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समराथल पर गंगा का आगमन …….. समराथल कथा भाग 12

समराथल पर गंगा का आगमन …….. समराथल कथा भाग 12
समराथल पर गंगा
समराथल पर गंगा

  समराथल पर गंगा का आगमन     मुमुक्षुजनों की जमात से घिरे हुए जम्भदेव जी एक समय सम्भराथल पर विराजमान थे। उस शांत सौम्य वातावरण में जम्भ गुरु जी को विशेष रूप से इलोल आया अर्थात् आनन्द की लहर जो अन्दर रोकने से भी रुक नहीं सकी, बाहर प्रगट हो गई। उसी समय स्थिर न रह सके और खड़े हो गये। पास में ही रखा हुआ फावड़ा हाथ में उठाया और जमीन खोदने लगे। तभी पास में बैठे हुए विश्वसनीय सेवकों ने कहा-महाराज आप यह क्या करने जा रहे हैं, हमें आज्ञा क्यों नहीं देते। जो कार्य आप कर रहे हैं वह तो हम भी कर सकते हैं।

गुरु जी ने कहा कि जो कार्य हम करने जा रहे थे वो तुम्हारे से होने वाला नहीं था क्योंकि अभी कुछ समय पूर्व इस धरती पर गंगा की एक धारा आयी थी। मैं इस धरती को खोदकर प्रगट कर देना चाहता था किन्तु दूसरे ही क्षण में तो उस भूमिगत धारा ने अपना मार्ग ही बदल दिया है। उसे बहने के लिये अब दूसरा मार्ग मिल चुका है। अब यहां पर वापिस आना कठिन है क्योंकि इस दुनियां में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है।

उन पर एकरसता का अभिमान नहीं किया जा सकता। आज यहां पर जो नदी, थल, पर्वत आदि हैं वह कल नहीं रहेंगे जो कल थे वे आज नहीं रहेंगे। ऐसा ही कुछ प्रकृति का नियम सदा से ही चला आ रहा है।

साथरिया जमाती लोगों ने पुनः प्रार्थना करते हुए कहा कि हे प्रभु! आप कृपा करके इस सिद्ध थल पर पुन: उसी गंगा की पवित्र धारा को अपनी सिद्धि से प्रगट कर दीजिये, जिससे हम लोग यहीं पर रहते हुए गंगा स्नान का फल प्राप्त कर सकें क्योंकि इस देश से गंगा जी तो बहुत ही दूर है वहां पर पहुंचना अति कठिन कार्य है। तब जम्भदेव जी ने शब्द नं. 98 उन लोगों को सुनाते हुए कहा –

 जिंहि गुरु के खिण ही पाऊं, खिण ही सीऊं।

 खिण ही पवणा खिण ही पाणी, खिण ही मेघ मंडाणों।।

विशेष अर्थ के लिये शब्दवाणी जम्भसागर का अध्ययन कीजिये। तथा यह भी बताया कि आप लोगों को यदि तीर्थों पर ही विश्वास है तथा उन्हीं से मुक्ति होना स्वीकार करते हैं तो यह सम्भराथल भूमि ही अड़सठ तीर्थों के समान पुण्य फलदायी है। क्योंकि तीर्थ तो उस भूमि को ही कहा जाता है जहां पर किसी महापुरुष ने, संतो ने तपस्या की हो। अपनी तपस्या से उस कण-कण को पुण्यमय परम पवित्र किया हो तो यह संभराथल ऐसा ही तीर्थ है यहां से आपको वह ज्ञान की ज्योति मिलेगी जिससे आप कृत-कृत्य हो जागो फिर आपको कहीं पर भी जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

अड़सठ तीर्थ का फल सम्भराथल पावै”। इस वार्ता का श्रवण करके पुनः जमात के सुविज्ञ जन कहने लगे हे प्रभु! हम तो आपके सामने प्रस्तुत होकर आपके मुखारविन्द का मकरंद पान कर रहे हैं किन्तु आगामी आने वाली संतान परम्परा को तो यह सभी कुछ उपलब्ध नहीं हो सकेगा न तो शायद आप ही इस शरीर द्वारा यहां उपदेश करते हुए दर्शन दे सकोगे और न ही हम लोग भी, तो वे लोग कैसे इस सम्भराथल की महिमा को जान सकेंगे उनके लिये अन्धकार ही दिखायी देगा

और अन्धकार में वो लोग अवश्य ही भटक जायेंगे उनके लिये कोई उपाय अवश्य ही कीजिये जिससे उनकी श्रद्धा टिक सके और वे भी सद्मार्ग के अनुयायी होकर अपने जीवन को सफल कर सकें क्योंकि स्थूल बुद्धि वालों के लिये तो हृदय के तीर्थ कुछ भी भलाई न कर सकेंगे उनके लिये तो बाह्य स्थूल गंगादिक तीर्थ ही श्रद्धा ज्ञान के विषय हो सकते हैं। इसलिये ऐसा कोई उपाय अवश्य ही बतलाइये जिससे मानव के कल्याण का सुमार्ग सदा-सदा के लिये प्रशस्त हो सके।

इस प्रकार की विनती अपने प्रिय शिष्यों द्वारा श्रवण करके गुरु जम्भदेव जी ने सचेत करते हुए कहा कि इस समय तो जो गंगा की धारा भूमिगत होकर आयी थी वह तो पुनः दूसरे मार्ग द्वारा अन्यत्र चली गई है किन्तु आगामी अति निकट समय में एक ही अन्य यमुना तथा सरस्वती की पवित्र धारा इसी भूमि के नीचे से होकर चला करेगी जिसको भूमि खोद करके प्रगट किया जा सकता है आने वाले समय में ऐसा ही होगा आप लोग किसी बात की चिन्ता न करें ऐसा ही होता देखा गया है प्रतिक्षण यह संसार परिवर्तनशील रहा है।

कभी इसी भूमि के ऊपर महान समुद्र हिलोरे लेता था तथा कुछ समय पश्चात् वह समुद्र तो नहीं रहा किन्तु पवित्र सरस्वती नदी यहीं से होकर जाया करती थी जिसके किनारे बड़े-बड़े ऋषियों के पवित्र आश्रम हुआ करते थे तथा अन्य भी सैकड़ों छोटी-मोटी सहायक नदियां तथा गुलाब जल से भरे हुए रहा करते थे। इस समय भूमि के ऊपर का अथाह जल तो सूख चुका किन्तु भूमिगत तो अब भी विद्यमान है। इसलिये परिवर्तनशील संसार में आश्चर्य की कोई गुंजाईस नहीं है।

आज के वैज्ञानिक भी तो यही कहते हैं कि पहले सरस्वती नदी इस मरुभूमि के ऊपर चला करती थी किन्तु अब भूमिगत हो चुकी है। इस समय कहीं-कहीं पर जहां नदी के अथाह जल की धारा प्रवाहित हो रही है वहां पर तो कूवे में अथाह मधुर जल प्राप्त होता है और जहां पर नदी की धारा प्रवाहित नहीं है वहां पर जल यदि कहीं मिलता है तो बहुत ही कम जो गर्मियों में सूख जाता है तथा कहीं पर सर्वथा अभाव है या नमकीन जल मिलता है।

गुरु जम्भेश्वर जी के कथनानुसार इस समय जो सम्भराथल पर कुवे में अथाह मधुर जल की प्राप्ति हुई है वह पवित्र सरस्वती का ही जल है। संसार में गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों नदियों का जल अति पवित्र माना जाता है। इस समय गंगा तथा यमुना ये दोनों नदियां तो बाह्य देश में प्रगट हैं किन्तु ऊपर हिमालय को छोड़कर नीचे के मैदानी इलाकों में ये भी अब पवित्र नहीं कही जा सकती हैं।

सरस्वती तो हिमालय से ही भूमिगत होकर इस मरूदेश में समराथल तक अबाध गति से अति पवित्रता से ही पहुंचती हैं तथा वैसे भी जंभेश्वर जी ने कहा है “पीजै ऊंडा नीर” गहरा जल सदा ही पवित्र स्वास्थ्यवर्धक होता है। वही पान करना चाहिये। इसलिये इस समय भले ही गंगा यमुना का तीर्थ स्नान उत्तराखण्ड हिमालय में सुलभ हो किन्तु सरस्वती का स्नान तो उन स्थानों में सुलभ नहीं है किन्तु यहां सम्भराथल पर सरस्वती नदी का स्नान, आचमन, पान सर्वथा सुलभ हो चुका है। अत: हम कह सकते हैं कि “अड़सठ तीर्थ का फल सम्भराथल पावै”।

समराथल कथा भाग 13

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