गुरू आसन समराथले ——– समराथल कथा भाग 11

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              गुरू आसन समराथले —- समराथल कथा भाग 11
समराथल कथा भाग 11
समराथल कथा भाग 11

परम पवित्र प्रकृति की छटा को निहारते हुए जम्भदेव जी हरि ककड़ी के नीचे उसी बालुकामय आसन पर विराजमान होकर सदा ध्यान मग्न रहा करते थे तथा कुछ समय तक समाधिस्थ भी रहा करते थे। तो कुछ समय तक जन हितार्थ बारह करोड़ प्राणियों के उद्धारार्थ अमृतमय वचन श्रवण करवाया करते थे। उसी समय ही देश-देशान्तरों से अनेक लोग अपनी जिज्ञासा पूर्ति के लिये आते थे तो कुछ लोग सांसारिक समस्याएं आपसी झगड़े झंझट लेकर उपस्थित होते थे तो कुछ लोग मुक्ति की कामना से भी आया करते थे।

“जो ज्यूं आवे सो त्यूं थरप्या” जो जिस भावना को लेकर उपस्थित होता था उसको वैसा ही उपदेश दिया करते थे तथा कुछ लोग नाना प्रकार की भेंट लेकर भी आते थे।    उसी समय ही एक कन्नौज का धनवान बिश्नोई बहुत दूर से चलकर सम्भराथल पहुंचा था तथा बड़े ही प्रेम भाव से साथ में एक मखमल के सुन्दर वस्त्र का अति कोमल आसन लाकर जम्भ गुरु जी के भेंट में दिया और कहने लगा-हे प्रभु! मैं इस आसन को आपके लिये विशेष रूप से बनाकर लाया हूं आप इसे स्वीकार कीजिये।

रात्रि में इस पर आरामपूर्वक शयन कीजिये, आपको बहुत ही अच्छी निद्रा आयेगी। मैं देखता हूं कि आपको यहां पर थोडा भी सख नहीं मिल पा रहा है क्योंकि यहां के लोग अति कठोर है, ये लोग समय-असमय की कुछ भी परवाह नहीं करते, जब चाहे तब आपके पास आकर अपना दुख सुनाने लग जाते हैं।   तथा यह सम्भराथल भूमि भी अति कठोर ही है। यहां पर सर्दी में तो अत्यधिक ठंड पड़ती है तथा उसी प्रकार गर्मियों में भयंकर लू चलती है।

समयानुसार मौसम अपना पूरा प्रभाव दिखाता ही है तथा आपके बैठने के लिये कोई मन्दिर महल आदि भी तो नहीं बने हुए हैं। इसलिये हम लोग आपकी कुछ सेवा करना चाहते हैं। तब जम्भदेवजी ने उसकी वार्ता को ध्यानपूर्वक श्रवण करके शब्द इस प्रकार से कहा कि “जे म्हां सुता रेण बिहावै तो बरतै बिम्बा बारू। हे सेठ! यदि तुम्हारी इस कोमल शय्या पर सोते हुए यदि हम रात्रि व्यतीत कर दें तो इसका मतलब होता है अर्थात् हमारे सोने में प्रलय हो सकती है तो इस असमय अकस्मात् प्रलय में चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, सिद्ध, साधक, मुनिजन सातों पाताल आदि सभी लज्जित हो जायेंगे। मर्यादा को तोड़ना ही मेरा इस कोमल शय्या पर सोना होगा।    

इसलिये यह हरि कंकेहड़ी ही मेरी मंडप महल मन्दिर है तथा सहजशील स्वभाव ही मेरा सुकोमल शय्या का आसन है जो सदा ही मेरे पास में रहता है। मुझे इन परिस्थितियों में कष्ट का अनुभव नहीं हो रहा है। मैने भी इससे पूर्व अवतारों में अनेक सुखों का उपभोग भी किया है तथा साथ में उन महान कष्टों का सामना भी अति हर्ष के साथ किया है। इस समय भी मुझे यह सभी कुछ करके अपना कार्य पूर्णकरके अति शीघ्र ही वापिस चले जाना है।

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“बारह थाप घणा न ठाहर” सुख तथा दु:ख ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं एक के बाद दूसरे का आना निश्चित ही है तथा एक के बिना दूसरे की सत्ता भी नहीं हुआ करती है। इसलिये मैं तो इन्हीं सुख तथा दुःखा से ऊपर उठ चुका हूं। यह कोमल धरती की बालका ही मेरे लिये अति उत्तम आसन है। मुझे अन्य किसी प्राकृत आसनों की आवश्यकता नहीं है।

समराथल कथा भाग 12

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Sandeep Bishnoi

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