निर्माण कालीन समराथल ……..समराथल कथा भाग 16

निर्माण कालीन समराथल ……..समराथल कथा भाग 16
निर्माण कालीन समराथल ........समराथल कथा भाग 16
निर्माण कालीन समराथल ……..समराथल कथा भाग 16

    हमारे समाज के जिन महानुभावों ने साठ वर्ष को पार कर दिया है वे अब भी हमें बता रहे हैं कि संवत् 2000 से पूर्व हम लोग अमावस्या को हवन करने के लिये सम्भराथल पर अवश्य ही जाया करते थे। मकाम से चलते समय घृत सामग्री तथा हाथ में जल का लोटा अवश्य ही होता था क्योंकि वहां पर जल की व्यवस्था नहीं होती थी। सम्भराथल धाम को तो अति पवित्र मानकर वहां पर तो केवल हवनादिक शुभ कार्य पूर्ण होने तक ही रुकते थे।  

अधिक देर तक वहां नहीं ठहरा जा सकता था, एक तो वहां जल तथा ठहरने की व्यवस्था नहीं थी, दूसरी बात यह भी थी कि जल तथा ठहरने की व्यवस्था भी हो सकती थी यह कोई असम्भव बात नहीं है। वहां पर भावना यह थी कि यह सम्भराथल अति ववित्र तीर्थ शिरोमणी है।   यहां पर ठहरना तो तभी उचित है यदि वहां पर रहकर धार्मिक कार्य का ही अनुष्ठान साधना की जावे अन्यथा तीर्थ में रहकर इधर-उधर की गपशप करना, निन्दा बैर विरोध की बातें करना तो और पापों का भार चढ़ाना है इसलिये वहां पर तो उतनी ही देर ठहरा जाता था जितनी देर तक धार्मिक अनुष्ठान चलता रहे।

जब सांसारिक बातों की बारी आती थी तो वहां से नीचे चलकर मुकाम में ही निवास होता था।    एक भावना यह भी कार्य करती थी कि जिस स्थान को अति पवित्रतम माना जाये, जहां पर हवनादिक शुभ कार्य किया जाये वहां पर मलमूत्र का त्याग भी तो कैसे किया जा सकता है। यदि वहां पर ठहरना होगा तो यह समस्या भी तो सामने आयेगी ही। इसलिये सम्भराथल से दूर ठहरना ही उचित समझते थे।

इस समय भी जो लोग समझदार तथा बुजुर्ग वर्ग हैं वे मलमूत्र त्याग के लिये दूर ही जाना पसन्द करते हैं। सम्भराथल पर मेला न लगाने का यही कारण था जिसका पालन बहुत समय तक होता आया था। सम्भराथल ही नहीं, यही परम्परा जाम्भोलाव पर भी देखने को मिलती है।   वहां पर भी तालाब तथा मन्दिर से दूर ही संतों के आश्रम हैं तथा मेला भी वहीं दूर ही लगाया जाता है ताकि मन्दिर तथा तालाब को पवित्र रखा जाये तथा हरिद्वार आदि तीर्थों में भी प्राचीन समय में ऐसी ही परम्परा थी किन्तु अत्याधुनिक युग में इन परम्पराओं को तोड़कर कोई अच्छा कार्य नहीं किया है।

इस परम्परा को तोड़ते हुए सर्वप्रथम संवत् दो हजार के प्रारम्भ में ही सम्भराथल पर जल का कुण्ड तथा गुफा का निर्माण कार्य किया गया जिस आशय का शिला लेख अब भी जल के कुण्ड तथा गुफा पर विद्यमान है वह इस प्रकार से है  

                                          श्री जम्भेश्वराय नमः। ॐ श्री गणेशाय नमः ।

   श्री लेफ्टिनेंट जनरल हिज हाईनेस महाराजाधिराज राजेश्वर नरेन्द्र शिरोमणी महाराज श्री सर गंगा सिंह जी बहादुर जी. सी. एस. आई. जी. सी. आई.ई. जी. सी. बी. आई. जी. बी. आई. के. सी. बी. ए. डी. सी. एल. एल. डी. महाराज बीकानेर नरेश जी के बारे में सम्भराथल धोरे पर यात्रियों की सुविधा के लिये जल कुण्ड धर्मशाला सदाव्रत मन्दिर आदि बनाने के लिये कमेटी ने काम आरम्भ कर दिया है सं. 1998 माह कृष्ण अमावस्या तथा इसी तरह का सम्भराथल पर स्थित बड़े जल कुण्ड पर लगा हुआ है वह सं. 2000 का संकेत कर रहा है।    

इस शिला लेख से ऐसा मालूम पड़ता है कि उस समय तक तो बीकानेर महाराजा गंगासिंह जी जीवित थे और उनकी आज्ञा लेकर ही वहां पर निर्माण कार्य प्रारम्भ किया जा सकता था। उस समय राजा का प्रभाव भी देखने को मिलता है कि कहीं पर भी बिना राजाज्ञा के कोई पता भी नहीं हिल सकता है। कोई भी सार्वजनिक कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व राजाज्ञा प्राप्त करना अनिवार्य थी। ऐसा सुनने में आता है कि उस समय तक मुकाम मन्दिर में तो पुजारी वहां के थापन ही हुआ करते थे तथा मन्दिर का चढ़ावा भी पुजारियों के पास ही रहा करता था।  

मन्दिर तथा मेले की व्यवस्था का कार्य भी वे ही लोग स्थानीय बिश्नोईयों की पंचायत ही देखा करती थी किन्तु अखिल भारतीय वर्ग तथा बिश्नोई महासभा उस समय सक्रिय हो रही थी। समाज प्रबुद्ध महासभा मन्दिर की व्यवस्था अपने हाथों में लेकर सुधार करना चाहती थी। इसलिये मन्दिर की व्यवस्था अपने हाथ में महासभा ने लिया और व्यवस्था को सुचारू रूप से चला रही है। तथा साधु महापुरुषों ने सम्भराथल पर अन्न जल की व्यवस्था की तथा साधु-संत वहां पर स्थायी रूप से रहकर हवन, सदाव्रत आदि का कार्यक्रम चला सके इसके लिये एक गुफा तथा जल कुण्ड और सम्भराथल के ऊपर एक छोटे से मन्दिर का निर्माण करवाया ताकि उसमें नियमित रूप से हवन कार्यक्रम चलता रहे।    

प्रारम्भिक अवस्था में तो संत महात्मा यहां पर साधना के लिये ही रहा करते थे। उस समय कोई भी सुविधा विशेष नहीं हुआ करती थी। जिस प्रकार से प्राचीन काल में ऋषि-मुनि लोग एकान्त घने वन में रहकर अपनी साधना को ही ध्येय मानते थे, साधना के लिये अनेक प्रकार के कष्ट भी उठा लिया करते थे। न ही वे किसी के सामने जाकर हाथ ही फैलाते थे। वहीं पर अपने गुजारे लायक कन्दमूल फल उगा लिया करते थे। उसी प्रकार से उस समय सम्भराथल पर निवास करने वाले संतों ने भी वैसा ही तपस्यामय जीवन व्यतीत किया था।    

उन संतों ने भरसक प्रयास भी किया कि किसी प्रकार से यह सम्भराथल पुनः साधना भजन का केन्द्र बने । इस पवित्रतम धाम का सदुपयोग हो सके। अधिक से अधिक जन समुदाय यहां पर पहुंच करके आत्मोन्नति का लाभ उठा सके। इसलिये उन्होनें कठिन परिस्थितियों को झेलते हुए भी कुछ लोगों द्वारा विघ्न बाधायें उपस्थित कर देने पर भी चट्टान की तरह अडिग रहे, अपने निर्णय से नहीं हटे और अपने संकल्प को पूर्ण करके दिखलाया।  

उस समय में सर्वप्रथम सम्भराथल पर निवास करके स्थिति को मजबूत करने वालों में सर्व अग्रगण्य संत भी काशीराम जी, लिछीराम जी, रामलाल जी, रामप्रकाश जी तथा गोपाल दास जी हैं। इन महापुरूषों में अन्य सभी तो स्वर्गवासी हो चुके है किन्तु संत श्री रामलाल जी अभी भी जीवित हैं तथा इस वृद्धावस्था में भी नि:स्वार्थ भाव से सूरतगढ़ में बिश्नोई मन्दिर, धर्मशाला, औषधालय आदि की व्यवस्था के लिये प्रयत्नशील है तथा अनेक स्थानों में भूमि का अधिग्रहण करके वहां पर निर्माण कार्य करके समाज को समर्पित कर दिया है। अभी सं. 2042 में पंच शताब्दी के अवसर पर महासभा ने उन्हें सम्मानित भी किया है।

उन्हीं का भी यहां पर सम्भराथल को बसाने का सक्रिय सहयोग रहा है।   “बहता पानी निर्मला पड़ा गंदिला होय, साधु तो रमताई भला जो दोष न लागै कोय” कुछ महात्मा लोग इसी उक्ति को ही महामंत्र मानकर भ्रमणशील ही बनना पसन्द करते है। यह अच्छी बात भी हैं क्योंकि महात्मा लोग भी यदि स्थायी आश्रम बनाकर बैठ जायेंगे तो फिर भूले भटके हुए लोगों को सचेत ही कौन करेगा इसलिये भ्रमण करना परमावश्यक भी है। अतः सम्भराथल पर स्थायी रूप से ये सभी अन्य महात्मा लोग तो निवास नहीं कर सके.

भ्रमणशीलता में जब थक जाया करते थे तब यहां पर आकर कुछ दिनों तक पुनः आत्म शक्ति अर्जित किया करते थे किन्तु इन्हीं महापुरुषों की परम्परा में संत शिरोमणी महात्मा रामप्रकाश जी ही एक ऐसे बिरले महापुरूष निकले, जिन्होनें संवत् 2000 से ही सम्भराथल को अपना तपस्या स्थल चुना था।   सन्यास ग्रहण करने के पश्चात् विद्याध्ययन योग साधना आदि की जानकारियां प्राप्त करके सम्भराथल पर आकर विराजमान हुए थे।

सांसारिक पदार्थों की अभिलाषा त्याग करके नित्यप्रति साधना भजन भाव में लीन रहकर स्वकीय आत्मा के अमृत को यहीं प्राप्त किया था जिससे सदा के लिये सांसारिक भोग्य पदार्थों के प्राप्ति की इच्छा निवृत्त हो चुकी थी। इन्हीं महापुरुष की देखरेख में आधुनिक सम्भराथल का निर्माण कार्य हुआ था। सबसे अधिक समय तक निवेश करने वाले संत रामप्रकाश जी ही थे।    

जब महाराज जी स्वयं ही यहां सम्भराथल पर स्थायी रूप से निवास करने लगे तब कुछ दुष्ट स्वभावजनों का हौसला पस्त हो गया उनका कुछ प्रभाव ही ऐसा था सामने आने वाला व्यक्ति स्वतः ही दर्शन मात्र से ही दुष्टता भूल कर नम्रशील हो जाता था। गुरु जी की तपस्या से प्रभावित होकर उनके पास साधना भजन भाव के इच्छुक सज्जन लोग आने लगे। उन्हीं की देखरेख में वहां पर साधना का कार्यक्रम चलने लगा इसी दौरान संत श्री चन्द्रप्रकाश जी महाराज भी भ्रमणशीलता में रहा करते थे।

सदा तो भ्रमणशील जीवन व्यतीत होना कठिन है कुछ दिनों के लिये विश्राम की तथा साधना के लिये उपयुक्त स्थान की तो आवश्यकता होती ही है।   इसलिये संत श्री चन्द्रप्रकाश जी सम्भराथल पर विराजमान श्री रामप्रकाश जी के पास में आये संतों का मेल मिलाप जब भी होता है तभी कोई ज्ञान की चर्चा या उपलब्धि की वार्ता ही चला करती है। इन्हीं बातों के दौरान साधना के लिये स्थल की बात चली तब संत श्री रामप्रकाश जी ने कहा कि आप क्यों अन्यत्र जगह बनाने का प्रयास करते हो, यही उत्तम तीर्थ है यहीं पर रहकर भजन भाव करोगे तो अनन्त गुणा फल वाला होगा।

उसी दिन से संत रामप्रकाश जी को अपना गुरु भाव मानकर वहीं सम्भराथल पर ही अपनी कुटिया बनाकर स्थायी रूप से निवास करने लगे।   सम्भराथल पर पश्चिम दिशा में संत रामप्रकाश जी की कुटिया थी, जो अब भी है। जहां पर आश्रम का रूप ले लिया है तथा पूर्व की तरफ स्वामी चंद्र प्रकाश जी की कुटिया है जहां पर सबसे प्राचीन कुटिया पर इस प्रकार से लिखा हुआ है-“108 श्री स्वामी जी चन्द्रप्रकाश संवत् 2020 मिति माघ सुदी 15 में महात्माजी ने यह स्थान बनाया गया कुटिया-1 टांका पानी का लागत 5001 (पांच हजार एक) रूपिया” इस कुटिया ने भी अब आश्रम का स्थान ले लिया है।  

जहां पर भी महात्मा पुरुष निवास करते हैं वहां पर ज्ञान इच्छुक तथा मुमुक्षु जनों का आना-जाना प्रारम्भ हो ही जाता है। कुछ लोग आते हैं ज्ञान श्रवण करके पुन: अपने गृह गृहस्थी में लौट जाते है तथा कुछ लोग वहीं पर गुरु की शरण में ही रह जाते हैं। इसलिये इन्हीं दोनों महात्माओं की शिष्य परंपरा यहां सम्भराथल से चली है। महात्मा रामप्रकाश जी की शिष्य परम्परा में अनेक उच्चकोटि के महात्मा हुए है उनमें कुछ तो अपने गुरु से पूर्व तथा कुछ पश्चात् में स्वर्गवास हो चुके है तथा अन्य समाज सेवा तथा धर्म प्रचार-प्रसार कार्य में रत है।  

उनके शिष्यों में सम्भराथल पर इस समय महन्त रामकृष्ण जी, जांगलू की साथरी में संत ग्वाला ऋषि जी, मुकाम में श्याम मुनि जी तथा ऋषिकेश में हमारे पूज्य गुरु श्री स्वामी ज्ञानप्रकाश जी अपने सद्गुरु के बताये हुए मार्ग का अनुसरण करते हुए कार्यरत हैं। इस प्रकार से संत रामप्रकाश जी वसंत चंद्र प्रकाश जी के शिष्य परम्परा वृक्ष की शाखा प्रशाखा की भांति उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त हो रही है। इस समय स्वामी चन्द्रप्रकाश जी के उत्तराधिकारी महन्त श्री छगनप्रकाश जी सम्भराथल पर स्वकीय आश्रम में सेवा तथा साधना भजन में तन-मन-धन से लगे हुए है।  

 वि.सं. 2028 से पूर्व तक सम्भराथल पर हवन के लिये एक छोटा सा मन्दिर हुआ करता था। उस समय तक नित्यप्रति मंदिर में हवन होता था। महात्मा भक्त लोग भी अधिक संख्या में रहने लगे थे। इतनी संख्या देखते हुए जगह बहुत छोटी पड़ जाती थी। बाहर वर्षा, धूप, सर्दी से बचने का कोई उपाय नहीं था मन्दिर के अन्दर तो ज्यादा से ज्यादा चार आदमी ही बैठ सकते थे। ऐसी समस्या उस समय महात्माओं के सामने उपस्थित हुई थी।

तब संत रामप्रकाश जी के पास में चन्द्रप्रकाश जी आये और इस समस्या का समाधान के लिये बड़े मन्दिर निर्माण की बात चलाई तब पास में बैठे हुए कुछ भक्तों ने भी समर्थन किया तथा वहीं पर चंदे के लिये रूपये इकट्ठा करना प्रारम्भ कर दिया।  

ऐसी तीव्र इच्छा देखकर संत भी रामप्रकाशजी ने नये मन्दिर निर्माण के लिये अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी तथा तन, मन, धन से उस निर्माण कार्य में स्वयं जुट गये। इन्हीं दोनों महात्माओं के प्रयास से कालान्तर में सम्भराथल पर भव्य मन्दिर का निर्माण हुआ। सं. 2028 में मन्दिर की नींव लगाई गई थी तथा संवत् 2039 में मन्दिर का निर्माण पूर्ण हुआ। इसी बीच में ही सं. 2032 फाल्गुन कृष्ण 10 में संत श्री रामप्रकाश जी तो ब्रह्मलीन हो गये किन्तु उन्हीं के योग्य शिष्य वर्तमान में महंत रामकृष्ण जी ने मन्दिर निर्माण कार्य में पूरा सहयोग दिया जिससे किसी प्रकार की रिक्तता महसूस नहीं हुई इसी मन्दिर निर्माण कार्य का शिलालेख समराथल मन्दिर पर इसी प्रकार से अंकित है  

                                                                 ओ३म् श्री जम्भेश्वराय नमः

  श्री गुरु जंभेश्वर भगवान समराथल धोरा मन्दिर की नींव संवत् 2028 मिति चेत सुदि 5 को पूज्य श्री स्वामी रामप्रकाश जी एवं पूज्य श्री चंद्र प्रकाश जी के कर कमलों द्वारा नींव लगाकर निर्माण कार्य प्रारम्भ किया इन्हीं संतों के अथक प्रयास से बिश्नोई समाज के चन्दे द्वारा संवत् 2039 मिति आषाढ़ बदी अमावस्या सोमवती के दिन सम्पूर्ण किया गया।  

समराथल पर निवास करते बिश्नोई धर्म का प्रचार प्रसार एवं भव्य मन्दिर के निर्माण कार्य की महत्ता को देखते हुए बिश्नोई धर्म की स्थापना के पांच सौ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में भव्य समारोह में संत श्री रामप्रकाश जी को स्वर्गवास होने के पश्चात् अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा ने सम्मानित किया था। वैसे तो संत महात्मा तो स्वत: ही सम्मानित रहते हैं उन्हें किसी प्रकार के सम्मान की आवश्यकता नहीं होती।

फिर भी महासभा ने यह कार्य करके अपना कर्त्तव्य निभाया था।   समराथल पर भव्य मन्दिर का अपने अथक प्रयास से निर्माण करवा करके संतों ने अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा को सौंप दिया है। महासभा ही मुकाम समाधि मन्दिर तथा समराथल यज्ञ मन्दिर की व्यवस्था और मेले की व्यवस्था करती है। संत तो सदा ही निर्लेप रहते हैं किन्तु नित्यप्रति मन्दिर में हवन का कार्य समराथल पर संत स्वयं ही करते हैं । हवन आदि तो नित्य कर्म है जिसको नि:स्वार्थ भाव से सदैव ही मानव मात्र को करना चाहिये।

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