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पूल्हाजी को स्वर्ग दिखाना

                   पूल्हाजी को स्वर्ग दिखाना

                   पूल्हाजी को स्वर्ग दिखाना
                   पूल्हाजी को स्वर्ग दिखाना
 
विल्होजी उवाच-हे गुरु देव ! गोरखयति को अपना गुरु भाव स्वीकार करने तथा उनसे भगवीं टोपी ग्रहण करने के पश्चात् जम्भेश्वर जी ने पन्थ स्थापना हेतु क्या-क्या उपाय किये । किस प्रकार से उनके परिवार के सदस्यों ने अपना समर्थन दिया । क्योकि वे तो लोहट जी पंवार कुल में जन्म लेकर भगवां वस्त्र पहन कर साधु वेश में रहने लगे थे । यह सभी कुछ उनके कुल परिवार के लोगो को तो असह्य ही होगा । अन्य भी भगवान की विचित्र लीला आपके दृष्टि गोचर होती हो तो अवश्य ही बतलाने की कृपा करें। भगवान की लीला तो जितनी श्रवण की जाये उतनी ही कम हैं।
 
 नाथोजी उवाच- हे शिष्य वील्हा ! जब जम्भेश्वर जी अपने पिता द्वारा अर्जित की हुई धन सम्पति को त्यागकर के सम्भराथल पर ही स्थाई रूप से निवास करने लग गये थे । वहीं पर ही योग ध्यान द्वारा समाधिस्थ रहने लग गये थे । उस समय उनके पास आने वाले अधिक नहीं थे एक दूसरे से चर्चा सुनते और परिचय करते तो केवल इतना ही कि आज – कल लोहट जी का पुत्र जाम्भोजी पीपासर छोङकर सम्भराथल पर ही रहने लगे है । विवाह तो उन्होंने किया ही नहीं है ।
 
अब तो साधु बन गये है । न जाने वहां पर ही क्या करते रहते हैं, गांव में तो कभी आते ही नहीं है । कोई ग्वाल बाल पाल चराने वाले यदा कदा उनके पास चले भी आते थे, उनसे प्रेम भाव भी रखते थे। किन्तु उनकी गति तो बडी विचित्र है समझ में आती नहीं है एक दिन लोहटजी के छोटे भ्राता लाडनूं निवासी पूल्होजी पींपासर आये ।
 
उन्होंने बड़े भाई एवं भाभी के बारे में जानकारी ली तो मालुम हुआ कि वे तो स्वर्ग सिधार गये । अपने भाई के वियोग में दो आंसू बहाये । उनको सद्गति मिले ऐसी ईश्वर से प्रार्थना की । पूल्होजी ने पूछा-लोहट का यशस्वी बेटा मेरा भतीजा जम्भेश्वर कहां है ? गांव के लोगों ने बतलाया महाराज ! जम्भेश्वर तो आज कल सम्भराथल पर रहने लग गयें हैं ।
 
पीपासर आना जाना छोड़ दिया है । पहले तो हमारे दीनानाथ लोहटजी एवं हांसा देवी हमें छोङकर स्वर्ग सिधार गये । हमने धैर्य धारण किया था कि चलो कोई बात नहीं उनका पुत्र हमें सुख प्रदान करेगा किन्तु वो भी हमें निराधार छोडकर जंगल में ही रहने लग गये है और भगवां वस्त्र धारण कर लिया है ।अब वो हमारे अकेले ही देवता नहीं रहे, उन्होने तो अपना जीवन सार्वजनिक कर लिया है । अब तो वे सभी के है, सभी उनके है । बीच में मोह माया का जाल था वह तोङदिया ।
 
इसलिये तो उनकी गायें धन -दोलत , जमीन जायदाद आदि सभी कुछ सार्वजनिक हो गई है। अब तो उसों हमारा सभी का हक बराबर है । यह देखो पूल्होजी !
 
यह सारा धन जाम्भाणा हो गया है । इनके पशुओं के जाम्भाणा चिन्ह लगा दिया है । उनकी जमीन गोचर भूमि हो गई है । उनका घर धर्मशाला बन गया है । और जो कुछ भी था वह सभी कुछ सभी के लिए है पू ल्होजी कहने लगे – हैं पीपासर वासियों ! यह कैसे हो सकता है । यह तो हमारे कुल के मर्यादा की बात है हमारे कुल में जन्मा व्यक्ति साधु होकर भिक्षा मांगे यह कैसे हो सकता है इस प्रकार से तो हमारी परम्परा ही समाप्त हो जायेगी । मेरे बड़ेभाई साहब के स्वर्गवासी हो जाने पर ही ऐसा हुआ है यदि वे आज जीवित के तो ऐसी नौबत नहीं आती।
 
 मैं आज ही जाता हूँ और अपने कुल दीपक को समझा बूझा कर ले आता हूँ और संसार के कार्य में प्रत् कर देता हूँ। ऐसा कहते हुए पूल्होजी जम्भेश्वर के पास सम्भराथल पर पहुँचे । वहां जाकर” जय अस्या शक्ति “कहते हुए वहां पर बैठ गये । मैं आपका सम्बन्धी तुम्हाराचाचा तुमसे कुछ बात पूछने आया हूँ । मेरी तरफ थोडा ध्यान दो आपका भेद जानना चाहता हूं आप कौन पुरूष है ? यहां पर क्यों बैठे हैं ? किसलिए आपका संसार में आना इा क ? आखिर आपका यहां पर बैठने का प्रयोजन क्या है ?
 
आपने इस अवस्था में भगवा वस्त्र धारण कर लिया है । यह अवस्था सन्यास की नहीं है? इस समय तो तुम्हें गृहस्थ धर्म का पालन करना चाहिए । यदि आपमें कुछ सिद्धि या देवता के गुण है तो प्रगट रूप से दिखाइये । जिससे मैं तथा मेरे अन्य साथी आपको पहचान सके । यदि आप मुझे कोई विचित्र प्रचा चमत्कार दिखाओगे तो में साक्षी बन जाऊंगा, लोगो को हकिकत बताऊंगा आपका कार्य सुलभ हो जाएगा । मैं वैसे तो आपसे बड़ा भी हूँ किन्तु कुछ अद्भुत प्रचा प्राप्त करने के लिये आपके पास आया हूँ इसलिए मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ।
 
 जम्भेश्वर जी ने कहा- है चाचाजी ! सावधान हो जाओ ! विचार करो, सतगुरु के वचन सत्य होते हैं। । मैंने सतयुग में भक्त प्रहलाद को वचन दिया था कि मैं स्वयं तुम्हारे मित्र अनुयायियों को जो तेतीस करोङ है उनका उद्धार करूंगा । पांच करोङ तो सतयुग में ही प्रहलाद के साथ पार उतार दिये , जन्म मरण के चक्कर से छुड़ा दिये । सात करोड़, त्रेता युग में हरिश्चन्द्र के साथ तथा नौ करोङ द्वापुर युग में राजा युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग में पहुंचा दिये । अब कलयुग में बारह करोङके लिए आया हूँ, उन्हे भी स्वर्ग में पहुंचाउंगा । ये वचन मेरे दिये हुए है उन्हे पूरा करने के लिए मैं आया हुआ हूँ।
 
 इस समय मैं धर्म रूपी विमान लेकर आया हूँ इस विमान पर मैं प्रहलाद पंथी जीवों को बैठा कर ले जाऊंगा । इक्कीस करोड़ पूर्व से बचे हुए है बारह करोड़ का उनसे मिलन हो जाएगा तो आनन्द होगा । जभी हमारा कार्य पूर्ण होगा, तभी मैं यहाँ से प्रस्थान कर जाऊंगा, एक क्षण भी नहीं ठहरूंगा ।
 
 वैसे तो मैं अलख निरंजन निराकार ब्रह्म हूँ किन्तु जब मैं भी एक से अनेक होने की इच्छा होती है तो” एकाकी न रमते “
अकेले से खेल नहीं खेले जाते तो एक से अनेक हो जाते हैं। एक से अनेक होने के लिए मैं स्वयं माया पति अपनी माया को वश में करके ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में हो जाता हूँ ।
 
क्योंकि सृष्टि के उत्पति कर्ता ब्रह्मा पालन कर्ता विष्णु, और संहार कर्ता महेश हो जाता हूँ । वही विष्णु पालन पोषण कर्ता होने से जब भी प्रक्रति में विकृति – उलट पलट अत्याचार – अन्याय होने लग जाते हैं तो मैं ही राम -कृष्ण आदि नौ अवतारों के रूप में आता हूँ इस समय भी मैं वही विष्णु इस उपरोक्त कार्य हेतु आया हूँ। पूल्होजी उवाच – हे जम्भेश्वर ! आपकी बात ठीक तो मैं जभी मानूँगा जब आप मुझे इस शरीर से स्वर्ग दिखा दे अन्यथा केवल कथन मात्र से मैं हमारे ये लोग भले ही प्रहलाद पंथी ही क्यों न हो, एक भी आपकी बात मानने को तैयार नहीं होंगे।
 
 जाम्भोजी उवाच – मैं आपको स्वर्ग तो इस शरीर से अवश्य दिखाता किन्तु स्वर्ग का कुछ आकर्षण ही ऐसा है कि एक वहां पहुंच जाने पर फिर वहीं का हो जाता है, वापिस आने का नाम ही नहीं लता है। यदि आए भी वहीं का ही होकर रह गये तो फिर यहां आकर कौन कहेगा कि स्वर्ग भी सत्य है, जम्भेश्वर के वचन भी सत्य है । हे चाचाजी ! मेरी समस्या तो ज्यों की त्यों बनी रहेगी। वैसे नियम है कि अनधिकारी को स्वर्ग नहीं दिखाना चाहिए।
 
 अब से पूर्व तो राजा हरिश्चन्द्र के पिता त्रिशंकु ने भी आपकी तरह ही स्वर्ग देखने की जिद की थी अपनी परंपरा के गुरु वशिष्ठ को छोङकर गुरु विश्वामित्र को अपना गुरु बना लिया था । जिस वजह से त्रिशंकु विश्वामित्र के प्रयत्न से न तो स्वर्ग में जा सका और न ही वापिस धरती पर आ सका बीच में ही लटक गया वही दशा कहीं चाचाजी तुम्हारी न हो जाय ।
 
जो निज स्व धर्म को छोडकर परधर्म की तरफदेखता है उनकी यही गति होती है स्वर्ग में नहीं । केवल एक धर्मराज युधिष्ठिर को छोड़कर अब तक कोई भी इस पंचभौतिक शरीर से गया है क्योंकि युधिष्ठिर तो पूर्ण धर्मात्मा थे धर्म के पालक थे । उसी तरह आप भी सत्य धर्म के प्रति प्रतिष्ठित हो जाओगे तो अवश्य ही स्वर्ग पहुंच जाओगे । अन्यथा अनाधिकार चेष्ठा करोगे तो बीच में ही लटक जाओगे।
 
 पूल्होजी उवाच – जैसा आप कहते हो वैसा ही होगा मैं सत्य शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं आपके कथनानुसार ही चलूंगा । मैं वहां पर सदा के लिए रहने के लिए आपसे प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ केवल देखने की बात है, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि स्वर्ग देखकर वापिस लोट आऊंगा । यदि सच्चा शिष्य गुरु को मिल जाये तो गुरु शिष्य पर विश्वास कर लेता है।
 
 जम्भेश्वर जी ने मैं ले चलता हूँ। कहा- अच्छा तो तुम अपना हाथ मुझे दो और अपनी आंखे बंद कर लो, मैं तुम्हे स्वर्ग में ले चलता हूं।
 
 

                                                         दोहा 

                                   मनस्या सास विवाण करि, सतगुरु पुल्ह बइठ ।

                                  कीसन चीलत पुंहता सुरग, अजब अचम्भो दीठ ।।

 
 
 सतगुरु जाम्भोजी ने मनसा स्वकीय इच्छा से ही श्वासो का विमान बनाया और स्वास के विमान पर पूल्होजी को बिठाया । हमारा श्वांस और हमारा मन-संकल्प – विकल्प इनका गहरा सम्बन्ध है । यदि स्वास की गति का निरोध करते है तो चंचल मन स्वतः ही शांत हो जाता है तो स्वांसो की गति स्वतः ही धीमी पङजाती है एक दूसरे का गहरा सम्बन्ध है खिंचाव है।
 
 जब पुल्होजी से संकल्प करवाया कि मैं तुम्हे स्वर्ग दिखाता हूँतब उनकी श्वास की गति रोकने के लिए कहा – जब श्वांस की गति रूक गई एक क्षण के लिए तब चंचल मन शांत होकर आत्मा में लीन हो गया वहां आत्मस्थ मन आत्मा के ही सत् चित आनन्द रूप का अनुभव करने लगा। यही समाधि की अवस्था है।
 
जम्भेश्वर जी ने उन्हे कुछ क्षणो के लिये समाधि में स्थित कर दिया था क्योंकि जब मन समाधि में उतारा स्वर्ग देखने का संकल्प लेकर उतरा था इसलिए स्वर्ग को देख रहा था । स्वर्ग की जैसी कल्पना थी वह वहाँ पर स्थिर मन से देख रही थी । स्वर्ग की कल्पना तो अपने अपने स्वभाव के अनुसार ही होती है । सभी का स्वर्ग सुख भिन्न-भिन्न ही होगा क्योंकि रूचि भिन्न-भिन्न ही होती है।
 
 इस प्रकार से पूल्होजी को स्वर्ग दिखाया । कुछ ही क्षणों में सुख भोगने के पश्चात् श्री देवजी ने कहा – अब आप वापिस चलिये । अब तो बस इतना ही पर्याप्त होगा पूल्होजी कहने लगे- अब तक तो मेरा मन भरा नहीं है, जब सुख से भूख मिट जाएगी तभी चलूँगा । कभी भूख मिटती है ? चाचाजी । असम्भव है? चलिये, इतना ही देख लिया अब संतोष कीजिये आपने चाचाजी वचन दिय थे वापिस शीघ्र आने का विचार कीजिए और चलिए।
 
पुल्होजी कहने लगे – मैने वचन तो दिये थे किन्तु आप तो अपने हमारे है, मेरे बचनो को माफकर दीजिये , मैं आपसे विनती करता हूँ मेरा मन वापिस जाने को तैयार नहीं है । स तो ठीक है – ऐसा कहते हुए जम्भेश्वर जी ने कहा मैं तुम्हे आगे और सुन्दर स्थानों पर ले चलता हूँ यहां पर तो केवल कर्मों का भोग ही है वह भी समय पर भोगने से मिट जाता है । मैं तुम्हे वह परम पद दिलाऊंगा जो कभी भी नष्ट होने वाला नहीं है , सदा एक रस रहने वाला है जाम्भोजी ने थोडी झलक नरक की भी दिखलाई तो पुल्होजी तुरन्त वापिस मृत्यु लोक में आने को राजी हो गये।
 
 कहने लगे इससे तो हमारा मृत्यु लोक ही अच्छा है , जहां पर समभाव है न तो ऐसा स्वर्ग ही है और न ही ऐसा भयंकर नरक ही है । पूल्होजी वापिस मृत्यु लोक में आकर सभी से कहने लगे- हे भाईयो ! जैसा जम्भेश्वर जी कहते है वह सत्य है मैं अपनी आंखो से स्वर्ग और नरक देखकर आया हूँ । पूल्होजी ने वापिस आकर अपनी सम्पूर्ण सम्पति दान करने की घोषणा कर दी ।
 
अपनी दो कन्याओं का विवाह सुपात्र वर को ढूंढ कर के कर दिया । कन्यादान में अपनी बहुत सारी सम्पति प्रदान कर दी । स्वयं अपने आप रणसीसर जाकर जंगल में ध्यान- भजन – समाधी में लीन रहने लगे । अपने जीवन को सुगन्धमय बनाया तथा अन्य लोगों के लिये भी प्रेरणा के स्रोत बने । अन्त समय तक वही रणसीसर में रह कर शरीर का त्याग किया । वहीं जंगल में उनके नाम से साथरी की स्थापना हुई है । प्रहलाद पन्थी जीवों में एक पूल्होजी भी थे जाम्भोजी महाराज का उद्देश्य भी यही था ।” सोध्या जीव सुजीव”
 
 
 यह सभी कुछ गुरु देव की कृपा से ही सम्पन्न हुआ था जाम्भोजी ने जो कुछ भी अद्भुत प्रचा दिखाया था वह सभी कुछ कृष्ण चरित्र से ही सम्भव होना बताया है यह भी कृष्ण चरित्र का ही प्रमाण था । जो एक बार भी अपनी आंखो से देख लेता है वह प्रत्यक्ष प्रमाण होता है । फि र कभी भूलता नहीं है । पूल्होजी ने र्वर्ग के सौन्दर्य को अपनी आँखो से देखा था इसलिये वापिस आने पर भी कभी भी वह अद्भुत दृश्य पूल्होजी भूल नहीं सके थे ।
 
दिन रात हरि का स्मरण करते हुए अपने जीवन को सफल बना लिया । पूल्होजी आये थे अपने भतीजे को समझाने के लिये किन्तु स्वयं ही समझ गये । अपने जीवन का मार्ग बदल दिया । अज्ञानान्धकार दूर हो गया, ज्ञान का प्रकाश हो गया । जीवन के अन्तिम लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त हो गये।

                 

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