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जाम्भोजी का भ्रमण भाग 4

जाम्भोजी का भ्रमण  भाग 4
जाम्भोजी का भ्रमण  भाग 4

              जाम्भोजी का भ्रमण  भाग 4

एक सम वीसनोई गंगापार पूरब का अरज कोवी। जांभाजी ! तुरकाणी को जोर है। कोई हम के तुरक संताव तो क्या जवाब देंगे। जाम्भाजी कोरौ कागद लपेटय दोनो। उघाड़ देखे तो मांही अरबी दसकत है। पारसी नवासा ना बचाया। पजामा नौसर

एक समय गंगा पार पूर्व के विश्नोईयों अर्ज करी, हे जाम्भाजी ! हमारे यहां पर मुसलमानों का बाहुल्य है। यदि हमें कोई तुरक संतावे तो हम उनका क्या जवाब दवें। जाम्भोजी महाराज ने एक सफेद बिना लिखा हुआ कोरा कागज हाथ में लिया उसे लपेट दिया। थोड़ी देर में उसे उपाड़ कर देखा तो अंदर अरबी भाषा में लिख हुआ था तथा नीचे श्री जांभोजी के हस्ताक्षर थे।

वही पर किसी अरबी फारसी जानने वाले को बुलाकर पढ़ाया गया तो वह पंचनामा था वहो अरबी फारसी में लिखा हुआ पंचनामा नीचे लिखा जा रहा है। अरबी जानने वाले लोगों के लिये। इस प्रकार का पंचनामा उस अरबी जानने वाले ने पढकर सुनाया

विसमलाह हिर रमाने रहीमः फरमान बंदगी हजरतिः सेखभल सायखेः अवलीया हजरतः सेखजीहान मां वियावानी: कुद सुलाहः बिहुला अजीज वजान मुरीदा नैः मात कदानः पीरा मूरी ही फरमुद अंद केह जरती बंदगी सेख मजकूरः

गोसत ने में खुरद अदः वगल व आवः न खुरद अंदः प्रहेज दसतः सबुबराजः खवाबनबुद्धः एक पायडसतादः में मांदः रोजे वजवान मुबारकः फ रमुद अद किमादर दुनियाः फेसतात कसे आमैदमः फिसरान हि दवाराः

दर असलामे चुन्यांच कंज गाराः दान में अंदज दुहम चुना वजू बांनी फसौः नौ मुसलमै साखतः बदरदीनः महंमदरसुल अलाः स लला अलेव सलामः आवरदमः सीजद वजू ज खुदाया ताला दिगररा क्रंदनः दूरसीतनेसः व अजखुरखद अंदः सरावः वभंगः वपोसतः व अफीम: ववद अंमैल जहां वह रात परहेजः कुनांनीदः एम वायदकेः हरि मोमिनः

गवाजवस्यः ताब रइ सांरा: नजरि सफकत बुबीनंदः दरखेयाल हील: इसांन अफत दवा आकु नंदवौइज कुमंदः अमा हजारः सुकर सत केफर जदान हिदवान: पबुरजरगान खुदगुजासतः कलमै मोहम्मद रसूल अरज में कुनंदः दर्द अजीचवेह तरः हम दरीफर मुद अदः केमरी दान वफरजदानः मनजी करह क सुभान हु तालाः सबुबरोज: गाफेल नै वासदः

चुना चदर कलाम मजीद वो फुरकान हमीद खान खबर हा दइसा या अड्य हुलजीन: अवमू जिक्र लाजिनः कसीर नकसीर: त्रजमाइनसः एक साने कमान आवर दइ दपसियादे कुनंद खुदायतालाशः वसयार इयान सबु वराजः काम कालु लाहताला जिक रूलाहः कया मनव कछदनः अलाजन वहेमः वयत फकरन यानीयाद कुनंद खुदापराः दरिहाल इसदादवतीस सतः

व पहलु सत व पहलु जदः वहर चुक वासदः व अजाजी कर खुदायताला राः गाफल नं बासदः वाजे सलातीन्य मोज्य मखरा सुकरानमाल वड़ मलाक ये समै आंव रदः हजरति सेख कबुल न करद अदः वरखुवासत इसीः की समीकरन फरजदानः मराकसनरू जानद सलाती न्यवर इमांनीः मंजै में जुमलः हबबात दीवानी चुला जल कुत वफर जोट वगर जालक: माफफरमुद अतः के मुरीदानः वफरजदान मनः | |

नवा याद के समावद दसत शेख हलाक संवदः जराकर सुलः अला सललाहः अलेह सलमैः फरमत अंदः कातुलेलन पसफिनारि हरके खुदरा हल में कुनंद जाय वादर दोजख सः अगर समांराराजः वो मु जहमत विरसानदः पस एस वरकुनदः तां जायजा अज खुदाय करीम वा रहीमः विसावदः अगरतोफिक खबर नै वासदः पस एहा करम सर यह मैदर सुलराः

इला सरे सानदः अगर वो जोई निसाफनै वेदः अंगा कसरत: वरतन वस कुनंदः वदिगरफर मुदन: पंज बखत गुसल:बुकुनंद:निमाज बुग जारदःव रोजे माहमुवार कर:मजान वेदारद वज कुतमाल विदहेद नियत हजकाब विर सांनद:तावा जे मुरीदान:इलत मास करद अज:केह जार पीर दसत गीरजी:मापंजवखतःगुसलकरदनःचुगने तो वांन:नवाज फर मुदन:

केदर वक्षत वामदेव गुसल बुकनंदः दिगर वखत हाये वजू साखतःनिमाज बुकनंदःचुन्याचरू सुलःसलला अलउ सलमै फरमुद असत असला तमा दुदीन फान:अकमहा फगदःअकामुदीन मत्र कहा कुफनल हदमुदीनःइयान नमाज रावर पाय दारद पस चुनान सती के दीनःखुदरावरपास दासत वासद वाके सेक नीमाज रात्र:

कदे हलदीन खुदराख रा बकर बकरद वाद्य वगां सत खुदरा परहेज कुनंद व दुरी वासदःकी दिलरास्याह कुनंदःवसुदसुवाइगरा खुरदन परहेज कुनंदःव दुरीवासदःकी वहर के सद:सवाई वर्गीदःइके दान दकी वी अजमानेसः औमा अजवी नसतमैं कालुलाह ताला:याकल नरवी फहुव असुदल अजा:दिगर फरमुद अज खुरदन गोसत ही साबःवीसी मारस:चुकम सायखान:

महमदी व खवानंद की गोसत व खुरदःजानवर वखुसी खुरदे आंमदमज बुड़सुदहीम चुनीफरमानःहक सुभानुहुताला: जंद सुध व चराहगां मरफतःपस एमुरीदान मनःए चुनी करामात दरमीयान सुं मा की जासं की जानवर आखु सीखुरदं आमंद मजबुसवाद वकीत वान दकी वो राज्य दा:कुलदीप सिंह तरक्की परहेज कुनंदःगल वगल खुरदन माफसव जाम च्यारय सदीवा पांच सदीम फसाह कसु भानहुं ताला:मोहम्मद मुसतफा:सललाह अलहु सलम:अफंव फरमंद सव कलमै तइय बगोयदःअलाहि लाहि इललाहि महमंद रसूली लाहि तादर आयंद भर भारत विलाही साव:वलिलाय जाब एति य जानु”

एक सम जाम्भोजी आपका हजुरोया नु कहते थे माइंड की पहेली जाणौ थी।

जाम्भोजी कहया जाण्यस्यां -जाम्भोजी पहेली कह

 मांडा सगते धरम कराया,जा धरमां उपरी भाव।

 दोनो पंच बताइयां,मन मान जीह जाय।

साथरियां कहे देवजी इह की विचार कहो -जाम्भोजी विचार कहानी, ऋ्रय जमाती सुण्यौ जी न कही वोल्ह जी कथा ज्ञान चरी कही

पूर्वदेश कीज कालपी कानपुर आदि में भ्रमण करते समय श्री देवजी ने वहां के लोगो को धर्म पर दृढ रहने के लिये कहा था उपरोक्त शब्द प्रदान किया था तथा बतलाया था कि यदि कोई आपके साथ जोर जबरदस्ती करे तो उपरोक्त पंचनामा शब्द दिखा देना।

कभी भी धर्म को जोर जबरदस्ती से नहीं चलाया जा सकता धर्म तो अपनी इच्छा के अनुसार ही ग्रहण किया जा सकता है धर्म तो स्वभाव है अपना स्वभाव तो अपना ही रहता है दूसरे का जोर जबरदस्ती थोपा नहीं जा सकता थोड़ी देर के लिये भले ही किसी को मजबूर किया जा सकता है किन्तु समय आने पर पुनः यथावत हो जाता है।

 नाथोजी कहते है -हे बील उस समय की बात है जय श्री देवजी के साथ हम कानपुर में थे एक समय श्री जांभोजी ने स्वंय ही अपने साथ रहने वाले सारियों से पूछ आप माड यानी जोर ने पहेली का विचार बतलाया-यदि जबरदस्तो-शक्ति के बल पर धर्म चलाते है तो वह धर्म नहीं है हिन्दू या मुसलमान जिनका जिस धर्म पर भाव है वह धर्म ग्रहण करेगा।

 दोनों हिन्दू एवं मुसलमान धर्म बता दिया है जिसको जिस धर्म पर चलना है वह उसी धर्म पर चले। इस प्रकार का विचार श्री देवजी ने बतलाया सभी साथरियों ने सुना । हे वील्ह मैंने भी सुना था, और वही विचार मैं तुम्हें बतलाता हूं। तुम भी इस विचार से आगे बढना।

इस प्रकार से श्री देवजी कानपुर से जबलपुर और गाडरवाड़ा होते हुए मालवै आये। वहां पर महाराज एवं दावद दोनों भाईयों को सचेत किया। ये लोग भी पूर्व देश के रहने वाले थे। श्री देवजी को देखकर उन्हें चेता हुआ। अन्यथा ये लोग विश्नोई पंथ से दूर हटते जा रहे थे। साक्षात विष्णु ही आये है ऐसा देख

कर वहां प्रहलाद पंथ के छः सौ जीव भी श्री चरणों में आये और अपनी सृति प्राप्त की। सोध्या जीव जीव “जीवों की खोज की थी। यह बात सत्य है।

वहां से चलकर जमात मेवाड़ आयी चितौड़ देश के शासक सांगा राणा और उनकी माता झालीराणी श्री देवजी के अनुयायी थे सांगा की मांग पर ही श्री देवजी ने पूर्व देश के व्यापारियो को चितौड़ को राज्य सीमा में पुर,दरीबा,संभेलिया आदि गांवों में बसाया था वहां क्षत्रिय वंश के विश्नोई निवास करते है ।पुर में घाटंजी थापन रहते है।वही पर श्री देवजी विराजमान हुऐ।

पुर निवासियो ने सुना कि देश देशान्तरों से भ्रमण करते हुऐ आज हमारे देव हमारे हो ग्राम में पधार चुके है गांव के लोग एकत्रित होकर बोल नगाड़े मृदग आदि अनेको वाद्य बजाते हुऐ नृत्य गान करते हुऐ श्री देवजी का स्वागत किया श्री जाम्भोजी ने उन्हें ज्ञान ध्यान नियमो का उपदेश दिया उनके द्वारा दी हुई प्रेम भेंट स्वीकार की संत शिरोमणी श्री देवजी पुर गांव में विराजमान थे।

 सदा ही साथ में रहने वाले हरि के परम भक्त रणधीरजी एक दातुन तोड़ लाये वैसे तो जाम्भोजी ने नियमों में कहा था कि हरा वृक्ष नहीं काटना अर्थात् दातुन भी हरे वृक्ष नहीं तोड़ना किन्तु रणधीर जी ने दातनु तोड़ी इसलिये अपराधी भाव से मुंह नोचे किये हुए खड़े थे ।जाम्भोजी ने देखा कि आज रणधीर 

उदास खड़े है हाथ में बैर की दातुन ले आया है।

 जाम्भोजी ने कहा -हे रणधीर सिंह दातुन तुमने झाड़ों की हो तोड़ी है किन्तु डाली तोड़ तो डालो ही है अब तुमने अपराध कर ही डाला किन्तु अब भी समय है इसे तु जमीन में गढा खोदकर गाड़ दे ए | पुनः अपने आप जैसी बैरी थी वैसे ही बन जायेगी इसके मीठे मीठे फल लगेगें वच्छचे बडे लोग जीमेगें तो तुम्हारा प्रायश्चित हो जायेगा यदि जान या अनजान में वृक्ष को हानि पहुंची है यानि काटा गया है तो उस पाप का शमन करने के लिये पुनःदूसरा वृक्ष लगाया जावे।

 हे बोल्ह इस प्रकार से श्री देवजी के कहने पर उनकी ही प्रेरणा से वह डाली गार में गाड़ दो गयी, वही डाली हराभरा फलदार वृक्ष बन गया अब भी वहीं खड़ा हुआ श्री सिद्धेश्वरजी को स्मृति ताजा करता था अभी ही कुछ समय पूर्व मुझे समाचार मिला है कि घाटम जी का एक छोटा सा पौत्र उसी बैर के नीचे खेल रहा था उस बैर का एक कांटा चुभ गया छोटा बच्चा रोने लगा -उस ब्े की मां ने उल्लाना देते हुऐ कहा

यह जाम्भोजी ने क्या किया ?वैरी का पेड़ लगाया है यदि बड़-पीपल लगाते तो दर्शन ही करते आज इस प्रकार से कांटा तो नहीं चुभते इस प्रकार से दुखी मन से घर परिवार के लोग सो गये प्रातःकाशत उळकर देखा तो वहां पर बैर के बीच में बड़ उग आया था यह दिव्य चरित्र गांव के सभी लोगो ने देखा था अब तक तो वह बेर में उगा हुआ बड़ का पेड़ ज्यो का ल्यो खड़ा हुआ है।श्रो देवजी का परिचय दे रहा है।

 इस प्रकार से पांच दिनो तक श्री देवजी पुर में हो रहे जहां पर चरण चिन्ह चिन्हित हुऐ वहां पर साथरी बन गई पुर से रवाना होकर श्री देवजी दरोगा होते हुऐ संभेलिया पहुंचे संभेला गांव के पास ही सांगा राणा ने तालाब खुदवाया था तथा तीर्थ स्नान के लिये पेड़िया बन्धवायी थी।

सभी जाति पाति के लोग वहां पर एकत्रित हुए थे वहां पर समेलन किया था इसलिये उस जगह का नाम संभेलया पड़ा। परम पवित्र तालाब के किनारे श्री देवजी ने आसन लगाया था वहो पर हो हवन यज्ञ करके ज्योति की स्थापना की थी श्री देवजी ने तालाब का महात्मय बतलाते हुऐ कहा था कि यह स्थल गंगा यमुना जाम्भोलाव सदृश हो परम पवित्र है। इस तीर्थ स्थल में स्नान करने से पापों की निवृति होती है। जहां पर श्रीदेवी ने आसन लगाया था हवन किया था वहां पर एक स्थिर थम्भा-खंभा रोपा था। उस पर एक पटड़ा चढ़ाया था जिसे यज्ञ स्तूप कहा जाता था।

सांगाराणा ने पूछा था कि-हे हरि! यह क्या कौतुक कर रहे हैं ? श्रीदेवजी ने सांगा को सचेत करते हुए कहा था मैनें यहां पर तुम्हारे राज्य की स्थिरता हेतु यह यज्ञ स्तूप रोपा है, जब तक यह स्थिर रहेगा तब तक |तुम्हारा राज्य भी स्थिर रहेगा। ध्यान रहे कि इसे कोई हिला न पाये यदि हिल गया तो तुम्हारा राज्य भी हिल जायेगा।

सांगा राणा ने बात सत्य कर मानी और वहां पर चौकीदारों करने हेतु अपने सिपाहियों को बिठा दिया था तथा उसी उपलक्ष्य में साल में दो मेले भरते हैं। हे वौल्ह! इस समय तो वहां पर जाम्भोजी का चेला साणिया भूत-प्रेत सेवी वहां पर पंहुच चुका है। उसी चौकी पर ज्योति मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ करने के लिए प्रयत्नशील है तथा तालाब की संवराई खुदवायो का कार्य भी उसने अपने हाथ में लिया है।

हे वीलह। मुझे विश्वास है कि यह व्यक्ति वहां पर विशाल मंदिर का निर्माण करवायोगा क्योंकि उसको वही पर इमली के पेड़ के नीचे अथाघ धन की प्राप्ति हुई है। इसमें भी मैं श्रीदेवजी की ही प्रेरणा मानता हूं। मुझे पूर्ण विश्वास है क्योंकि इस मंदिर की नीव तो श्री देवजी ने अपने हो हाथों से रख दो थी जाम्भोजी का प्रारम्भ किया हुआ कार्य तो अवश्य ही दिव्य तथा परिपूर्ण होगा।

 सतगुरु जाम्भोजी ने मेवाड़ में परोपकार का दिव्य कार्य पूर्ण करके वहां से आगे चले और मेडता की तरफ प्रस्थान किया। पीछे नौबता बजती रही। अश्रुपूर्ण नेत्रों से प्रेम विभोर होकर श्रीदेवजी को निहारते रहे। जब तक आंखों से ओझल नहीं हो गये तब तक उन लोगों को एकटक दृष्टि लगाये हुए देखा गया

हे विल। प्रेम ही जीवन का रस है। बिना प्रेम का जीव तो शुष्क मरूभूमि की तरह केवल नाममात्र का है। सभी प्राणियों के प्रति प्रेमभाव हो तो उन्ही में ईश्वर का दर्शन सुलभ करवाता है। प्रथम प्राणियों के प्रति प्रेमभाव होवे तो उसी प्रेम का विस्तार हो ईश्वरीय प्रेम है। वहां के लोगों का प्रेमभाव तो हमने अद्भुत अनिर्वचनीय ही देखा था संतों की मण्डली श्रीदेवजी के पीछे गंगा की धारा सदृश चलो और मेड़ता आ पंहुची।

 मेड़ता के राव दूदा को श्री जाम्भोजी ने केर की लकड़ी दी थी और कहा था कि यह खांडा ले जाओ जब तक पास में रहेगा तब तक तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा। इस बात को दूदा का बेटा जानता था। अपने पिता के लिए राज्य दिलाने वाले को भी जानता था। उस समय दूदा का बेटा राजसिंहासन पर विराजमान था। वह अपने परिवार के लोगों के साथ श्रीदेवी का स्वागत करने हेतु अनेकों प्रेम की भेट लेकर आया था।

जाम्भोजी का भ्रमण  भाग 5

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जांभोजि द्वारा किए गए प्रश्न बिश्नोई समाज के बारे में?

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