जाम्भोजी का भ्रमण
जाम्भोजी का भ्रमण

               जाम्भोजी का भ्रमण  भाग 5

राजा ने प्रार्थना करते हुए कहा- हे देव। आप अपने शिष्यों के सहित हमारे राजमहल में अवश्य ही पधारें। हम आपका उपकार कभी भी नहीं भूल सकते। आपका ही दिया हुआ यह राज्य है। हम सभी आपके ही अधीन हैं। हमारे रनिवास में आप चलें। आपकी बेटी मीरा आपके दर्शनों के लिए ललायित रहती है। दिन रात न जाने क्या कुछ मन ही मन गुनगुनाती है। यह कैसी बालिका है, हम तो उसको गति को नहीं समझ सकते।

हे विलह! मीरा का दादा राव दूदा जाम्भोजी का परम भक्त था। जैसा दादा था वैसा ही संस्कार मीरा जन्मजात थे। दादा तो परलोकवासी हो गये किन्तु अपनी पौत्री में भक्ति का बीजारोपण कर गये थे अथवा पूर्व जन्म की कोई भक्त देवी ही राव दूदा की पौत्री बनकर आयी थी। इस जन्म में मोरा की सतगुरु की परमावश्यकता थी। बिना गुरु के तो अन्धेरे में लट्ठ मारने वाली बात हो थी। दूसरा जन्म होने से पूर्व जन्म के संस्कार सोये हुए थे। इस समय कोई ऐसा आवे तो उन संस्कारों को जाग्रत कर दे। मोरा इस समय समझदार बालिका थी। उसे तो केवल एक ज्योति मिल जाये तो अंधकार तो भागने के लिए तैयार ही था।

 जाम्भोजी ने अपने शब्दों में कहा था- ‘जो ज्यूं आवे सो त्यूं थरप्या, साचा सों सत भायों ‘ जो जिस भावना योग्यता से आता है, श्री जाम्भेश्वरजी कहते कि मैं उसको उसी योग्यता के अनुसार ही ध्यान कर्मादिक देता हूं और जो सत्य में प्रतिष्ठित लोग है वे तो मुझे बहुत ही प्यारे है। मीरा भी अभी बालिका

में हो थी। उसे किसी भी तरह से समझाया जा सकता था वह मार्ग जो उसके अनुकूल भी हो और आसान भी हो। श्रीदेवी ने मेड़ता के राव दूदा के महल में मीरा बालिका को एक बाल कृष्ण कन्हैया की सुन्दर मूर्ति प्रदान की और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा

हे बेटी ! यह तुम देख रही हो, यह कौन है, यदि तुम नहीं जानती हो तो बतला देता हूँ। यह कृष्ण कन्हैया है, यही जगत का स्वामी है, यही घट घट व्यापक अन्तर्यामी है। यही तेरा सर्वस्व स्वामी है। इसके अतिरिक्त इस जीव का काई साथी नहीं है इसकी ही पूजा-अर्चना किया कर। मीरा ने सहर्ष वह मूर्ति लेकर अपनी छाती से लगायी और सदा-सदा के लिए प्रेमसम्बन्ध जोड़ लिया। अभी बालिका के शुद्ध हृदय में वह परमात्मा का विग्रह बैठ गया था।

 मीरा ने कहा-‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। एक समय मीरा की मां कहीं विवाहोत्सव में जाने की तैयारी कर रही थी। मौरां ने स्वाभाविक रूप से पूछ लिया कि मां! आज कहां जा रही हो? मां की मां ने कहा- बेटी! आज अपने ही सम्बन्धियों की बेटी का विवाह है वहां पर दूल्हा आयेगा। वही मुझे जाना है। मीरा ने पूछा- मेरा पति दूल्हा कौन है ? कब आयेगा? मां ने कहा- तेरा पति तो युगों युगों का स्वामी कृष्ण कन्हैया जो है, उसे तो तुम अपने पास ही छुपाये रखती है वह तुम्हारा दूल्हा है।

मीरा ने जाम्भोजी की बात सुनी थी वही बात अपनी मां के मुख से भी सुनी थी और पकी गांठ बांध | ली थी तथा मीरा ने घोषणा कर दी कि मेरा पति तो कृष्ण कन्हैया हो है। मेरे सतगुरु जाम्भोजी तथा मां ने भी मुझे यही बतलाया है। तभी से मौरा ‘मैं तो अपने सर्वालिया की आप हो हो गयी दासी रे’

 नाथोजि कहते है- हे वील्ह। भले ही मौरा का विवाह चितौड़गढ़ के राणा परिवार में राजकुमार रतन सिंह से हुआ था। सांसारिक सुख में मीरा अपने सावरिये को भूल नहीं सकी थी। राज परिवार की बह पन कर गयी थी। राज नियमों एवं अपने कर्तव्य का पालन भी किया किन्तु उसकी दृष्टि सदा ही भगवान में लगी रहे।

कुछ समय पक्षात हो मौरा के पति का देहान्त हो गया था जिनकी गोद में खेलकर मीरा बड़ी हुई थी उन राव दूदा का देहान्त तो पहले ही देख चुकी थी। इस समय अपने पति एवं अपनी जन्मदात्री माता का भी देहान्त भी मीरा ने देखा था और झेला भी था संसार की असारता को प्रत्यक्ष देखा था। मीरा का वैराग्य हो गया और अपने मायके मेड़ता में ही अधिकतर रहने लगी। साधु संत भक्तों की संगति करना, भजन गाना, प्रेम में नृत्य करना मीरा के लिए तो सहज ही था। किन्तु राजपरिवार इससे सहमत नहीं थे। वे मीरा से नाराज रहा करते थे।

मीरा को अनेकों कष्ट भी दिये। किन्तु मौरा कृष्ण को भी सुख मानकर सहन कर गयी। विष का प्याला भी अमृत करके पी गयी। विषैला सर्प भी गले का हार मानकर पहन लिया। परमात्मा जिनको सहायता करते हैं उनके लिए सभी विघ्न बाधाएं निर्मूल हो जाती है। मीरा के उपदेश देकर जाम्भोजी ने राजा से कहा

 हे राजन् । तुम अपने पिता को चलाई हुई मर्यादा को भूल नहीं जाना । मेरा दिया हुआ खांडा और भगवां वस्त्र जब तक तुम्हारे राज्य में रहेगा तब तक तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।

 हे वोल्हा! दो दिनों तक जाम्भोजी महाराज मेड़ते में ही रहे और वहां से आगे के लिए प्रस्थान किया और मनाने गांव पहुंचे। मनाने में मेहंदी राहड़ रहते थे उन्होनें देवजी को तन मन धन समर्पित किया और जमात के लोगों को प्रेम से भोजन भी दिया श्रीदेवजी के चरणचिन्ह मंडवाकर अपने घर में रखे। वहीं पर छोटा भाई टोहोजी भी उनतीस नियमों का पालन करते हुए रहते थे उन्होनें वृक्षों की रक्षा करने का बीड़ा उठाया था।

 वहां से आगे पोलास गांव में श्रीदेवी ने आगमन किया। सम्पूर्ण न्यात जमात श्रीदेवजी से मिलने के लिये आयी। वहां के गांवों के लोग भी जैसे हुड़िया, मनाणा, मोखमपुरा, भूतावा, दाबड़िया, पालड़ी, रामपुर , दमोही, आसोजाई, कुचामण, नैणास पुनास, राजोद, बिचपड़ी, जालोड़ी, राणा, इत्यादि सभी गांवों के लोग एकत्रित होकर धर्म मर्यादा में रहकर जीवनयापन करने की प्रतिज्ञा की।

 मेड़ता के गांवों से आगे चले और प्रभुजी रामडावास जा पंहुचे श्री की सुन्दर सौम्य मूर्ति का दर्शन करके भक्त लोग आनन्दित हुए रामड़ास में जगदीश्वर ने स्वयं आकर डेरा लगाया था इसलिए उस को बडेर कहते हैं। बड़े लोगों द्वारा डेरा-आसन लगाने के कारण बडेर कहते हैं। रामड़ावास में बहुत दिनों तक श्रीदेवी रहे थे। वहां पर चौसठ गांवों के लोग एकत्रित हुए थे इसलिए रामड़ावास का महत्व बढ़ गया था। ये सभी गांव जोधपुर राज्य के अधीन है। वहां पर राजा जोधा, सांतल, मालदेव तो पूर्व में ही श्री जाम्भोजी से परिचय प्राप्त कर चुके थे।

जंभेश्वर जी जब रामड़ावास में पधारे थे उसी दिन कार्तिक पूर्णिमा थी। उसी दिन प्रथम वार रामड़ावास में चौसठ गांवों का मेला भरा था। उसी दिन की स्मृति में अब भी कार्तिक पूर्णमासी को मेला भरता है। रामदास तथा अन्य गांवों को कृतार्थ करके एक दिन सबरे हौ श्रीदेवजी रामदास को धाम बनाकर चल पड़े।

उनके पीछे पीछे जमात के लोग चले आ रहे थे न जाने अब आगे कहां जायेंगे, कौनसे जीवों का उद्धार करेंगे? ऐसे जीव भी कौन से रह गये हैं जिनका कल्याण होना है? जमात के लोग पीछे पीछे चले आ रहे थे। किन्तु जिज्ञासा शांत नहीं हो रही थी एक रात्रि मेवासी की पहाड़ी पर व्यतीत को। इसलिए उस पहाड़ को मेवासो कहते हैं।

वहां से भी प्रात:काल प्रस्थान किया और दूसरे दिन लोहावट के जंगल में पंहुचे। लोहावट का वही जंगल जहां पर इससे पूर्व भी जोधपुर नरेश मालदेव से भेंट हुई थी। लोहावट को साथरी में तीन दिनों तक निवास किया और आगे बढ़ चले। एक रात्रि मूंजासर तथा दूसरी रात्रि पड़ियाल पंहुचे और वहां निवास किया। तीसरी रात्रि को शाम के समय जाम्बोलाव पर पहुंचे।

 वहां सरोवर पर जो वृक्ष के नीचे श्रीदेवी विराजमान हुए। वहीं पर सभी आसपास के गांवों के लोग आये थे। उसी दिन से ही मेले की स्थापना हुई थी। जिनके मन में जो भी संशय था उसी का समाधान श्रीदेवी से चाहते थे जाम्बेजी ने आये हुए भक्तों के भावों को देखकर अनेकों प्रकार से ज्ञान देकर समझाया था।

जैसलमेर के राव जैतसी ने यह सुना कि श्रीदेवी हमारे देश में लोगों को कृतार्थ कर रहे हैं तुरन्त अपने सभी कार्यक्रम छोड़कर के जाम्बोलाव पर आकर श्रीदेवी के सामने हाथ जोड़कर उपस्थित हुआ। राव जैतसो ने हाथ जोड़े- हे देव, अब तो मैं भी बुढ़ापे को प्राप्त हो गया हूं, इस जीर्ण शीर्ण शरीर का कुछ भी पता नहीं है। यह न जाने कब छूट जाये। आपका अन्तिम दर्शन मेरा कल्याण करेगा अथ मुझे क्या आज्ञा है? भक्तों की सेवा करूं यदि मुझे आज्ञा प्रदान करो तो मेरा सौभाग्य ही होगा।

श्री जम्बेश्वरजी ने रावण को सचेत करते हुए कहा- हे राजन् ! यह शरीर तो पंचभूतों से बना हुआ है।इसमें तुम्हारा कुछ भी नहीं है। यह तो पराया है। परायी वस्तु चाहे तो रहे या जायें इसमें किसी का भी जोर नहीं है। तुम्हारी यह जीवात्मा जो इस शरीर में बैठी हुई है भोग भोग रही है और कुछ नया कर्म भी कर रही है इन |कर्मों को लेकर इस जीर्ण शरीर से प्रस्थान कर जायेगी और नया शरीर धारण कर लेगी।

 तुम यह शरीर नहीं हो, तुम तो जीवात्मा परमात्मा स्वरूप हो । अमृतस्या पुत्रा तुम तो अमृत अविनाशी | परमात्मा के पुत्र हो । उस सर्वसमर्थ बाप के बेटे होकर चिन्तित नहीं होना चाहिये। अपने राजकुमार को अपना राज्यभार सौंप दो और अब अन्तकाल में केवल परमात्मा विष्णु का स्मरण करते हुए पीछे के थोड़े से जीवन को व्यतीत कर दो। यदि तुम्हें कुछ परोपकार कार्य करने की इच्छा है तो यहां पर सरोवर पर मिट्टी खुदवाई हेतु कुछ धन खर्च करों तुम्हारा पुण्य बड़ेगा यही परोपकार का पुण्य कार्य होगा।

 जेतसी ने पूछा- हे देव! आपकी कृपा से जैसा अपने आज्ञा प्रदान को है वह मैं अवश्य ही पूर्ण करूंगा। किन्तु मेरी एक प्रार्थना है कि आप यहां पर बहुत समय तक विराजमान रहे हैं अब भी इससे पूर्व भी किन्तु आप इस वृक्ष के नीचे ही बैठे रहे हैं. आपके लिए हम लोगों नें कोई आसन, मंदिर, मेडी आदि का निर्माण नहीं किया। आपको स्मृति सदा बनी रहे इसके लिए मैं यहां पर एक कमलासन का निर्माण करना चाहता हूं। यद्यपि आप तो कमल सदृश ही निर्लेप है। फिर भी हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए आपकी स्मृति सदा तरोताजा बनी रहे इसके लिए मैं आप से प्रार्थना कर रहा हूँ।

ऐसा कहते हुए जैतसी ने श्रीचरणों को पकड़ लिया और कहा- आप हमारी भावना को समझेंगे और ठेस नहीं पहुचायेंगे। हे वील्हा । रावल जैतसी को श्रद्धा भक्ति भाव से भगवान तो दवित हो गये और कहा जो तुम्हारी इच्छा है।

 ऐसा कहते हुए राहुल जेटली को कमलासन बनाने की आज्ञा प्रदान की। रावल जेतसी ने तुरंत जैसलमेर से पत्थर मंगवाकर श्री देवजी के बैठने की स्मृति में कमलासन का निर्माण कारवाया श्रोदेवजी ने जाम्भोलाव की महिमा का वर्णन श्रीमुख से करते हुए कहा

हे भक्तो! यह पवित्र सरोवर परमपावन तीर्थ बन गया है मुझे भी यह स्थान बहुत हो प्रिय लगता है। यहाँ पर आकर कोई सन्जन तालाब से मिट्टी निकालेगा स्त्रान, संध्या, हवन आदि करेगा तो उसके सकल पाप मिट जायेंगे। बहुत समय तक जाम्बा सरोवर पर रहने के पक्षात एक दिन वहां से श्रीदेवजी अपने सारियों के साथ प्रस्थान कर गये। वहां पहला पड़ाव रणीसीसर में किया। वहां पर भी साथरी की स्थापना करके दूसरा पड़ाव जैसला में किया। वहां से आगे चला- नाथुसर के पास झोझाला पर सैंसे कस्वें के गांव में पुनः आये।

वहां से किसनासर के पास जांगलू को साथरी पर श्रीदेवी आये। वहां से आगे चलकर कूद के पास खारा गांव में आसन लगाया। श्रीदेवी के पास जमाती लोगों ने जल की मांग की तब गांव के लोगों ने कहा- यहां तो जल खारा है। यह बात जमाती लोगों ने श्रीदेवजी से कहा कि आप तो कहते यहां का जल मीठा है किन्तु यहां के लोग तो खारा बता रहे हैं। श्री देवजी ने कहा- यदि गांव के लोग खारा बता रहे हैं तो खारा ही होगा, ये लोग झूठ क्यों बोलेंगे?

 ऐसा कहते हुए श्री देवजी आगे बढ़ गये। गांव के लोगों ने कुवें का पानी दूसरे दिन पीया तो खारा हो हो गया। दूसरे दिन अलाय की साथरी में श्रीहरि ने आसन लगाया। जहां पर भी ब्री चरण टिके बहाँ पर साथरी की स्थापना हो गयी। वहा पर श्रीदेवजी तीन दिनों तक रहे और वहां से चलकर अपनी मातृभूमि पीपासर चले आये।

 यही पिंपासर में हो तो श्री देव के माता पिता को बाल्य लीलाओं द्वारा प्रसन्न किया था। यहीं पोपासर में हो तो श्रीदेवी ने माता हांसा पिता लोहट जी को प्रसन किया था वहाीं इस पवित्र वृजभूमि में वही कन्हैया ही स्वयं नन्द-जसोदा लोहट हांसा को पुत्र रूप में आकर कृतार्थ किया था। अब तो वो पूज्य माता पिता स्वर्गवासी हो गये थे अपनी पैतृक सम्पति भी वितरण कर चुके थै। पीपासर के लोगों ने अपने को अपना ही सम्बन्धी आया जानकर धन्य माना।

पीपासर से विदा होकर अतिशीघ्र हो जाम्भोजी सम्भराचल पर ही आ विराजे। बहुत दिनों के पक्षात श्रीदेवी समराथल पर आये है। ऐसा सुनकर आसपास के गांवों के लोग छोटे बड़े सभी आने लगे। बहुत दिनों तक इस प्रकार से मिलन आगत स्वागत होता रहा। लोग अपनी समस्या लेकर आते कोई कहता हे महाराज।

आप तो बहुत वर्षों के बाद यहां पर लौटकर आये हैं। आपके बिना तो हमारा जीवन व्यर्थ ही हो गया। कोई अपनी घरेलू समस्या लेकर उपस्थित होता। कोई कहता मेरी गाय, भैंस, बकरी आदि खो गयी। आप बताने का कष्ट करें। कोई शिकारी आकर पूछता-है महाराज! मेरा बाण निशाने पर लगता क्यों नहीं ? केई राजा आकर अपनी आयु के बारे में पूछता? कोई पुत्र नारी आकर पुत्रप्राप्ति की कामना करती। कोई धनहा नारी आकर धन प्राप्ति का उपाय पूछती।

श्री जाम्भोजी’ जो ज्यूं आवे सो त्यूं धरप्या’ का सिद्धांत अपनाते । सभी को यथा योग्यता अनुसार कुछ न कुछ तो प्रदान अवश्य ही करते। साई के दरबार में आया हुआ कोई खाली हाथ लौटकर नहीं जा था। ऐसी महिमा से मण्डित श्रीदेवी समराथल पर विराजमान रहते।

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