रोम रोम में बसा हुआ है,
एक उसी का नाम,
तू जपले राम राम राम,
तू भजले राम राम राम,
रोम रोम में बसा हुआ हैं ॥
लोभ और अभिमान छोड़िए,
छोड़ जगत की माया,
मन की आँखे खोल देख,
कण कण में वही समाया,
जहाँ झुकाए सर तू अपना,
वही पे उनका धाम,
तू जपले राम राम राम,
तू भजले राम राम राम,
रोम रोम में बसा हुआ हैं ॥
ये मत सोच जहाँ मंदिर है,
वही पे दीप जलेंगे,
जहाँ पुकारेगा तू उनको,
वही पे राम मिलेंगे,
दर दर भटक रहा क्यों प्राणी,
उन्ही का दामन थाम,
तू जपले राम राम राम,
तू भजले राम राम राम,
रोम रोम में बसा हुआ हैं ॥
ये संसार के नर और नारी,
देवी देवता सारे,
नहीं चला है कोई यहाँ पे,
उनके बिना इशारे,
वो चाहे सूरज निकले,
वो चाहे तो ढलती शाम,
तू जपले राम राम राम,
तू भजले राम राम राम,
रोम रोम में बसा हुआ हैं ॥
गंगा अष्टोत्तर-शतनामस्तोत्र - नामावली (Ganga Ashtottar Shatnam Stotra)
श्री जगन्नाथ आरती - चतुर्भुज जगन्नाथ (Shri Jagganath Aarti - Chaturbhuja Jagannatha)
रोम रोम में बसा हुआ है,
एक उसी का नाम,
तू जपले राम राम राम,
तू भजले राम राम राम,
रोम रोम में बसा हुआ हैं ॥








