जैतसी का मुकाम मन्दिर में आगमन

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जैतसी का मुकाम मन्दिर में आगमन
जैतसी का मुकाम मन्दिर में आगमन

             जैतसी का मुकाम मन्दिर में आगमन

विल्हो उवाच -हे गुरु देव क्या सिद्धेश्वर साक्षात विष्णु स्वरूप जाम्भोजी हम लोगो को छोड़़ कर चले गए ?क्या उनका दर्शन दुर्लभ हो गया?उन्होंने पचासी वर्षों में अनेक लौलाऐ की थी, क्या अब भी यदा कदा किसी ने उनकी लोला चरित्र प्रत्यक्ष देखा है?आगे भी देखते रहेगे ऐसी संभावना है?बिना चमत्कार के तो नमस्कार नहीं होगा आपने आदेश दिया है कि जाम्भोजी की आज्ञा का मैं पालन करूं किन्तु मेरे में कुछ भी तो शक्ति नहीं है,मैं यह दुरूह कार्य कैसे निभाऊंगा ? ऐसा प्रश्न पूछने पर नाथोजी कहने लगे

हे शिष्य | जाम्भोजी के बैकुंठ वास,शरीर का अन्तर्धान होने के पश्चात् की बात बतलाता हूं। जिससे तुम्हें आश्चर्य एवं विश्वास होगा। जाम्भोजी कही गये नही है। न तो वे जन्म लेते है और नहीं उनके माता- | पिता बहन-भाई आदि कुटुम्बी भी है। जिनका जन्म नहीं होगा तो वह मरेगा भी कैसे ?आवश्यकता पड़ने पर चमत्कार भी दिखाते है आगे भी मौजूद रहेगें। उन्होने कहा है -“गुरु आसन सम्भराचले”गुरु का आसन तो सदैव ही समराथल पर विद्यमान रहेगा आप लोग भूल नहीं करना।

 हे वील्ह । जांभोजी के अन्तर्धान होने के पश्चात् संवत पन्द्रह सौ अठानवै के प्रारम्भ काल की बात है जब मुकाम समाधि मन्दिर बन कर तैयार हो गया था। बीकानेर का राजा जैतसो जाम्भोजी का परम भक्त थ। उन्होनें जाम्भोजी की कृपा से ही राज्य प्राप्त किया था मंदिर बनवाने में भी पूरा सहयोग दिया था। जैतसी अपने साथ में अपने मित्र नागौर के राजा को तथा कवि को साथ में लेकर मुकाम आया था। यह देखना था कि मंदिर की प्रतिष्ठा हो गयी है कैसी व्यवस्था चल रही है। जैतसी ने मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा की और सिद्धी लगाकर मंदिर के उपर चढ़ा, तथा निज मंदिर में चढ़ावा किया और कहने लगा

जाम्भोजी री जायगा बड़ी जायगा।” उसी समय ही साथ में एक राजपूत था उसने एक दोहा कहा

‘छाया खोज न दौसतो, से हुं तो जिणो कहयो।

खुध्या तिस नोंद न व्यापती, माहरो जांभो हूं पणि मर गयो।

 उस कवि का कहने का यह आशय था कि जाम्भोजी के शरीर की छाया नहीं होती थी, उनके पैरों के निशान नहीं होते थे, तृष्णा, भूख और नींद नहीं सताती थी। छः उर्मियों से उपर ठठे हुए थे। जैसा यो कहते थे वही होता था। उनके वचन सिद्ध थे। ये सभी गुण धर्म होते हुए भी तुम्हारे जाम्भोजी मर गये।

 हे वील्ह। उस समय वहां पर हम लोग उपस्थित थे, प्रथम तो उस राजपूत ने जो कहा वह यथार्थ ही या उससे हम प्रसन्न थे किन्तु अंतिम पंक्ति में जाम्भोजी के मरने की बात कही, वह हमारे लिए असहनीय थी। वह तो बिल्कुल अनर्गल बात थी। निंदा वचन को हम कैसे सहन कर सकते थे उसी समय ही निहाल दास ने उनके जवाब में एक अन्य कविता कहा

 अंजू गंग जल बहै, अंजू गलियों रेडायर।

अंजू मेर नहीं टरयो, अंजू रिव तपै दिडायर।

 अंजू चंद आकासि, अंजू पण पक्षी फरकै।

 अंजू त्रिख रिख वनि बरी, अंजू कपूर महके।

तीन लोक चौदह भुवन, वंदन मुखि जग जस भयो।

 संसार करन अर्को अर्भ, म कहि में कहि जाम्भो मुवो।

 निहालदासजी ने जवाब देते हुए बताया-कि जाम्भो मूवो’ जाम्भोजी मर गये ऐसा क्यों कहा है? यह असंभव है, जाम्भोजी कैसे मर सकते हैं? अब तक गंगा जल बहता है, अब तक समुद्र में जल भरा हुआ है, अब तक सुमेरु पर्वत अपने स्थान पर अडिग है, अब तक सूर्य उगता है और तपता है, अब तक चन्द्रमा आकाश में चमकता हुआ दिखाई देता है, अब तक पवन चलती है, सभी को श्वास रूप से जीवन प्रदान करती है। अब तक सप्तर्षि वन में बसते हैं। अब तक कपूर में महक आती है।

जाम्भोजी की महिमा तो तीन लोक एवं 14 भवनों में फैल रही है। उनकी वंदना करने से जगत में यश की प्रासि होती है। वे तो साक्षात् विष्णु जगत के कर्ता, धर्ता, अभय दान देने वाले यहीं पर ही विद्यमान है, जाम्भो मर गया,ऐसा न कहो, न कहो।

‘दूहो कविता जैतसी सांभरिया, लियोनी देखा, खोल्य न देखों, विश्नोई अर्ज करण लागा, चवदस रे दिन जियो रहयो, साम्ही अमावस रो राति आई, नाल्हाजी ने राति सुता आवाज हुई, खोले तो खोलण द्यो, मति पालियो, आहं की निसा करिस्या, परभात तबूत खोल्य दरस्या, माथ पसेव का मोती, हाथे जप मालो फिरै। कहण लागा- बीजा रा सबद साचा न पिंड काचा जाम्भाजी रा सबद हसाचा पिंड इ साचा। अतरी कह-पछे पछतावो कियो, सड़ो कोई हिंदवाण तुरकाण कई क्यो नही सो आपा कौर्यौ । अपार रो पार कोनी पायो न पायसी। हमें केई हिंदवाण तुरकाण विचार जो मती।

उपर्युक्त दोहा कवित जैतसी ने सुनकर सचेत हुआ और कहने लगा- यदि ऐसी बात है तो समाधी खोलकर देख लेते हैं। हे वह ! उस समय वहां पर उपस्थित विश्नोई भाई बन्धुओं ने राजा के सामने प्रार्थना करते हुए कहा- ऐसा मत करो। तुम्हारे लिए यह ठीक नहीं होगा किसी भक्त राजा को ऐसा दुःसाहस नहीं करना चाहिये। इस प्रकार से संवत पन्द्रह सौ अठानवें की वैशाख कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आपस में विवाद रहा, रात्रि को अमावस्या थी, इसलिए वहां पर काफी लोग उपस्थित थे विश्नोई कहने लगे हम समाधी को नहीं तोड़ने देंगे, राजा है तो क्या हुआ? बलिदान हो जायेंगे, ऐसा अधर्म कदापि नहीं होनें देंगे।

 निहाल दास ने रात्रि में प्रार्थना करते हुए कहा हे देव। मैनें तो आपकी कृपा से जो कुछ कहना था वह कह दिया यह मेरा कथन केवल कवित ही न रह जाये, मेरे वचन को सत्य करने की आप कृपा करेंगे, अन्यथा सुबह वह राजा समाधि तोड़ देगा सभी के सामने आप और हम लज्जित हो जायेंगे। इस प्रकार की करुण पुकार करते हुए निहाल दास सो गये रात्रि में आकाशवाणी सुनाई दी कि हे नाल्हा। यदि समाधि खोलते हैं तो खोलने देना। उन्हें रोकना नहीं । उनको विश्वास दिलायेंगे।

प्रात:काल वैशाख की अमावस्या के अवसर पर समाधि की एक बड़ी उखाड़ी और राजा ने स्वयं अन्दर झांक कर देखा कि जाम्भोजी ज्यों के त्यों ज्योतिस्वरूप बैठे हुए हैं, उनके माथे पर पसीने को बून्दे मोती की तरह चमक रही है। हाथ में माला जप रहे हैं। जैतसी कहने लगा-अन्य महापुरुषों के तो केवल शब्द ही सच्चे है, शरीर कच्चा है जो फूट गया टूट गया बिखर गया। किन्तु जाम्भोजी के तो शब्द ही सत्य है और शरीए भी सत्य सनातन है। इतना कहते हुए उसने वापिस सिला लगा दी।

आंखे चकाचौंध हो गयी और पछतावा करने लगा- मैनें बड़ा भारी अपराध किया है। जाम्भोजी के शब्द नहीं माने और उन्हें देखने की कोशिश की निर्माण की हुई समाधि को तोड़ा। इस प्रकार का कार्य न तो किसी हिन्दू ने किया और न ही किसी मुसलमान ने किया। जो आज हमने करके दिखाया।

उस अपार का पार अब तक किसी ने भी नहीं पाया है और न हो कभी पा सकेगा। आगामी इस प्रकार की घटना किसी को भी नहीं करनी चाहिए इस प्रकार का परचा लैकर जैतसी वापिस बीकानेर पहुंचा। अपने परिवार को यह घटना बतलायी और कहा- मैं तो अतिशीघ्र ही संसार से प्रस्थान करूंगा, आप लोग सदा ही जाम्भोजी के प्रति श्रद्धा एवं विश्वास रखें। तुम्हारा राज्य सुचारू रूप से चलता रहेगा। तुम नहीं जानते मुझे यह राज स्वयं जाम्भोजी की कृपा से ही मिला था।

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