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श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 3

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 3

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 3
श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 3

 भैय्याजी! मैं अपने भतीजे के लिए छोटी सी भेंट- कुर्ता, टोपी, कुछ आभूषण आदि ले आयी हूँ, मैं अपने ही हाथ से पहनाना चाहती हूँ। यदि आप आज्ञा दें तो पहना दूं। लोहटजी बोले- हे बहन! ये भी कोई पूछने की बात है ! भुआ के हाथ के बनाये हुए, प्रेमरस में भीगे हुए, दिव्य वस्त्र, अलंकार मेरा बेटा पहनेगा तो उसे किसी प्रकार की दृष्टिदोष, भूत प्रेत आदि चेड़े नहीं लगेंगे तुम्हारा तो यह आशीर्वाद ही होगा जिसको पाकर हम तथा यह नन्हा तुम्हारा भतीजा कृतकृत्य हो जाएगा। अवश्य ही पहना दो।

चलो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ। कुछ सहारा दूंगा। वैसे तो बहुत ही हल्का है। गोद में उठाने में कुछ भी भार मालूम नहीं पड़ता, किन्तु हे बहन! जैसे हम वृद्ध हैं वैसे तुम भी तो वृद्धावस्था को प्राप्त हो गयी है। ऐसा कहते हुए दोनों भाई बहन ने भवन में प्रवेश किया जहां श्रीदेव पलने में लेटे हुए विचारमग्न थे। पीछे बीते हुए काल को देख रहे थे।कहां अयोध्या, कहां दवारिका और कहां इस समय का यह पीपासर

वीखा पड़ता पड़ता आया, पुरूष पूरा पूरा।

 जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरस सूरा सूरू।

 वचनों को निभाने के लिए ये संयोग-वियोग, सुख-दुख तो चलते ही रहेंगे। जो व्यक्ति इन द्वन्द्वों की परवाह नहीं करता है वही पूरा पुरूष है। युद्धभूमि में जाकर शूरवीरता दिखलाए वही तो शूरवीर कहलाता है। अन्यथा तो चारपाई पर पड़ा पड़ा डींग हांकता रहे वह काहे का शूरवीर है। ऐसे ही कुछ विचारमग्न होकर जाम्भोजी एकटक दृष्टि से देख रहे थे लोहा तांबा ने इसी रूप में देखा था। भुआ ने पास जाकर कपड़े पहनाने के लिए बालक को गोदी में लेने लगी किन्तु उन्हें तो हिला भी नहीं सकी, उठाकर गोदी में लेना तो असंभव ही था।

तांबा ने सोचा क्या बात है क्या मैं इतनी बलहीन हो गयी हूं जो इस छोटे से बालक को नहीं उठा सकी। अभी तो मैं गाय दुहती हूँ, रोटी बनाती हूँ, जल से भरे हुए बड़े-बड़े घड़े उठा लेती हूँ, आज मुझे क्या हो गया। क्या यह बालक इतना वजनदार हो गया? अभी तो भैय्या ने कहा था कि बहुत ही हल्का है।

तांतू कहने लगी-भैय्याजी! आप लोग बार-बार यही कहते हो कि हमारा बेटा अन्न, दूध, जलादि कुछ भी ग्रहण नहीं करता, तुम लोग झूठ क्यों बोलते हो, तुम्हें झूठ बोलने में लज्जा नहीं आती है? यह तुम्हारा बालक तो मेरे से हिलता भी नहीं है, उसे उठाना तो दूर की बात है। मुझे देखो! मैं कोई इतनी दुबली-बलहीना तो नहीं हूं, जो इसे उठा नहीं सकूं, इसमें तो बहुत भार है।

 लोहट कहने लगे- हे बहन! तो दूर हट जा, मैं अभी उठा लेता हूँ, मैं रोज ही गोदी में लेकर घूमता हूँ, बिल्कुल ही वजन नहीं है। ऐसा कहते हुए लोहट ने बालक को उठाने की कोशिश की, किन्तु वह भी | हिला-डुला नहीं सके। बहुत जोर लगाया, थककर पसीने में लथपथ हो गये, थककर बैठ गये। यह क्या

हो गया मेरे लाला को जो इतना वजन ? मुझे अपने आप पर भरोसा नहीं हो रहा है। क्या मैं वही हूँ जो पहले था? क्या हो गया मुझे और मेरे बेटे को? क्या बात हुई? क्या चूक हो गयी मुझसे जो में अपनी गोदी खाली देख रहा हूँ? मेरा बेटा आज मुझसे रूठ गया है, मेरे पास आना नहीं चाहता।

 हे बेटा! यह तुम्हारी भुआ तो पहली बार ही आई है, इसकी तरफ तो ध्यान दो। इस प्रकार से प्रयास | रात दोनों भाई बहन को देखा तो हांसा भी आ गई और कहने लगी इस छोटी सी बात के लिए इतने |चिंतित क्यों हो रहे हो, मैं अभी गोदी में ले लेती हूँ। हे ननदजी ! आप अपने उपहार भेण्ट कर देना। ऐसा कहते हुए होना अपने प्रिय लाला को उठाने लगी, किन्तु क्या देखती है कि वह तो भारी वजनदार हो गया।

उठाना तो दूर की बात हिला भी नहीं सकी। हांसा ने अपनी ताकत का अपमान समझा, फिर से ताकत लगायी किन्तु वे टस से मस नहीं हुए। हांसा भी हारकर दूर जाकर बैठ गयी। तीनों के कुछ भी समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है।

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उसी समय ही खेल खिलाने वाली दासी आयी और उन्होनें सभी के देखते ही देखते लोहट लाला को गोदी में उठा लिया। वे इतने हल्के रूई के समान हो गये सभी ताली बजाकर हंसने लगे खुशियां प्रगा करने लगे। कहने लगे- हमारे में ही कहीं भूल हुई है, यह बालक तो वास्तव में बहुत ही हल्का है। तांतू बोली- आपकी बात सत्य है, इसका शरीर तो पवन, तेज सदृश निर्भार ही है।

 वील्हा उवाचः- हे सतगुरु! जाम्भोजी महाराज ने ऐसा क्यों किया? जैसा आपने कहा कि भारी बोझवान बन गये माता,पिता, भुआ को ऐसा चरित्र दिखाने का क्या प्रयोजन था कृपया समझाइये।

 नाथोजी उवाच- हे शिष्य! भगवान की लीला अपार है साधारण प्राणी कैसे उनकी लीला का पार पा सकते हैं फिर भी मैं कहता हूँ श्रवण करो! भगवान यह कहना चाहते हैं कि हे शरीरधारियों! तुम अहंकार ना करो, यही तुम्हें डूबा देगा। जैसा कि मैं भुआ हूँ, मेरा ही इस पर अधिकार है। मैं ही इसे उठाऊंगी, मैं ही इसका पालन-पोषण करूंगी। मैं ही इसकी सर्वस्व हूँ, यदि मैं न होऊं तो इसका जीना असंभव है, मैं ही इसका लाड-प्यार दुलार करूं, मुझे ही ये प्राप्त हो, दूसरों को न हो, यह जो मैं पना है।

यह खतरनाक है दूसरे पर जबरदस्ती हावी हो जाता है। भगवान ने देखा कि ये माता-पिता भुआदि तो अहंकार में इतने डूब गये हैं इन्हे कैसे उबारे। केवल मात्र इतने का ही मेरे ऊपर आधिपत्य हो यह असहनीय है। भगवान ने बताया कि मैं तो ईश्वर हूँ, सभी का ही हूँ, सभी मेरे हैं। मैं सभी का हूँ। मैं तो कुछ भी भेदभाव नहीं देखता, किन्तु ये लोग भेदभाव की दृष्टि को मजबूत कर रहे हैं। इसे गिराना चाहिये, इनको बता देना चाहिये कि मैं तो सभी का हूं, किन्तु जो मेरे दास हैं उनका में विशेष प्रिय हूँ, वह चाहे छोटा हो या चाहे बड़ा हो, गरीब हो चाहे धनवान हो।

गुणिया म्हारा सुगणा चेला, म्हे सुगणा का दासी।

 सुगणा जायसी सुरगे जायसी, नुगरा रह्या निरासूं।।

 वह दासी थी क्योंकि उसमें दास भाव था। वह पूर्णतया समर्पित थी, किसी प्रकार का अहं नहीं था, यह भगवान जानते हैं। जब दासी पास में आयी तो भगवान स्वयं ही दास के पास चले गये, दास यदि एक कदम भगवान की तरफ बढ़ाते हैं तो भगवान दस कदम बढ़ा देते हैं। यही तो उनकी प्रतिज्ञा है, किनु जो अहंभाव लेकर भगवान की प्राप्ति की कोशिश करता है तो वह भगवान के पास ही नहीं पहुंच पाता। यही शिक्षा देना भगवान का अभिप्राय है।

 वैकुण्ठवासी भगवान विष्णु जब शयन करते हैं तो क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं।लक्ष्मीजी भगवान के पैर दबाती है। भगवान तो केवल शेष नाग की शैय्या से ही संतोष करना पड़ता है। किन्तु यहां मृत्युलोक में तो स्वयं भगवान जी हिंडोलने में हो रहे हैं। यहां मृत्युलोक की कुछ विशेषता तो अवश्य ही है, वहां तो लक्ष्मी पैर दबाती है किन्तु यहां तो सभी पींपासर वासी ही नहीं पशु,पक्षी आदि भी सेवा करने के लिए लालायित है। एक पलक सेवा का अवसर मिल जाये तो धन्य धन्य हो जाये ।

 जिनको वायु देवता झूला झूला रहे हैं। सूर्य देवता प्रकाश रूप से स्वयं प्रकाश ग्रहण कर रहे हैं। सौम्य शांत भाव से उदित होकर सभी जनों को जीवन प्रदान कर रहे हैं। यह धरती माता भी अपने ऊपर चरणों को देखकर धन्य हो गयी। सम्पूर्ण औषधियां फल फूल सुगन्धी से भर गयी। बादल आकर पर्जन्य करते हैं। जल ही जीवन है, सभी के जीवन को उन्नतिशील बनाते हैं आकाश शब्द को ग्रहण करके उसका विस्तार करते हैं, चारों ओर खुशियां ही खुशियां बरस रही है।

लोहटजी के घर में भी भगवान आये हैं तो गायें दूध अधिक देने लग गयी है, पहले जो बर्तन थे वे छोटे पड़ गये हैं। बछड़े को भरपेट दूध पिलाया जाता है, तब भी बर्तनों में नहीं समाता। हांसादेवी घर में अकेली ही तो है उन्हें ही तो घर का सम्पूर्ण कार्य करना होता है। कभी दही बिलौती है, साथ ही साथ दूध भी गर्म हो रहा होता है कभी गायें दूहने का समय तो कभी भोजन बनाने का समय । अभी नन्हा तो पालने में झूल रहा है।

लोहटजी वृद्ध हो गये हैं तो भी उन्हें गायें चराना अच्छा लगता है, वे अपना कार्य नहीं छोड़ सकते। एक दिन लोहे का लाला हिंडोलने में हो रहा था। उधर हारे (चूल्हा) में दूध चढ़ा दिया था। दूध गर्म हो रहा था, घर में तो केवल एक माता हांसा ही थी वह भी किसी कार्यवश घर से बाहर गयी हुई थी, दूसरा घर में कोई भी नहीं था, स्वभाविक रूप से चूल्हे में आंच तेज हो गयी थी और दूध गर्म होकर उफनने लगा।

उसे अब कौन बचायेगा, दूध की हंडिया खाली हो जायेगी। लोहट हांसा दुःखी होंगे, क्योंकि माता को पूत से भी दूध प्यारा होता है। दूध को बचाने के लिए पूत की उपेक्षा की जाती है। भगवान ने हिंडोलने में सोये हुए देखा कि यह तो ठीक नहीं हो रहा है।

 द्वापर युग बीते को अभी थोड़े ही वर्ष हुए हैं उस समय भगवान ने अपनी माता यशोदा को देखा था कि वह दही बिलो रही थी। कन्हैया गोद में बैठकर दूध पी रहे थे। उधर दूध उफनने लग गया। माता यशोदा ने कन्हैया को गोदी से नीचे उतारकर झटिति दूध बचाने भाग पड़ी थी। जाम्भोजी उस माता को भूले नहीं थे, कहीं यह माता हांसा भी वैसा ही व्यवहार न करे कि देखो ऐसा मेरा पुत्र जो उफनते हुए दूध 

को देखता ही रहा, उसे बचा ही नहीं सका। उस समय तो कन्हैया माता के चले जाने पर बहुत क्रोधित हुए थे और डंडा मारकर दही की मटकी फोड़ दी थी। यशोदा ने बड़ा भारी दुःख मनाया था और कन्हैया यानि अपने ही बेटे को बांध दिया था। कहीं अबकी बार भी मुझे न बांध दे, उस माता यशोदा का बंधा हुआ तो मैं इस समय जन्म लेकर आया हूँ। अबकी बार यह माता हांसा मुझे बांध देगी तो मुझे फिर से जन्म लेकर आना पड़ेगा। क्योंकि यह तथा वह दोनों एक ही है।

मैं कहीं फिर से बन्धन में न पड़ जाऊं, ऐसा विचार करके हिंडोलने से नीचे उतर करके उफनते हुए दूध का ढक्कन उतार दिया तथा बड़े भारी बर्तन को चूल्हे से नीचे रख दिया। दूध को बचा दिया और माता के आने से पूर्व ही वापिस पलने में जाकर लेट गये।

 भगवान ने बतलाया कि ध्यान रखो! दुनिया में दुःख की आँच लगेगी, उस आंच के बिना तो तुम पक्के नहीं हो सकते। तुम्हें पकने के लिए आंच की आवश्यकता है। यह भी ध्यान रखो। आंच उतनी अधिक भी न हो जाये जिससे तुम्हारे में उफान आ जाये, धैर्य छूट जाये, आपे से बाहर हो जाये। ऐसा कुछ न करो जिससे यह दूध का बर्तन ही खाली हो जाये सभी कुछ काम, क्रोध,मैं लूटा दो। यदि ऑँच आ भी जाये तो सावधान रहो। कहीं इस क्रोध रूपी आंच की भी जरूरत है, इसके बिना भी कार्य नहीं चलेगा किन्तु सीमित मात्रा में ही ठीक होता है। जितनी आवश्यकता हो उतना ही श्रेयस्कर है।

 यद्यपि मानव अवश है, ऐसा संयोग आ ही जाये, जब पानी नाक तक पहुच जाये तब डूबने से अवश्य ही बचाव करे। उस आंच को तो हम समाप्त नहीं कर सकते। हम स्वयं ही कारण नहीं है तो कोई औ कारण हो सकते हैं। इसीलिए जाम्भोजी ने कहा है-जे कोई आवे हो हो करता, आपज हुइये पाणी स्वयं अपना बचाव कर सकते हैं, अपने दूध को स्वयं बचा सकते हैं। दुनिया के काम, क्रोध ईर्ष्या को मिटा नहीं सकते।

 माता हांसा अपना कार्य करके आयी तो क्या देखती है- दूध की कढ़ावणी आग से नीचे रखी पड़ी है, बेटा तो हिंडोलने में हो रहा है। चूल्हे में कुछ उफना है आग पर दूध गिरा है, दूध की सुगन्धी आ रही है, यह कार्य किसने किया? बाहर से न तो कोई आया और न ही कोई गया है, किसी के भी अने जाने के पैरों के निशान नहीं है।

 यह मेरा लाला तो बहुत ही छोटा है, इससे तो यह कार्य होना असंभव है। अभी तो पैरों से चलना ही नहीं सिखा है। हांसा ने हारे और पालने के बीच में जाकर पैरों के निशान देखे, ये तो पैरों के नन्हे-नन्हे चिन्ह मेरे ही लाला के हैं, इसने ही यह कार्य किया है। माता के मन में खुशी छा गयी। हांसा ने तुरंत तसला लेकर पैरों के निशान ढ़क दिये। आज शाम जब पतिदेव आयेंगे तब दिखलाऊंगी। मुझे रोज-रोज अंधली कहते हैं, मेरी इन आश्चर्यजनक बातों विश्वास ही नहीं करते।

शाम को जब लोहटजी घर पर आये तब उन्हें ले जाकर चरण चिन्ह बतलाये और कहा आज बहुत बड़ा कार्य मेरे लाला ने किया है आपको विश्वास ही नहीं होता था, अब आप इन कुं कुं चरणं को देखिये और मेरी बात पर विश्वास कीजिये फिर से मुझे अंधली मत कहना। लोहटजी ने आश्चर्ययुक्त होकर देखा 

और हिंसा की बात को सत्य माना।

लोहटजी पीछे की एक-एक लीला का स्मरण करने लगे, जब जंगल में योगी ने दर्शन दिया था, उसने पुत्र होने का वरदान दिया था, वे सभी बातें स्मरण करने लगे। हे देवी! अवश्य ही यह हमारे यहाँ द्वापर युग का कृष्ण कन्हैया आया है, किन्तु हम तो इन्हें अपने पुत्र भाव से ही स्मरण करते हैं। यह तो हमारी मोह-माया ही है।

यदि मोह-माया से ऊपर उठकर देखें तो हमें भी वही विष्णु कृष्ण कन्हैया का दर्शन होगा। जो भी हो जैसा भी हो हम तो कृतार्थ हो गये इनकी कृपा से आज पीपासर में उत्सव हो रहा है। सभी मानव,पशु, पक्षी,पेड़,पौधे,कीट,पतंग आदि प्रसन्नचित हैं। सभी में नये उत्साह का संचार हुआ है। क्यों न होगा, जहाँ जिस देश में स्वयं भगवान आ जाये, वहां किस बात की कमी रह जाती है।

 हे देवी! सभी कुछ आनन्द होते हुए भी यह बालक कुछ खाता-पीता नहीं है। बिना अन्न-जल के यह जीवन धारण कैसे करेगा? वैसे तो मैं देखता हूँ कि हमारा लाला अब तो घुटने पर चलने वाला है। शरीर में तो तेज दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है, बिना दूध पीये भी इतनी वृद्धि को प्राप्त हो रहा है।

हम तो भूल ही जाते हैं अभी कुछ महीने पूर्व ही तो योगी शिव बाबा आये थे। उन्होनें दर्शन करके कहा था ये तो साक्षात् विष्णु ही हैं। ये इस मृत्युलोक का अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे। फिर भी युगों-युगों तक जीव धारण करेंगे। इनका भोजन तो अमृतपान है। ये स्वयं समर्थ है, दूसरो के आधार की इनका आवश्यकता नहीं है, ऐसी बात कही थी। फिर भी हम तो ठहरे मृत्युलोक के प्राणी, अन्न जल पर जीने वाले। हमें तो संतोष ही तब होगा जब यह हमारी तरह तीन समय भोजन करने लगे।

 अब तो जाम्भो बालक घुटने के बल पर चलने लग गये थे। माता हांसा जब घुटरून चलत रेन तन मंडित देखती तो आनन्द मंगल को प्राप्त हो जाती है। माता गाय दूहती तो चलते चलते पास में आ जाते।

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 4

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