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श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 2

श्री राम कथा ओर जाम्भोजी
श्री राम कथा ओर जाम्भोजी

               श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 2

                               शब्द -61

ओ३म् कैते कारण किरिया चूक्यौं, कैते सूरज सामो थुक्यो ।

कैते ऊभै कांसा मांज्या, कैते छाण तिणूका खैंच्या।

 कैते ब्राहमण निवत होड्या,कैसे आवा कोरंभ चोरया।

 कैते दाड़ी का बन फल तोड़ना, कैसे जोगी का खपर फोड़या। कैसे ब्राह्मण का तागा तोड़या, कैंथे बेर बिरोध धन लोड्या। कैते सूवा गाय का बच्छ बिछोड़या,कैते चरती पिवती गऊ बिडारी।

 केते हरी पराई नारी, कैंते सगा सहोदर मारया।

कैते तिरिया शिर खड़ग भार्या, केते फिरते दातण क्यों ।

 कैते रण मैं जाय दो दीयों, कैंते बाट कूट धन लीयों।

किसे सरापे लक्ष्मण हइयो।

 श्री राम जी ने कहा-हे भाई- तुमने इन अठारह दोषों में से कौन सा दोष किया। लक्ष्मण ने कहा- भाई कोई मुझे निर्दोषी को दोष कहता है वे कौन से दोष है जो शक्ति बाण लगने के कारण बन सकते है। उन्हीं दोषों को राम जी ने गिनाये है। वही दोष श्री जाम्भेश्वरजी शब्द द्वारा बतलाते है।

 हे लक्ष्मण-तुमने कौन सी कारण क्रिया में चूक की है। क्या तुम काली ब्राही द्वारा किये हुऐ छल में चूक गये। जो भी कर्म करते हैं वही कारण एवं क्रिया है। कहां चूक गये? कौन सा ऐसा कर्म हो गया जिससे यह शक्ति बाण लगा, यह घोर विपति आयी।

 क्या तुमने सूर्य के सामने थूक दिया? सूर्य को तो प्रणाम करना चाहिये था क्या तुमने सूर्य का अपमान किया? सूर्य की सता- तेज को तुमने नकार दिया। क्या तुमने खड़े होकर बरतन साफ किया? कुछ कार्य बैठ कर ही किये जाते है, वे कार्य तुमने खड़े हो कर किये। जैसे-भोजन पूजा-पाठ, यज्ञ, वार्तालाप, सत्संग आदि बैठ कर किये जाते है। खड़े होकर भोजन करने से अन्न देवता शाप देता है। क्या तुम अत्र देवता द्वारा शापित किये गये हो? क्या तुमने किसी गरीब की झोपड़ी तोड़ दी, किसी को उजाड़ दिया है।

क्या तुमने किसी ब्राहमण,संत, भक्त,सज्जन पुरूष को भोजन का निमन्त्रण देकर भोजन नहीं करवाया ?क्या तुम किसी ऋषि पुरूष द्वारा शापित हुए हो। क्या तुमने कुम्हार के आवा में से बरतन चुरा लिये है ? अर्थात कोई चोरों का कार्य किया है। सच्ची कमाई करने वाले के धन का हरण कर लेना उसके दुख का पार नहीं है। उसी दुखी व्यक्ति द्वारा तुम्हे शाप दिया गया होगा क्या तुमने किसी खेत से धान फल फूल आदि चुराये है? बाड़ी के फल अभी पके भी नहीं थे क्या तुमने तोड़, लिये। अथवा तुमने हरे वृक्ष काटे होंगे। बिना पके पराये फल तोड़ने से प्रकृति शापित करती है। असमय में धान, फूल फल आदि तोड़ने में दोष है।

 क्या तुमने योगी साधु पुरूष भिक्षुक के हाथ का भिक्षा पात्र तोड़ दिया ? सुपात्र भिक्षुक को भिक्षा देनी चाहिये। तुमने क्या एक मात्र सहारा भिक्षा पात्र को ही तुमने तोड़ डाला न तो स्वंय ही भिक्षा दे सका और नहीं कोई और ही दे सके ऐसा अपराध तुमने लक्ष्मण कर दिया।

क्या तुमने ब्राह्मण का तागा तोड़ डाला। ब्राह्मण की आजीविका का साधन ही तुमने समाप्त कर डाला। या, क्या तुमने ब्राह्मण की प्रतिज्ञा नियम को भंग कर डाला। नियम मर्यादा बांधने का सहयोग करना चाहिये किन्तु तुम नियम भंग करने में हेतु बन गये। उसी दोष के कारण शक्ति लगी है। क्या तुमने किसी से वैर विरोध धन ले लिया।

हे कुंवर – तुम राजकुमार हो राज कार्य हेतु धन ले सकते हो किन्तु जोर जबरदस्ती से नहीं । अपनी खुशी से मुद्द्यांनुसार ही धन कोई लेता और देता है तो वही खुशी का दिया हुआ दान कर आदि फलीभूत होता है अन्यथा जबरदस्ती लिया हुआ तो डाका है दिल दुखाकर लिया हुआ कल्प-दुख का दान है। यह दोष है क्या तुमने ऐसा तो नहीं किया।

क्या तुमने सूवा गाय का बछड़ा अपनी माँ से विलग कर दिया। गाय ब्याहने के पश्चात् दस दिन तक तो उसका बछड़ा ही दूध पीने का अधिकारी है। वह दस दिन तक का दूध मनुष्य के पीने लायक भी नहीं होता है। एक महीने तक मां का दूध बछड़े को भर पेट मिलना चाहिये। बछड़ा जब भर पेट पी ले पौछे बच जाये वही दूध दूहना चाहिये। एक महिने बाद बच्चा घास खाने लग जाता है।

क्या तुमने घास चरती हुई, जल पीती हुई गऊ को डराकर भगा दिया। गौ माता दुग्ध प्रदान करती है,घास खाता है। अमृत सदृश दूध देती है जल घास आदि से गौ की सेवा करनी चाहिये। इह लोक और परलोक दोनों ही बन जाते है क्या तुमने गऊ की सेवा नहीं की है।?

 क्या तुमने पराई स्त्री का हरण कर लिया ? पराया धन,पराई स्त्री, पराया तो पराया ही है। जो अपना नहीं है उसे लेने का हमारा क्या अधिकार है। लोक मर्यादा एवं धर्म के विरूद्ध है किसी के धन स्त्री को छीन लेना उसके हृदय में दुख भर देना है। किसी दूसरे को दुख देना ही दोष – पाप है।

क्या तुमने अपने किसी सम्बन्धी एवं सहोदर भाई को मारा है। अपना सम्बन्धी विश्वास पात्र होता है। उसे

दुख देना या मार देना ये दोष है। उसके साथ विश्वास घात करना महापाप है। सहोदर तो भाई होता है। वह तो अपनी ही जान होती है। दो शरीर एक जान होती है। उसे मारना तो अपने को ही मारना है। भाई सम्बन्धी को मार कर तो स्वंय ही मर जाता है। इस पाप का फल तो शक्ति बाण लगने जैसा हो भयंकर दुख है।

 क्या तुमने तिरिया स्त्री जाति विशेष कन्या, बहन, पत्नी,मां आदि के उपर खड़ग उठा लिया। ये तो सभी दैवी रूपा है। इनकी तो रक्षा करनी चाहिये। क्या तुमने कोई अकरणीय कार्य कर लिया। क्या तुमनें चलते घूमते हुए दातुन किया। अर्थात् दातुन करना, भोजन करना,जल पीना आदि चलते फिरते हुए नहीं करना चाहिए।

बैठ कर करने वाले कार्य को तुमने चलते फिरते किया है। यह प्राकृतिक प्रकोप है। यही दोष है इसका फल भी दुख रूप है।

 क्या तुमने युद्ध भूमि में जाकर अपने साथियो को धोखा दिया है। रण भूमि में कही पीठ तो नही दिखाई पहले तो विश्वास दिलाया था कि मैं यह करूंगा वह करूंगा पीछे समय आने पर भाग खड़ा हुआ। क्या यह नीचकर्म तो नहीं किया, जो वन में आग लगायी।

 क्या तुमने किसी से मार पीट करके धन तो नहीं ले लीया। या तुमनें अपनी मर्यादा सीमा को छोड़ कर दूसरे की सीमा में से धान आदि छीन कर ले आया।

 हे लक्ष्मण भाई । मैं तुम्हारा भाई राम तुम से पूछता हूं कि कौन सा सराप दोष तुम्हें लगा है। जिस कारण से शक्ति बाण लगा है, यह विपति आयो है। बिना दोष बिना कारण के तो कोई कार्य बनता ही नहीं है।

इति श्री रामचंद्र कहीं लखमण कुवार सुणी। श्री लखमण कुवांर कहै

‌।                           शब्द 62 

ओ३म् ना मैं कारण किरिया चूक्यौ, ना मैं सूरज सामो थूक्यो। ना मैं उभै कैंसर मांज्या, ना मैं छान तिणूका बैंच्या।

ना मैं ब्राह्मण निवत बहोड्या, ना मैं आवा कोरंभ चोर्या।

 ना मैं बाड़ी का बन फल छोडू, ना मैं जोगी का खप्पर फोड़या।

ना मैं ब्राह्मण का तागा थोड्या, ना मैं बेर बिरोध धन लोडूया।

ना मैं सूवा गाय का बच्छ बिछोडूया, ना मैं चरती पिबती गऊ बिडारी।

 ना मैं हरी पराई नारी, ना मैं सगा सहोदर मार्या।

ना मैं तिरिया शिर खड़ग उभार्या,ना मैं फिरतें दातण कीयो।

ना मैं रण मैं चाय दे दीयों, ना मैं बाट कूट धन लींयो।

एक जू ओंगुण रामैं कीयों, अणहुंतो मिरघो मारण गइयां।

दूजो औगुण रामैं कीयों, एको दोष अदोषा दीयों।

 वन खंड मैं जद साथर सोइयों, जद को दोष तदों को होईयों

राम जी ने अठारह दोष लक्ष्मण को गिनाये तब लक्ष्मण ने कहा- हे भाई इन अठारह दोषों में से तो मैंने एक भी नहीं किया किन्तु हे भाई । आपने तो अवश्य ही दोष किये है जिस वजह से आपको दुख आया है। मैंने तो न तो दोष ही किये है और नहीं मुझे दुख आया है। मैं तो मूर्छित था तो कुछ भी चेता नहीं था अब स्वस्थ हं, मुझे दुख कब आया ? किन्तु हे भाई । आपने विलाप अवश्य ही किया दुख आपको अवश्य ही

हुआ इसमें आप दोषी होगे।

 रामजी ने कहा- मैंने कौन सा दोष किया है मेरे छोटे भाई। जरा मुझे बतलाओ तो सही, मैं तो वियोग दुख में व्याकुल था कि मुझे कुछ भी पता नहीं चला, दोष किसमें है यह मैं नहीं जानता।

 लक्ष्मण ने कहा- हे राम। एक अवगुण तो सर्व प्रथम आपने ही किया जो अनहोना मृग मारने-पकड़ने चले गए। आपने मेरी बात नहीं मानी और नहीं सीता ने ही सुनी। मैंने सीता माता से कहा था कि असंभव है स्वर्ण मृग, मैं सभी जीवों की जातियां जानता हूं, और जो जीवों को शरीर प्रदान करता है उसको भी मैं जानता हूं किन्तु आपने और सीता ने मेरी बात नहीं मानी जिस वजह से सीता का हरण हुआ, यही छोटी सी भूल थी।

जब आपने मृग के तीन बाण एक साथ मारे तो उस कपटी मृग ने पड़ते हुए हा लक्ष्मण हा लक्ष्मण! ऐसा पुकारा था।मैं तो आपका सेवक सीता की रक्षा के लिए सावधान था किन्तु सीता ने कहा हे लक्ष्मण! आपने राम की आवाज सुनी। तुम्हारा भाई विपति में पड़कर तुम्हें पुकार रहा है, जल्दी जाओ। मैंने कहा था हे मात । मेरे भाई का कुछ भी नहीं बिगड़ सकता।मैं तुम्हें अकेली वन में छोड़ कर जाउंगा नहीं यही मेरे भाई राम की आज्ञा है।

किन्तु सीता ने जाने के लिए मुझे मजबूर कर दिया। मुझे सीता को अकेली ही छोड़ कर जाना पड़ा आपके पास जब मैं पहुंचा तो आपने मुझे ही दोष दिया कि सीता को अकेली छोड़ कर क्यों आए? आपने तथा सीता दोनों ने ही मुझ निर्दोष को दोष दिया। यही आपका ही दोष था।

किसी निर्दोष को दोषी बना देना या बता देना ही दोष है किसी अचोर को चोर बता देना यही तो दोष  यही पाप है। दूसरों को दोष देने वाला स्वयं दोषी- पापी हो जाता है।इसी को ही पर नींद कहते हैं।यही पाप दोष है जिसका फल दुख है।

हे भाई! उसी वन खंड में ही तो हम रह रहे थे, उसी में ही राक्षस विचरण करते थे किन्तु हम सचेत नहीं हो सके। सोते रहे। यही कारण था कि सीता का हरण हुआ लंका में पहुंच गयी।

हे राम! आपको दुख होना था इसीलिए मुझे शक्ति बाण लगा आपने दोष किया तो आपने दुख भोग लिया। वही दोष और इसका फल दुख । किया हुआ कर्म सुख- दुख अवश्य ही भोग्य है। वह चाहे राम हो क्यों नहीं। हमारे जैसे छोटे मोटे लोगों की तो ओकात ही क्या है।

 कर्म फल सिद्धान्त अटल है यहीं इस शब्द द्वारा बतलाया है। कर्मों का फल सुख दुख ज्ञानी को भी भोगना पड़ता है अज्ञानी को। किन्तु ज्ञानी तो हंस कर भोग लेता है अज्ञानी रोकर के भोगता है। सुख दुख की मात्रा में अंतर हो सकता है किन्तु जीवन में आयेगा तो दोनों ही हम पाप पुण्य मिश्रित कर्म करते हैं।इसीलिए मिश्रित सुख दुख आते है।

 रावण आदि राक्षसों को मार कर के सीता को लेकर चौदह वर्षों का वनवास पूरा करके राम लक्ष्मण वापिस अयोध्या लौट आये। अयोध्या निवासियों ने घर घर दीप जला कर राम लक्ष्मण एवं सभी वानर सेना का स्वागत किया। दीपावली मनायी गयी अब भी वही दीपावली मनाते है।

 

श्री राम कथा ओर जाम्भोजी भाग 1

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