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बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 2

 बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 2

बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 2
बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 2

गांव में प्रवेश किया तब गांव के बारे में जानकारी मिली, गांव के बाहर ही भेङबकरी की खाले पेटी पर सूख रही थी, लगता है यह जानवर अकाल की वजह से नहीं मरें है, इन्हे मारा गया है, इसलिये इस गाँव के लोगों का मांसाहारी होने में कोई संदेह नहीं है । गांव के अन्दर प्रवेश किया तो देखा कि लोग आ जा रहे है कई लोग तो सामने से आकर निकल जाते लेकिन उन लोगों ने नवण प्रणाम या आदेश आदि कुछ भी नहीं किया । नमन प्रणाम के गुणों से ये लोग परिचित भी नहीं थे।

 कुछ लोग आपस में बाते कर रहे थे एक दूसरे से जाम्भोजी का परिचय पूछ रहे थे। जिसकी जैसी समझ है वैसा ही बतला रहे थे कोई कह रहा था कि यह तो पींपासर के ठाकुर लोहटजी के पुत्र है, कोई कहता था कि यह तो गूंगे है, किसी ने कहा कि यह तो आजकल पौपासर छोडकर सम्भराथल पर रहन लग गये है। जितने लोग उतनी बाते, परन्तु कोई भी पास में आकर यहाँ आने का कारण नहीं पूछते थे।

 बापऊ गांव में खिलेरी , यादव , भाटी इत्यादि किसान लोग सीधे-साधे अपनी खेती करके आजीविका चलाने वाले रहते थे। उन्हे ज्ञान से कुछ भी लेना देना नहीं था । अब तक उनके गांव में सत्य का मार्ग बताने वाला तो कोई नहीं आया था, उन्हें क्या दोष दिया जाये। उन लोगों का खान पान भी भ्रष्ट ही था । दया दान के बारे में वे लोग कुछ भी नहीं जानते थे । भेङवकरी आदि को मारकर खा जाया करते थे । जीवों पर दया करना वे लोग कुछ भी नहीं जानते थे ।

वे लोग सुबह जल्दी स्नान करने के बारे में भी पूर्ण रूप से अनभिज्ञ थे । देवी देवता के नाम भूत प्रेत भैरू भोमिया की पूजा करते थे । इन्हे अपने कुल का देवता बतलाते थे । विष्णु के नाम की सार नहीं जानते थे । वे लोग भ्रम की सांकल में बंधे हुए थे । इनका भ्रम टूटे तो दुखों से छुटे । अपनी कमाई का धन कुपात्रों को देकर नष्ट कर देते थे । जाम्भोजी ने कहा- आप इस समय चिन्ता न करे, मेरे पास अन्न का ढेर है, मै आपको भर पेट भोजन दूंगा, ये तुम्हारे पशुधन भी यहाँ पर भूखे नही रहेगे। इन्हे घास जल आदि मिलेगा यह सम्भराथल जंगल सभी को सब कुछ देगा।

 यदि आप लोगों को विश्वास नही हो रहा है तो मेरे साथ सम्भराथल पर चलो , मैं तुम्हे अन्न की ढेरी दिखाता हूँ। ऐसा कहते हुए उन लोगों को सम्भराथल पर ले गये और सात अन्नों की सात अलग-अलग ढेरीयाँ दिखाई और कहा कि जिसको जितना अन्न चाहिए यहां आकर उतना अन्न ले जाइये। किसी को भी भूख से मरने की नौबत नहीं आने दी जायेगी।

लोगों ने जाकर अन्न की ढेरी तो अवश्य देखी किन्तु वे तो छोटी-छोटी ही थी आपस मे काना फूसी होने लगी – इतने लोगो के लिये ये ढेरीयाँ ज्यादा दिन नहीं चलेगी इन बाबा लोगो का क्या भरोसा, न जाने कल यहां से उठकर चल पडे? हमे पता भी नही चलेगा तब हम क्या करेंगे? आगे के रहेगे न पीछे के वैसे ये बाबाजी झूठ तो नही बोलते है तथा इनको झूठ बोलकर हमसे लेना भी क्या है ? किन्तु अन्न लेने से पहेले ये बाते स्पष्ट कर लेनी चाहिये।

जम्भदेवजी से उपस्थित उन लोगों ने पूछा – है महाराज ! हमें इन छोटी-छोटी ढेरीयो को देखकर तो सहसा विश्वास तो नहीं हो रहा है, इधर जनता को देखतें हैं तो बहुत ही ज्यादा है ।अन्न बहुत ही कम है क्या सभी लोगों के लिये प्रयाप्त होगा ? नया अन्न खेतो मे निपजने में तो बहुत ही देरी है जब तक हमारे खेतो में नया अत्र निपजेगा तब तक दोगे या बीच मे ही “

गुरु देव ने कहा – आप लोग निश्चित रहो,मेरे पास एक बहुत बडा साहूकार है वह देगा। उससे बढकर दुनियां में साहूकार कोई नहीं है ये तुम्हे छोटी-छोटी ढिगली दीख रही है किन्तु यह अखूट है। ज्यों-ज्यों आप ले जायेंगे त्यों-त्यों ये बढती जायेगी। ज्यों ही ज्यादा ले जाओगे त्यों ही ज्यादा बढ़ेगी।

मैं तुम्हारे सामने सच कहता हूँ कि आप लोग मेरे कहने अनुसार चलोगे तो तुम्हे एक दो वर्ष नहीं सदा- सदा के लिये अन्न देता रहूँगा , तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ मैं ही तो सृष्टि का कर्ता वह साहुकार हैँ तथा पालन पोषण कर्ता स्वयं विष्णू हूँ।, तुम्हारे उद्धार हेतु यहाँ पर आया हूँ।अब तुम लोग अपने जीवन का भार मेरे उपर छोड कर निश्चित हो जाओ अपने – अपने गाँवो को वापिस लौट जाओ जोभी आपके साथ यहाँ पर नही आये है उन्हें भी यह शुभ समाचार दे देना।

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 इस समय तो आप लोग अन्न जल द्वारा भूख -प्यास मिटाओ , जब तुम लोग तृप्त हो जाओगे तो मैं तुम्हे कुछ अन्य ज्ञान ध्यान की बाते बताऊंगा नित्य प्रति यहाँ से अन्न ले जाया करो, ऐसा कहते हुए उन लोगों को तो वापस लौटा दिया।

 कुछ ही लोग यहाँ पर चलकर आये है किन्तु अन्य गाँवो की स्थिति भी अच्छी नही है, वहाँ जाकर भी देखना चाहिये कि किस प्रकार से लोग अपना जीवन यापन कर रहे है।धर्म कर्म के बारे मे लोगो का क्या ख्याल है , ऐसा विचार करके श्री जम्भदेवजी सम्भराथल से थोडी दूरी पर ही स्थित बापेऊ गाँव

पहुंचे।

गांव में प्रवेश किया तब गांव के बारे में जानकारी मिली, गांव के बाहर ही भेङबकरी की खाले पेडो पर सूख रही थी, लगता है यह जानवर अकाल की वजह से नही मरे है , इन्हे मारा गया है , इसलिये इस गाँव के लोगों का मांसाहारी होने में कोई संदेह नहीं है। गांव के अन्दर प्रवेश किया तो देखा कि लोग आ जा रहे है, कई लोग तो सामने से आकर निकल जाते लेकिन उन लोगों ने नवण प्रणाम या आदेश आदि कुछ भी नहीं किया। नमन प्रणाम के गुणों से ये लोग परिचित भी नहीं थे।

 कुछ लोग आपस में बाते कर रहे थे एक दूसरे से जाम्भोजी का परिचय पूछ रहे थे। जिसकी जैसी समझ है वैसा ही बतला रहे थे कोई कह रहा था कि यह तो पींपासर के ठाकुर लोहटजी के पुत्र है , कोई कहता था कि यह तो गूंगा है, किसी ने कहा कि यह तो आजकल पींपासर छोड़कर सम्भराथल पर रहने लग गये है। जितने लोग उतनी बाते , परन्तु कोई भी पास में आकर यहाँ आने का कारण नहीं पूछते थे।

 बापऊ गांव में खिलेरी,यादव,भाटी इत्यादि किसान लोग सीधे-साधे अपनी खेती करके आजीविका चलाने वाले रहते थे। उन्हे ज्ञान से कुछ भी लेना देना नही था अब तक उनके गांव मे सत्य का मार्ग बताने वाला तो कोई नही आया था, उन्हे क्या दोष दिया जाये उन लोगो का खान – पान भी भ्रष्ट ही था दया दान के बारे में वे लोग कुछ भी नही जानते थे ।भेङबकरी आदि को मारकर खा जाया करते थे जीवो पर दया करना वे लोग कुछ भी नहीं जानते थे।

 वे लोग सुबह जल्दी स्नान करने के बारे में भी पूर्ण रूप से अनभिज्ञ थे। देवी – देवता के नाम भूत  प्रेत भैरू भोमिया की पूजा करते थे। इन्हे अपने कुल का देवता बतलाते थे। विष्णु के नाम की सार नही | जानते थे। वे लोग भ्रम की सांकल में बंधे हुए थे इनका भ्रम टूट तो दुखो से छुटे अपनी कमाई का धन | कुपात्रों को देकर नष्ट कर देते थे। भूत प्रेतों की सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानते थे।

 सत्य झूठ का कुछ भी पता नहीं था । कपट कुलोभ से पाप के वशीभूत हो जाते थे कभी कोई भी कष्ट आता तो भोपा भरा से पूछते कि हमारे दुखों का कारण एवं निवृति का उपाय बताओ ये उन्हें ो मार्ग में डाल देते, उन्ही से धन तो ले लेते और पाप के मंझ में डालकर डूबो देते । ऐसी दशा जाम्भोजी के देखौ थी ।

गुरु जी ने विचार किया कि ये लोग तो ऊर्जावान, शक्तिमान है किन्तु इनकी शक्ति का दुरूपयोग हो रहा था । कुछ स्वार्थी लोग इन्हे अपने स्वार्थ पूर्ति हेतु सतपंथ से दूर ले जा रहे है । देखो ये लोग ती प्रहलाद पंथी जीव है लेकिन ये लोग इस समय कुसंगति से दूषित हो गये है । इन्हें सदमार्ग का पथिक बनाना है। उन जीवों का कोई कर्म उदय हो गया था, जिससे उनकी नगरी में स्वयं विष्णू आये है ।

अन्यथा मुनि लोग जन्मों – जन्मों तक प्रयत्न करते रहते है फिर भी इस प्रकार से आकर सम्भालते नहीं हैं। इसे हुए को बचाने आये हैं। अवश्य ही कुछ नया कार्य होने जा रहा है। पाप और भूख मिटाने के लिए नाी में स्वयं देवता ही आयें हैं।

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नर-नारी सन्मुख आते किन्तु नमन करना भी नहीं जानते। बिना प्रेम के हो आकर बैठ जाते। जो प्रेम उत्साह होना चाहिये था वह नहीं था जैसा कि कोई संत महापुरुष नगरी में आया है तो उनसे कुछ जान की बात पूछना चाहिये। किन्तु ये लोग धर्म कर्म के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे, बिना जाने पूछे भी क्या कुछ है समझ में ही नहीं आती थी। 

वे लोग तो जाम्भोजी को अभी भी नंगा ही मानते थे,पूर्व जन्म का पाप अब भी उन्हें सदमार्ग का पथिक बनने से रोक रहा था लोगों ने विचार किया कि हम भाटी खिलेरी है ये तो हमारे ही नाती-धेवते है,क्योंकि इनकी मां तो हमारे ही कुल की है हम अपने भानजे से क्या पूछे हम तो इनसे कुछ अधिक ही

जानते है । ये तो हमारे घर के ही योगी है,कोई दूसरे गांव परिवार के होते तो सिद्ध होते हम उनके पांच पूजते ।

जब उन गांव के लोगों ने कोई सुपथ की बात नहीं पूछी तो देवजी ने स्वयं ही बात चलाई कि हे गांव के लोगो बुजुर्गों एवं मेरे साथियों । ” रहस्यों का जास्यौ जीवारा” आप लोगों को मालुम ही है कि भयंकर दुर्भिक्ष पड गया है, यहीं रहोगे या कहीं अन्यत्र जाओगे,अपने जीवन जीने हेतु क्या करोगे?

 लोगो ने कहा- हे महाराज ! महा भूख आ गई है यह तो सुबह खाते है तो शाम को लग जाती है,रात्री को खाकर सोते है तो सुबह को लग जाती है । यहाँ पर रहने में डर लगता है । एक टुकडा भी यहाँ पर खाने को नहीं मिलेगा । हम ही क्यों सारी दुनिया ही इस भयंकर अकाल में भयभीत हो गई है बिना अन् के तो किसी से भी नहीं रहा जाता है । समय पर भूख तो अन्न की मांग करती है।

लोग कहने लगे अन्न के बिना तो साधु,संत,सिद्ध,देव भी नहीं रह सकते उन्हे भी समय पर आश्र चाहिये,हम तो धान को ही कोठी है । अन्न के बिना तो लोग तो भूख मर कर मर जायेंगे । हम तो महाराज मरना नहीं चाहता है जाना चाहते है।

 जम्भ देव जी बोले- आप लोग बिना जाने सोचे समझे इस प्रकार की बाते मं कहे, अत्र जल के अभाव में कौन मर गए,उनकी संख्या बतलाओगे ? पालन-पोषण कर्ता भगवान विष्णु सभी को दे है,किसी को भी भूख प्यास से नहीं मरने देता। जब सर्व पालक सभी को रोजी-रोटी देता है तब आप लोग कैसे कह सकते है कि भूख से मर गये । ये जितने भी पशु-पक्षी,कौट – पतंगा,छोटे-बड़े सभी का पालन पोषण करने वाले वही है,फिर आप क्यों ऐसा बोलते हैं ।

आप लोग यह बतलाइये कि आपके इस गाँव के लिये नित्य प्रति कितना अन्न चाहिये । लोग कहन लगे,महाराज । सवा मन अन्न यदि इस गांव को मिलता रहे तो हमारे यहां से कोई भी यह गांव छोडकर नहीं जायेगा देवजी ने कहा – आप लोग कोई भी मालवे मत जाओ । यदि तुम्हारा विचार यही रहने का है,तो मेरे पास एक साहूकार है वह तुम्हे अन्न देगा, जिसको जितना चाहिये उतना देगा सवा मन से कहीं ज्यादा चाहिये तो भी देगा । अन्न देकर मोल भी नहीं मांगेगा ।

बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 3

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