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भक्त रतने का गुरु शरण में आना (Jambhoji के बारे में)

भक्त रतने का गुरु शरण में आना
भक्त रतने का गुरु शरण में आना

              भक्त रतने का गुरु शरण में आना

 हे शिष्य। अब मैं तुम्हे एक कथा जो गंगा के समान पवित्र करने वाली है वह सुनाता हूं। गांव जांगलू में रतना राहड़ गुरु का भक्त विश्नोई रहता था। उसने धर्म की बाड़ लगा रखी थी। साधु संतों की सेवा करता था। संतों को भोजन करवा कर के स्वयं भोजन करता था। नित्य नियम से जीवन पालन करने वाला स्तनो राहड़ था। रतना भक्त का विवाह बावरले गांव में हुआ था।

विवाह के पश्चात दहेज देने के लिए रतने को बुलाया था। अच्छे तेज चलने वाले ऊंट पर पोलाण काठी मांड कर तैयार हुआ था। पितल का बना हुआ सुंदर | पिलाण रेशम के घासिया शोभायमान हो रहे थे। ऊंट के पैरों में घुंघरू बांधे गये थे।

 स्वयं रतना ससुराल जा रहा था इसीलिए अंगरखा पहना कानों में कुंडल पहने। कमर में पेटी बांध कर के आवश्यक शस्त्र लेकर ब्रह्म मुहूर्त में हो घर से रवाना होते हुए प्रथम श्री देव जाम्भोजी को स्मरण किया और पश्चात माता पिता को प्रणाम किया। ऊंट को बिठा कर झटिति सवार हो कर वांवरलै गांव के मार्ग को पकड़ लिया।

 एक कोश ही गांव से दूर गया था कि उसी मार्ग से पैदल चलते हुए एक संत स्वाभाविक रूप से मिल गए। रतना संतों का भक्त था इसीलिए ऊंट को बिठा दिया नीचे उतरा, संत चरणों में प्रणाम करते हुए।रतना कहने लगा-

हे प्रभु! आओ इस ऊंट पर चढो,मेरा बड़ सौभाग्य है कि आपके दर्शन हुए है। आप पैदल चल रहे है धक गए होंगे। इसीलिए अपना हवन करने का घृत आदि समान ऊट के आगले आसन पर टांग देखिए और आप आगे बैठ जाइए। पीछे मैं बैठ जाऊंगा। संत कहने लगा- मैं तो गुड़े गांव जा रहा हूं और तूं अपने ससुराल जा रहा है। मैं तो अपनी इच्छा से धीरे धीरे चलते हुए आठ दश दिनों में आऊंगा।

मेरे पास हवन आदि करने का सामान है मैं आजऊंगा, तुम चलो। तुम्हें तो आज ही पहुंचना होगा आगे तुम्हारी प्रतीक्षा हो रही है। मेरी प्रतीक्षा करने वाला कोई नहीं है। रतना कहने लगा- हे गुरु देव ! मैं आप को आज ही पहुंचा दूंगा, गुड़ा गांव मेरे श्वसुराल कंपास हो है मेरे साथ चलो । वहां पर आपका तथा मेरा स्वागत होगा।खोर हलवा आदि मिष्टान्न भोजन होगा।

रास्ते में आपका ऐसा भोजन कौन जिमाएगा। तथा गुड़े गांव में भी ऐसा भोजन कहां मिलेगा? संत की सेवा कर के मैं तथा मेरा परिवार आनोंदत ही होगा। जब तक आप मेरे साथ चलने को तैयार नहीं होगे तब तक मैं भी यहां से एक कदम आगे नहीं बढ़ंगा, अब आप देरी न करें।

 उस साधु ने भी भक्त का भाव देखा और हिम्मत कर के रतने के साथ ऊंट के अगले आसन पर अपना झोला झंडा टांग कर चढ गए। रतने ने बड़े ही प्रेम से साधु को ऊंट पर चढा लिया। वह स्वाभाविक प्रेम ही था न तो अभिमान ही था और नहीं मान बड़ाई। बड़े वेग से ऊंट चला और यथा समय बांवरले गाव

की सीमा में पहुंच गया।

 आगे रतने के श्वसुराल वाले प्रतीक्षा कर रहे थे ऊंचे चढ कर उत्तर दिशा की तरफ देख रहे थे। दूर से आते हुए एक ऊंट और दो उस पर सवार दिखाई दिए। एक के सिर पर पगड़ी तथा दूसरे के सिर पर टोपी थी। गांव में प्रवेश करते हुए लोगों ने देखा तो आक्षर्य हुआ कि पाहुणे के साथ साधु आया है यह तो विचित्र बात थी। ऐसा तो कहीं देखा नहीं था प्रथम बार ही गांव के लोग देख कर चर्चा कर रहे थे।

रतने की माम ने जब यह बात सुनी कि दामाद के साथ साधु आया है। ऐसा सुन कर बहुत ही दुखी हुई। क्योंकि पाहुणे के साथ तो उनके भाई बंधु आने चाहिए थे यह साधु को साथ लेकर आया है तो पार पड़ेगी नहीं कभी न कभी यह अवश्य ही साधु हो जायेगा। संगति का फल पायेगा।

ऊंट से नीचे उतर कर जब गांव में प्रवेश किया था उस साधु ने गांव के लोगों की भावना देख ली थी। रतना अपने श्वसुराल के घर में प्रवेश करने लगा था तब साधु रतने से अलग होकर दूसरे घर की तरफ जाने लगा। रतना कहने लगा- हे गुरु जी आप साथ आये थे अब मेरा साथ छोड़ कर कहां जा रहे है। यह तो अच्छी बात नही होगी कि साथ में आये अब अलग जाये।

 रतने के शाले ने कहा- जीजाजी ठोक ही कह रहे है, आप अलग नहीं जा सकते साथ हो चले साधु ने प्रेम भाव देखा तो रतने के साथ ही घर में पहुंच गए। साधु तथा रतने के लिए अलग अलग आसन बिछा दिए। संध्या बेला में दोनों गुरु शिष्य ने संध्यादिक नियमों का निर्वाह किया। कुछ समय तक विष्णु का जप करते हुए अपने अपने आसन पर विराजमान हुए।

बहुत दिनों की प्रतीक्षा बाद आज जंवाई देवता जो आये है। आज जंवाई देवता के लिए विशेष भोजन बनाया गया था। खीर हलवा पूड़ी अनेकों प्रकार की सब्जियां आदि। भोजन का समय होने पर रतने के लिए भोजन का बुलावा आया तब रतनो कहने लगा चलो गुरु जी भोजन करने के लिये।

 संत ने कहा- तुम्ही जाकर भोजन कर आओ, मैं तो बाद में भोजन कर लूंगा। रतना कहने लगा यह कैसे हो सकता है। आप हमारे साथ आये, भोजन अलग अलग कैसे करेंगे। पहले आप भोजन करो पश्चात मैं करूंगा। आप हमारे अतिथि है मेरा तो यह घर है।

रतने का साला कहने लगा-विवाद बंद करो। साथ ही चलो। साधु रतने के साथ भोजन करने के लिए पहुंच गया। रतने की सासू ने देखा कि साधु तो भोजन हेतु साथ हो आ गया है यह भी तो खोर हलवा जीमेगा। किन्तु नहीं, इसे तो सबक सिखाना चाहिए। ताकि हमारे दामाद का साथ छोड़ कर चला

जाए।

 सासू ने चालाकी की और भोजन घर में मंद मंद जलता हुआ दीपक रख दिया रतना तथा उसके दो साले साथ में भोजन करने बैठ गए। एक तरफ साधु अकेला भोजन करने बैठ गया। एक थाली में खोर आयी रतने के लिए तथा दूसरी थाली में साधु के लिए ठण्डी खट्टी बासी राबड़ी एवं ज्वार की ठण्ड़ो रोटी। मंद प्रकाश में पता भी क्या चले। सफेद हो रावड़ी और सफेद हो खीर थी। दोनों भोजन करके बाहर आकर बैठ गए।

 वार्तालाप करने लगे, भोजन को प्रशंसा करने लगे, स्वादिष्ट भोजन की चर्चा करने लगे। रतने ने कहा- गुरु जी आप तो आते ही नहीं थे, यदि न आते तो ऐसा अमृत भोजन आप कैसे प्राप्त करते ? साधु ने कहा- भाई। ऐसा भोजन तो मुझे रोज हो प्राप्त होता है। रतना कहने लगा- गुरु जी मत बोलो। ऐसा अमृत भोजन आपको सदा ही कहां से प्राप्त होता है यह तो कभी कोई खास मेहमान आता है तभी प्राप्त होता है।

 साधु ने एक टुकड़ा जो गौ ग्रास के लिए साथ में लाये थे वह दिखाते हुए कहा- सर देखो रोटी का टुकड़ा, दो रोटी ज्वार की वह भी सुबह की बची हुई बासी और आधा सेर रावड़ी वह भी बासी, मैंने प्राप्त को है ऐसा भोजन तो हम रोज ही खाते है इसमें क्या आधर्य है। रतने ने रोटी का टुकड़ा देखा और कहने लगा-साधु सत्य ही कहते है। झूठ नहीं।

रतने ने उसी समय हो ऊंट पर पिलाण मांड कर कहने लगा मैं अब इस घर का एक ग्रास भी नहीं लूगा। साधु तो उठ कर आगे चला गया। रतना बहुत दुखी मन से ऊंट खांच कर के रवाना हो गया।

और अपनी स्त्री से कहने लगा- अब हमारा इस घर से सम्बन्ध टूट गया है फिर मैं कभी भी लौट कर के नहीं आऊंगा। यदि तुम मेरे साथ चलना है तो अभी चला और पदि अपने माता पिता के पास रहना है तो यही रहे। आगे ऊंट को खींचकर रतना चल पड़ा पीछे रतने की स्त्री भी चल पड़़ी।

 ससुर साले सास ने बहुत प्रकार से समझाया रोकने की कोशिश करते रहे किन्तु रतने ने किसी को एक भी नहीं सुनी। पीछे से कहने लगे- आज यह स्वामी-मोडा के साथ उनके द्वारा भ्रमित किया हुआ जा रहा है। पोछे बहुत ही पछतायेगा हम लोग अनेक प्रकार का दहेज देते। यह लेकर जाता तो लोग सराहना करते।

किन्तु इसके भाग्य में लिखा हुआ ही नहीं है यह कैसे ले जायेगा गांव के लोग कहने लगे यह तो बड़ा भारी क्रोधी है कुछ लोग कहने लगे यह साधु को साथ ले आया इसने सारा कार्य बिगाड़ दिया। सम्पूर्ण गांव के लोगों ने रतने को रोक कर निहोरा मित्रते की किन्तु रतने ने एक बात भी नहीं मानी।

 रतना कहने लगा- आप लोगों ने संत से दुविधा रखी है। संत को छोड़ कर यदि मैं आपकी सेवा करूं तो वैसा ही होगा मानों कोई काम धेनु को छोड़कर खरी-गधी की सेवा करना है वह साधु तो आ हो नहीं रहा था मैं उसको बुला कर लाया था मैंने ही उनका अपमान करवाया है। मैं ही पाप का भागी बना हूं। अब तो निश्चित ही नरक में पड़ेगा। यदि मुझे जाम्भोजी बचाये तभी बच सकता हूं। रतने ने गांव के लोगों की बात का आदर नहीं किया।

 गांव के लोग कहने लगे- आज यह दो हजार का दायजा छोड़ कर जा रहा है। घर में आयी हुई लक्ष्मी को ठोकर मार रहा है। इसको अपनी बेटी देकर भी हमने बड़ी भूल है। हमारी बेटी तो किसी अन्य को भी दी जा सकती थी किन्तु ऐसे क्रोधी से हमारा संयोग हो गया। साधु का अनादर रतने को अच्छा नहीं लगा तथा इस प्रकार से रतना अपनी पत्नी सहित गांव से बाहर निकल आया। रात्रि में हो रतना अपनी पत्नी सहित ऊंट पर चढकर अपने गांव जांगलू की तरफ चल पड़े फिर वापस मुड़कर देखा तक नहीं।

 सवेरा होते होते रत्ना लबैरे गांव में पहुंचा, वहां पर स्नान संध्या कर के आगे के लिए प्रस्थान किया था। रतना अपनी श्री सहित गांव से बाहर निकला था कि एक अत्याचार देखा और रतने ने ऊंट रोक दिया। रतने ने देखा कि चार आदमियों ने एक जीवित हिरण को पकड़ कर के चारपाई पर बांधा था वे लोग रतने को सामने मिल गये।

रतने ने पूछा- इस चारपाई पर क्या ले जा रहे है? उन्होंने कहा- यहां हमारे गांव के ठाकुर सिंह ने जीवित हिरण पकड़ कर के मंगवाया है। हम लोगों ने हारण को फांसी में फ स कर जकड़ लिया है। हम लोग राजा के अनुचर भील है। हम तो टाकुर साहब को भेंट देंगे।

 रतने ने पूछा-ठाकुर साहब इसका क्या करेंगे? उन शिकारी लोगों ने यह नहीं पहचाना कि यह विश्नोई है हमारे कार्य में विघ्न करेगा। स्वभाविक रूप से भीलों ने बतलाया कि ठाकुर साहब इस मृग को देखो के चढावेंगे। इसकी हत्या को जायेगी। ऐसा कहते हुए उस मृग को उठा कर के वापिस चल पड़ें।

 रतना कहने लगा- यदि आप लोग मृग को छोड़ दो तो अच्छी बात होगी और यदि आप लोग नहीं छोड़ते है तो मैं तुम्हारे ठाकुर से छुड़ाऊंगा। ऐसा कहते हुए रतना अपनी घरवालों के सहित ठाकुर के महल में प्रवेश किया। गांव के लोगों ने आश्चर्य से देखा कि आज कुछ अनहोनी होगी महल में आये हुए अजनबो को देखकर ठाकुर ने त्योरी चढा करके क्रोध भरे वचन बोलते हुए कहने लगा

 कहो स्नानी कैसे आये? क्या चाहते हो? तब रतना हाथ जोड़ कर कहने लगा-हे याकुर तुम्हारे अनुचर वन से एक मृग ले आये है उसे हुड़ाने आया हूँ। यह मृग आप मुझे दीजिए यह मांगने आया हूँ। ठाकुर कहने लगा- यहां कोई विश्नोईयों के गांव की कांकड़-सौमा नहीं है तुम इस मृग में क्या मांगते हो?

तुम्हारा कोई हक नहीं है। तुम अपनी सीमा की वस्तु की मांग कर सकते हो। यह तुम्हारी मांग पूरी नहीं होगी।

 उस समय ठाकुर के पास एक चारण था वह कहने लगा- यदि तुम इस हरिण को लेना चाहते हो तो तुम्हारे शरीर पर स्वर्ण आभूषण, हाथों में कड़े, कानों में गोखरू और यह ऊंट आदि दे दो और इस मृग को ले जाओ। रतने ने यह बात सुनी और प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा- जाम्भोजी हमारे पर कृपा कर रहे | है, ऐसा कहते हुए अपने शरीर के स्वर्ण आभूषण तथा ऊंट को ठाकुर को देकर हरिण को लेकर गांव से बाहर आये और हरिण को तो वन में छोड़ दिया।

बिना ऊंट के पैदल ही दोनों जाते हुए आपस में बाते करते हुए जा रहे थे कि यह तो अच्छा ही हुआ जो कुछ भगवान करते है वह ठीक हो करते है यह ठाकुर भी भला आदमी है इसने इतना थोड़ा सा धन लेकर ही इस जीवित मृग को छोड़ दिया आज यदि यह नहीं छोड़ता तो प्राण भी देने पड़ते । हम जिंदा रहेंगे तो धन तो वापिस आ ही जायेगा।

हे देवी! तू चिंता नहीं करना हमने आज धर्म की रक्षा को है।”धर्मों रक्षति रक्षित:” हम धर्म की रक्षा करेंगे तो धर्म हमारी रक्षा करेगा दोनों दम्पति यही बातें करते हुए जा रहे थे। इसी बात को ठाकुर की माता ने सुना और खकुर के पास जाकर कहने लगी

 रे ठाकर ! तुं बहुत ही पोचा- घटिया आदमी है। मेरा बेटा होकर थोड़े से धन के लालच में आकर तुमने अपना धर्म बेच दिया। एक तो वे दोनों है जिन्होनें धन देकर धर्म की रक्षा को है एक तूं है जो धन के लिए हाथ फैला दिया। तेरे जीवन को धिकार है। वे दोनों मनुष्य नहीं है देवता है। उनको तो तुझे पूजा करनी चाहिए थी।

यदि मेरा कहना मानता है तो उनको वापिस बुला कर के उनका धन बापिस लौटा दो। उन्हें आदर सहित विदाई दो। अपनी माता को बात सुन कर ठाकुर अपना सेवक पीछे भेजा और रतने को वापस बुलाया। पांचो कपड़े, अपनी तरफसे सिर से लेकर पांव तक पहनायें, उनका ऊं्ट धन जािय लौटाया। रतने की पत्नी को भी अपनी बेटी मान कर उसे स्वर्णाभूषण प्रदान किए। और गा बजा कर के 

रतने को विदाई दी। उसी दिन से ठाकुर ने जीव हत्या करनी और करवानी भी छोड़ दो, तौस नियमों का पालन करते हुए विश्नोई सदृश आचरण करने लगा।

 रतना वहां से चल कर अपने गांव जांगलू पहुंचा। रतने ने आकर अपनी पत्नी सहित अपने माता पिता को प्रणाम किया। अपने बेटे बहू को शुभ आशीष प्रदान करते हुए देखा कि कुछ विशेष कपड़े पहने हुए है। किंतु दो हजार का दायजा नहीं है और नहीं कोई साथ में पहुंचाने भी आया है। ऐसा देखकर समझ गए कि यह अपने श्वसुराल से तोड़ कर आया है।

 रतना कहने लगा- हे पिता जो संसार से तो अवश्य ही सम्बन्ध टूटा है किन्तु त्रिलोकी नाथ से सम्बन्ध जुड़ गया है। संसार से सम्बन्ध जोड़ने में दुख है किन्तु परमात्मा से जोड़ने में तो सुख ही सुख है। रतने के पिता ठकुरे ने कहा- यह ऊंट, आभूषण, गहना आदि तो मुझे दे दे और जिससे तुमने जोड़ी है उसी के पास चले जाओ। तुम्हारे जैसे लोगों के लिए मेरे घर में जगह नहीं है। इस प्रकार से कहते हुए रतने को घर से बाहर निकाल दिया।

हे विल। ऐसा कहा जाता है कि रतने को ऐसा खेत दे दिया था कि जिसको बाजरी तोड़ लो थी। ऐसे घड़े दे दिए थे जिनमें घी के स्थान में जल भरा हुआ था। यही धन देकर रतने को घर से बाहर निकाल दिया।

रतना जांगलू से अपनी श्री सहित समराथल पर श्री देवजी के पास चला। जाम्भोजी अपने भकों सहित समराथल पर विराजमान थे। अपने भक्तों से कहा- आप लोग यहां से रतने के सामने जाओ यहां अति निकट ही रतना आ चुका है। मजीरा आदि लेकर जाओ गाते बजाते हुए सम्मान करते हुए यहां पर ले आओ। रतने ने धर्म की रक्षा की है। उसके मातापिता ने रतने को घर से निकाल दिया है, मैंने उसको अपना लिया है। इस प्रकार से धर्म को रक्षा करने वाला मुझे बहुत ही प्यारा है। रतना धोक धोरे पर आकर सर्व प्रथम सम्भराथल का दर्शन करता है।

जाम्भोजी द्वारा भेजी हुई भक्त मण्डल धोक धोरे पर सामने जाकर साखी, शब्द, ध्वनि का गान करते हुए बड़े ही हर्षोल्लास के सहित रतने को समराथल पर प्रवेश करवाया। जाम्भोजी ने रतने को शुभ आशीर्वाद प्रदान किया और कहा- रतना। तुमने धर्म की मर्यादा को बांधा है तेरे पिता ने कुछ नहीं दिया | तो क्या हुआ मैं तुझे सभी कुछ देता हूं।”तुम्हारे पास जो पानी के घड़े है वह तो घृत के हो जायेंगे। और तोड़ी हुई बाजरी पुनः सिटे निकाल देगी।

” पाणी सू घृत कुड़ो से कुरड़ा, सो घी ता बाजरियो जोवन” तुम दुख मत मानना कि धर्म की रक्षा करने वाले इस प्रकार से दुख क्यों पाते हैं? तुम्हे दुखी नहीं होना चाहिए अब तुम पारवा जाकर बसो। और धर्म की रक्षा करते हुए कुल वंश की अभिवृद्धि करो। तुम्हारे कुल में सभी भक्त ही पैदा होंगे। आर धन, रूप, गुण, लक्ष्मी को कोई कमी नहीं रहेगी।

 उस समय रतने ने पूछा-हे देव। धर्म का मर्म क्या है हमें क्या करना चाहिए।किस एक देवता का सहारा लेना चाहिए। इस जीवन का मूल क्या है? यह बतलाने की कृपा करें श्री जाम्भोजी ने रतने को लक्ष्य कर के यह महत्वपूर्ण शब्द सुनाया

                             शब्द-120

ओ३म् विष्णु विष्णु तू भण रे प्राणी, इस जीवन के हावै।

 क्षण क्षण आव घटती जावै, मरण दिनों दिन आवै।

पालटीयो गढ़ कांय न चेत्यो, घाती रोल भनावै।

गुरु मुख मुरखा चढ़े न पोहण, मनमुख भार उठावै।

ज्यूं ज्यूं लाज दूनी की लाजै, त्यूं त्यूं दाब्यो दाबै।

 भलियो होय सो भली बुध आवै, बुरी बुरी कमावे।

हे रतना ! इस जीवन का मूल विष्णु परमात्मा ही है। विष्णु सर्व जीवों का पालन पोषण करता सत्वगुण सम्पन्न परमात्मा ही है। वह विष्णु हो हमारी आत्मा है, इसीलिए तुम्हें विष्णु का हो जप करना चाहिए। यही धर्म है । यह तुम्हारा मूल है। संसार की अन्य वस्तु तुम्हारे जीवन में कुछ भी सहयोगी नहीं है न ही तुम्हारे साथ जाने वाली है। एक विष्णु का नाम प्रेम से लिया हुआ तुम्हारे साथ जायेगा।

 यह शरीर तो आयु में बंधा हुआ है आयु समय तो क्षण क्षण करते हुए व्यतीत हो रहा है। मृत्यु प्रतिक्षण नजदीक आ रही है। इस नाशवान शरीर को लेकर अहंकार किस बात का किया जा रहा है यह शरीर रूपी गढ देखते देखते ही पलट गया है पहले कभी बाल्यावस्था थी। फिर युवावस्था आयी थी और अति शीघ्र हो बुढ़ापा भी आ रहा है। फिर भी सचेत नहीं हुआ।

कुछ आगे के लिए भी समान जुटाना चाहिए था। यह शरीर दिनोदिन जीर्ण शीर्ण हो रहा है काल ने इस पर जबरदस्त प्रभाव जमा दिया है यह एक एक क्षण कर के बदल रहा है।

गुरु मुखी होकर तो मूर्ख कार्य करता नहीं है जो सरलता से किया जा सकता है किन्तु मनमुखी होकर व्यर्थ का ही भार उठा रहा है। दुनियां को लज्जा शर्म मर्यादा में हो यदि रह कर अपना जीवन व्यतीत कर दिया तो अपने दावे से चूक गया। दावा न्याय के लिए गुहार ऐसी करनी चाहिए कि निर्णय हो जाये और इस जीवन की बाजी में जीत जाये।

 जो सन्जन प्रकृति का व्यक्ति होगा वह तो सदा हो भला ही करेगा। और जो दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति

होगा वह सदा दुष्टता ही करेगा।”प्रकृति पान्ति भूतानि निग्रह कि करिष्यति । सभी प्राणी अपनी प्रकृति में हो जोते है निग्रह क्या करेगा। इसलिए प्रकृति को जानना ही ज्ञान है ज्ञान से ही मुक्ति संभव है।

 तुम्हें दूसरे की कमी को देख कर चिंतित नहीं होना चाहिए। पहले अपने को हो देखना चाहिए फिर बाहर देखना । जो चुरा पापो होगा वह तो चौरासी लाख योनियों में भटकेगा। और जो भला आदमी होगा वह जन्म मरण के दुख से छूट जायेगा। इसीलिए भले- अच्छे बनने के लिए प्रयात्नशोल रहना चाहिए।

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