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श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 1

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 1

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 1
श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 1

जाम्भोजी ने सात वर्ष तक बाल लीलाएं की थी। बाल्यकाल जीवन का प्रथम सौपान है। बालावस्था से ही यदि संस्कार अच्छे दिये जायेंगे तो संस्कार जीवन पर्यन्त साथ रहेंगे किस प्रकार से बाल्य जीवन व्यतीत करना चाहिये। ये भिन्न-भिन्न प्रकार की शिक्षाएँ जाम्भोजी ने अपने जीवन से देने की महत्ती कृपा की है।

 हे गुरुदेव! जाम्भोजी द्वारा दी गयी बाल्य लीला की शिक्षाओं के बारे में मैं पूर्णतया अनभिज्ञ हूँ। आप

मुझे पृथक-पृथक समझाने की कृपा करें। मैं भी तो अभी बाल्यावस्था को पार नहीं कर पाया हूँ। वैसे तो ज्ञान की दृष्टि से देखा जाये तो सभी बालक ही हैं। जिन्होनें सम्पूर्ण वेद,शास्त्र,दर्शन, पुराण आदि पढ़ लिये हैं किन्तु गुरु जाम्भोजी के बारे में कुछ नहीं जाना है, वह ज्ञानी की दृष्टि में तो बालक ही है। आयु चाहे कितनी ही पार कर जाये। जाम्भोजी ने कहा भी है-

घणा दिना का बड़ा न होयबा, बड़ा न लंबा पारूं।

 उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारे।

नाथोजी उवाच:- हे शिष्य ! जब पीपासर के ठाकुर लोहटजी के वृद्धावस्था में सन्तान की प्राप्ति हुई हो तो खुशी का ठिकाना न रहा। लोगों को आश्चर्य हुआ कि इस वृद्धावस्था में तो बालक का जन्म होना असंभव ही है। जितने लोग उतनी ही बातें हुई। कुछ समझदार लोगों ने कहा कि यह असंभव नहीं।पूर्णतया संभव है। क्योंकि त्रेता में अयोध्या के राजा दशरथ के भी तो चार संतानें वृद्धावस्था में ही हुई थी।लोहटजी की तरह उनके भी संतान नहीं थी। किसी ऋषि के शुभ आशीर्वाद से यज्ञ द्वारा चार सन्तानें हुई,वे जगतप्रसिद्ध भगवान राम,लक्ष्मण,भरत,शत्रुघ्न कहलाये।

सामान्य रूप से जन्म लेना मरना यह तो प्राकृतिक रूप से चलता ही रहता है। जब कुछ अनहोनी होती है तो उसमें अवश्य ही कुछ अप्राकृतिक कुछ ईश्वरीय होता है। हे भाईयों! आप चिंता न करें। हमारे राजा साहब के पुत्र हुआ है तो अवश्य ही कोई चमत्कार ही होगा। हमारे गांव का तो सौभाग्य ही है जो ऐसा अचंभा ही हुआ। हम लोग भी चलते हैं, खुशी में सम्मिलित होते हैं।

इसी बहाने से उस अद्भुत बालक का दर्शन भी संभव हो सकेगा। हे मित्रों ! यह समय हमारे घर पर बैठकर केवल बातें करने का नहीं है। गांव-गांव घर-घर से लोग छोटे-बड़े, सभी लोहटजी के घर एकत्रित होकर खुशी मना रहे हैं। खुशी | तो स्वयं प्रगट होगी क्योंकि भगवान कृष्ण-विष्णु स्वयं ही अवतार लेकर पींपासर नगरी में पधारे हैं।

भगवान तो स्वयं आनन्द स्वरूप है। यह आनन्द पीपासर तथा जीव रूप से सभी शरीरों में भी तो | विराजमान हो रहा है। उस अन्दर बैठे हुए सचित आनन्द की झलक मिली है। तभी तो आनन्द का उत्सव हो रहा है। जब वह अन्दर बैठा हुआ ही गायब हो जाता है तो यह देह मृत हो जाती है। उसका तो राम ही निकल गया तो पीछे क्या रह गया मृत शरीर को ढ़ोने के अलावा कुछ भी नहीं होता।

लोहट एवं हंसा देवी को भी आज खुशी का आनन्द का पार नहीं है। आगन्तुकों को बधाइयां बांट रहे हैं। मानों सभी कुछ लुटाने को तैयार हैं किन्तु एक को छोड़कर। यह नया शिशु आया है यह तो हमारे जीवन का आधार है। इसके अलावा सभी कुछ धन दौलत, गायें आदि देने के लिए प्रस्तुत हैं भगवान ही आ गये हैं तो अन्य धन दौलत की क्या आवश्यकता है।

जब तक भगवान की प्राप्ति नहीं थी तभी तक ये वस्तुएं प्रिय लगती थी। दूसरों को अपनी प्रिय वस्तु कैसे दी जा सकती है किन्तु अब परमप्रिय भगवान को पदार्पण हो चुका है। उनके सामने अन्य वस्तुएं नगण्य हो चुकी है। जिनका कुछ भी महत्व नहीं है वे वस्तुएं दी जा सकती है। इसीलिए लोहटजी दोनों हाथों से लुटा रहे हैं।

बधाइयां ग्रहण करने वाले नट,भाट,ब्राह्मण,नाई आदि बड़े प्रेम से ग्रहण कर रहे हैं। उन्हें आज तो थोड़ा ही मिला है तो भी संतोष हो रहा है। अन्य दिनों में तो संतोष नहीं होता था, जितना भी अधिक दिया जाता था उतनी ही तृष्णा,इच्छा,वासना ज्यादा बढ़ जाती थी।

 आज तो वे लोग संसार की वस्तु ग्रहण नहीं कर रहे हैं, ये वस्तु धनादिक तो मात्र बहाना है। ये लोग तो उस परमपिता परमात्मा को हो ग्रहण कर रहे हैं। जब वह परमात्मा ही आत्मा से मिलन करता है तभी आत्मा भी सतचित आनन्द को प्राप्त हो जाती है। आत्मा के सोये हुए भाव जागृत हो जाते हैं। क्यों न संतोष होगा, यदि परमात्मा की प्राप्ति किसी वस्तु के बहाने से हो रही है। जहां स्वयं भगवान आये हैं वहां तृष्णा,दुःख,द्वंद्व का क्या काम?

 ग्राम की वृद्धा तथा युवतियां भी लोहट के आँगन में गीत गा रही है। लोहट लाला अजर अमर रहे, यशस्वी होवे, लोहट के कुल को आगे बढ़ाये, ये सभी शुभकामना करती हुई, आशीर्वाद प्रदान कर रही थी।

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हांसी देवी भी भगवान से प्रार्थना कर रही थी। हे देवाधिदेव! आपने मुझ पर बड़ी कृपा करी है जो मुझे इस अवस्था में इतना सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ है। यदि आपकी इतनी अपार कृपा नहीं होती तो आज मुझे यह शुभ दिन देखने को नहीं मिलता। मेरे पति कभी प्राण त्याग देते। उनके बिना मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती थी। आपको बार-बार नमन है।

यह तो निश्चित ही है कि वन में एक योगी ने हमें आशीर्वाद दिया था उनकी कृपा से ही आज हमारा घर रोशनी से जगमगा रहा है, अन्यथा तो अंधेरा ही था। हे मेरे परमेश्वर ! यहां तक तो खुशी प्रगट कर दी है किन्तु मुझे संदेह हो रहा है, भविष्य के बारे में मैनें अभी-अभी जन्मघूंटी पिलाने की कोशिश की है किन्तु यह तो पीता ही नहीं है। बिना कुछ ग्रहण किये यह बालक कैसे जीवन धारण करेगा? इस बात का तो अब तक किसी को भी पता नहीं है।

वैसे तो मैं जानती हूँ कि यह बालक तो वही योगी है जो स्वयं हमे तपस्या से निवृत्त कर आया है। योगी लोग तो ऐसा सुनते हैं कि समाधि ले लेते हैं बिना अन्न-जल श्वांस के भी युगों-युगों तक जीते हैं। किन्तु यह नवजात मेरा छोटा सा बेटा कैसे जीएगा? पहले की बात और है अब तो यह शिशु है। घूंटी

पिलाने की कोशिश करती हूँ किन्तु यह तो पीता ही नहीं है। क्या मेरे में कुछ एक दोष है? मैं तो एक माँ हूँ और कुछ भी नहीं। माँ का तो मन प्रसन्न तभी होता है जब बेटा कुछ खाएँ कुछ पीये।

 कहीं यह स्वयं जगत का पालन-पोषणकर्ता भगवान विष्णु तो नहीं आ गया। मैं इसे क्या खिलाऊ पिलाऊं, वह तो सम्पूर्ण जगत को खिलाने-पिलाने वाला है। मैं भी कितनी अज्ञानी हूं, उस विष्णु की माँ बन बैठी हूं। जो सभी की चिंता करते हैं मैं उसकी चिंता करने लगी।

मुझे भी अहंकार आ गया है। भक्तिभाव चला गया है। क्या भगवान कभी अहंकारी से कुछ ग्रहण करते हैं? मुझे तो मैं भाव को त्याग करके प्रेम से कुछ समर्पण करना होगा तभी कुछ भगवान ग्रहण कर सकते हैं।

हो सकता है कि पतिदेव ने मुझे अभी अभी अंधली कहा है। क्या मैं सचमुच अंधी तो नहीं हो गयी हूं। घूंटी पिलाने का प्रयत्न करती हूँ किन्तु ठीक से मुख में पिला नहीं पा रही हूं। मुझे तो कुछ दिनों से सचमुच ही दिखाई कम देने लग गया है। इस समय तो मैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो गयी हूँ। कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। क्या करूं क्या न करें।

क्यों न ग्राम की वृद्ध महिला को बुला लूं, वह दाई का कार्य करती है। उन्हें मालूम है कि नवजात शिशु को प्रथम घुंटी किस प्रकार पिलाई जाती है। मैं तो सर्वथा अनुभव हीन हूँ, मुझे क्या पता मेरे तो यह प्रथम तथा अन्तिम एकमात्र संतान हुई है। मैं भी अज्ञतावश असंभव कार्य को करने में प्रवृत्त हुई हूँ। यदि कोई कार्य स्वयं न कर सके तो दूसरों से पूछ लेना चाहिए दूसरों से करवाने में क्या शर्म की बात है?

अच्छा, तो मैं अभी बाहर बैठी हुई महिला गीत गा रही है उन्हें अन्दर बुलाती हूँ। यह घूंटी का कार्य उन्हें सौंप देती हूँ। हांसी देवी की आज्ञा स्वीकार करके नवजात शिशु का दर्शन करने अनेकों महिलाएं सूतिका गृह में प्रवेश कर गयी।

आपस में कहने लगी- हे सखी! अच्छा है तुम्हारा बेटा तो, कितना सुन्दर सलौना दिव्य रूप, ये तो साक्षात् कन्हैया ही तुम्हारा बेटा बनकर आ गया है हम तो सुन्दर रूप को देखकर बलैया लेती है। जुग जुग जीओ हांसा के लाल। कितना अच्छा होता यह पहले ही आ जाता। न जाने आने में इतनी देरी क्यां की? अब तक जवान हो जाता लोहट-हांसा दादा-दादी हो जाते। कौन जाने भगवान की लीला के बारे में, न जाने हवे क्या करना चाहते हैं? कौन जाने कि यही ठीक के लिए हुआ है।

 हमें आगे-पीछे से क्या लेना जो वर्तमान में सुख मिल रहा है, उससे हम वंचित क्यों होवें, जितना चाहे उतना लूट लें यही ठीक रहेगा। अन्यथा तो आगे-पीछे के चक्कर में यह वर्तमान हो चला जायेगा। हांसा बोली- हे सखियों! मेरी व्यथा भी सुनो! यह बालक तो जैसा आपने कहा है कन्हैया ही अवतार लेकर आ गया है ऐसा मुझे भी आभास होता है किन्तु यह बालक तो कुछ भी खाता-पीता नहीं है। इसने तो अब तक जन्मा घूंटी भी नहीं ली है। अब तुम्हीं बतलाओ कि यह बालक जीवन किस प्रकार धारण करेगा?

सखियां कहने लगी- हे देवी! यदि ऐसी बात है तो तुम हमें पहले बतलाती। हम बड़ी-बूढ़ी यहाँ एकत्रित हैं, घूंटी देने में कुशल हैं, अभी पिलाएं देती है, लाओ बालघूंटी। हांसा ने बालघूंटी उस वृद्धा के हाथ सौंप दी तथा धैर्य धारण कर लिया, अब ये सखियां अवश्य ही पिला देगी। यह तो मेरी ही भूल थी जो मैंने इन्हें पहले नहीं बुलाया।

एक वृद्धा ने घंटी हाथ में ली और बड़े ही अहम्भाव से जाम्भोजी को पिलाने लगी और कहने लगी जब मैं जीवित नहीं रहूंगी तो इस गांव की साख मिट्टी में मिल जायेगी किन्तु क्या देखती है सीधा मुख पर हाथ नहीं जा रहा है कभी तो नाक पर जा टिकता है, तो कभी थोडी पर जा टिकता है, कभी ललाट से जा टकराता है।

दूसरी देवी पास में खड़ी देखते हुए हँस रही है, कहने लगी- हे माता। तुम हट जाओ। तुम्हें अब पता नहीं चला कि वृद्धावस्था आ गयी है। हाथ काँपने लगे हैं। तुम्हें दिखलाई भी कम ही देता है, तुम्हें मुख का तो पता ही नहीं है। तुम तो कभी थोडी पर, कभी नाक पर या कभी ललाट पर हाथ फेर रही हो, वहां मुख कहां है अब तो अपनी चौधर छोड़ दो। भगवान का भजन करो। तुम्हारे वश की बात नहीं है। रूक जाओ मैं पिलाती हूँ।

दूसरी सखी ने घूंटी का कटोरा हाथ में लिया और देखा कि कहीं मैं भी उसी तरह हंसी का पात्र न जाऊं। ध्यान से देखा तो हजारों मुख दिखाई देने लगे। कौन-कौन से मुख में घूंटी दी जाये। सहस्त्र शीषां पुरुषा जो हजारों मुख वाले भगवान हैं उन्हें कैसे एक मुख से तृप्त किया जा सकता है। भगवान को आहुति देना है तो हजारों लाखों मुखों में भोजन का ग्रास देवें, तभी भगवान के पास पंहुचता है।

केवल मंदिर में भोग लगाने से कार्य नहीं चलेगा भगवान तो विराट स्वरूप है सभी के शरीरों में विद्यमान है सभी को तम करें। शरीरधारी जीवों का अन्न-जलादि से तृप्त करें तथा देवताओं को यज्ञ द्वारा तृप्त करें। यही शिक्षा जाम्भोजी ने जीवन घुंटी न लेकर जन समाज को प्रदान की थी। किन्तु पीपासर की नारियां तो यही समझ रही थी कि हम इस बालक को घूंटी देंगी।

पास खड़ी हुई नारियां भी अपना-अपना कौशल दिखाने लगी किन्तु कोई सफल नहीं हो सकी भगवान ने संकेत दिया कि आप लोग भगवान के बंदो को, देवताओं को जो तुम्हें वायु, जल, आकाश,तेज आदि प्रदान करते हैं उन्हें आहुति दो, तभी भगवान प्रसन्न होंगे, तुम्हारा दिया हुआ सहर्ष स्वीकार करेंगे, किन्तु ग्रामीण इस बात को समझ नहीं पाये। सभी नारियां हार करके वापिस अपने घरों को लौट आयी।

आज के आँखो देखे आश्चर्य को एक दूसरे से कहने लगी- भले ही लोहटजी को वृद्धावस्था में पुत्र प्राप्त हुआ है किन्तु यह बालक तो अपने बालकों जैसा साधारण बालक नहीं है। इसके शरीर में जो ज्योति छिटक रही है देखा तुमने। हे सखी! तुमने देखा उस घर में दीपक भी नहीं था तो भी प्रकाश हो रहा था। वहां तो कुछ बात ही दूसरी है। हम तो अपने घर लौट आयी किन्तु वह बालक तो हमारे हृदय में बस गया है। बाहर निकालने की, उसे भूलने की कोशिश कर रही हूँ किन्तु वह तो भला ही नहीं जा सकता। उसे देखकर तो हमें सुध-बुध ही न रही। घर परिवार सभी कुछ ही विस्मृत हो गया।

 हे सखी ! उसमें कुछ न कुछ तो जादू अवश्य है, क्यों न होगा। वह स्वयं तो कृष्ण कन्हैया ही यशोदा का लाल, हांसा का लाल बनकर आया है। ये विचारी गोपियां जिन्हें लोग दोष लगाते हैं? दुनियां के लोग क्या जाने उनकी दशा को। घायल की गति घायल ही जाने जे कोई घायल होई। आज हमें पता चला है कि वे गोपियाँ कृष्ण के विरह में क्यों तड़पती थी?

 चलो ! घर का कार्य भी तो करना है, केवल गोपियाँ बनने से तो पेट की भूख नहीं मिटेगी। मन की भूख तो देव दर्शन से मिट जायेगी किन्तु पेट की भूख तो अन्न का भोजन करने से मिटेगी। कल भी आयेगी कन्हैया का दर्शन करके जीवन का लाभ उठायेगी।

कैलाश पर्वत पर तपस्या में लीन भगवान शिव से पार्वती ने कहा- हे देव! समाधि खोलिये। जिस भगवान विष्णु की आप उपासना करते हैं। वे आपके आराध्य देव निराकार होते हुए भी साकार रूप धारण करने में कुशल है। उन्होंनें अबकी बार फिर से नया चरित्र-खेल रचा है। आप जाकर देख तो आओ पूर्व अवतारों के अवसर पर तो आप अतिशीघ्र दर्शनार्थ जाया करते थे। अबकी बार उदासीनता क्यों ?

 हे देवी! अभी जाता हूँ, मुझे पता है। मैनें समाधि में ही सभी कुछ जान लिया है। अब जो तूँं कहती है तो मुझे अवश्य ही जाना है। यह तो तूने मेरे मन की ही बात कह दी।

संध्या वेला में सभी नारियां अपने अपने घरों को चली गयी थी उन्हें बहुत सा घर का कार्य करना था। गायों को दूहना, भोजन बनाना, संध्या वंदन करना आदि। ऐसे अवसर पर हांसा अकेली घर में थी। बालक के बारे में सोच रही थी। यह कैसे जीवन धारण करेगा। इसने तो दुग्धादि कुछ भी ग्रहण नहीं किया है। इस बालक को तो भगवान ही मालिक है वे ही बचाये तो ही बच सकता है।

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल-लीला भाग 2

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