहीं चाहता। घोड़ो के खुर ताल तथा ऊंटो के पैरो के नीचे दब कर न जाने कितने जीव मारे जायेगे। मैं तो राजा के पाप – दोष हरण करने हेतु जा रहा हूं, कहीं ऐसा न हो कि पाप-दोष अधिक न हो जाये। हमारा मिलन पूर्णतया निरभिमान होकर होगा। किसी प्रकार कर दिखावा या कष्ट साध्य नहीं होगा।

जम्भेश्वर जी ने जैसलमेर चलने की तैयारी की। उसी समय साथ में रहने वाले संत भक्त भी कहने लगे हम भी चलेगे हम भी चलेगे सभी चलने को तैयार थे ऐसे अवसर को कोई हाथ से जाने देना नहीं चाहते थे। उनमें सभी भगवान के भक्त ही थे किसको पीछे छोड़े किसको साथ में ले। इसलिये श्री देवजी ने सभी को ही चलने की आज्ञा प्रदान कर दी।

भक्तो के सिर पर टोपी, हाथ में जप माला, उज्जवल वागा – कुर्ता पहने हुऐ, अन्तर – बाह्य शुद्ध पवित्र थे। सवारी हेतु मजबूत स्वस्थ तेज चलने वाले ऊंट साथ में लिये हुये, ऐसी मण्डली श्री देवजी के साथ चली। जैसे संत पवित्रात्मा थे वैसे ही अपनी सवारियो को भी सजाया था। देवजी अपनी मण्डली के साथ शोभायमान होकर जैसलमेर के लिये प्रस्थान किया।

इस प्रकार से जैसलमेर जाते समय देवजी के साथ तीन सौ पचीस ऊंट थे सबसे आगे देवजी का ऊंट चल रहा था। चलते हुऐ ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो आकाश में विमान ही उड़ते जा रहे हो। मानो स्वंय विष्णु ही देवताओ के साथ विमानो पर बैठ कर स्वर्ग लोक से आ रहे हो। मार्ग में जांगलू, खीदासर, जाम्भोलाव आदि स्थानों को पवित्र करते हुए वहां के लोगो को प्रसन्न करते हुऐ जैसलमेर की सीमा में वासणपी गांव पहुंचे।

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