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धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 3

धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 3

धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 3
धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 3

  अधिक देर तक जल में खड़े रहने से सभी के पेट फूल गये, पेट में तो एक ग्रास की भी जगह नहीं बची थी। भोजन की रूचि समाप्त हो गयी थी। अधिक भोजन तो क्या कहे पेट तो पहले से ही फटने लगा था। भूख नहीं अन्न जीमत कोण।    

सभी शिष्य एकत्रित होकर कहने लगे कि इस समय तो भोजन की इच्छा कतई नहीं है यदि पाण्डवों के यहाँ भोजन करने जायेंगे तो भीमसेन स्वयं तो अधिक भोजी वृकोदर है ही और दूसरो को भी अपनी रूचि के अनुसार भोजन अधिक ही खिलाता है।

हमसे तो एक ग्रास भी नहीं खाया जावेगा, किन्तु अब | क्या करें, चलो गुरुजी के पास चलकर निवेदन करते हैं। सभी एकत्रित होकर दुर्वासा के पास पंहुचे और निवेदन किया। हे गुरुदेव ! आज तो हम सभी भोजन नहीं करेंगे, न जाने क्या हो गया है, हमारा पेट फटने जा रहा है, एक ग्रास लेने की इच्छा भी नहीं है।  

दुर्वासा कहने लगे- यही हालत मेरी भी है किन्तु युधिष्ठिर महाराज का निमंत्रण है उसका क्या होगा? भीम रू्ट हो जाएगा और यहां आयेगा, बुलाने के लिए तब मुश्किल में पड़ जायेंगे। चलो! शीघ्रातिशीघ्र यहाँ से चल पड़ते हैं। ऐसा कहते हुए सभी वहां से उल्टी दिशा में प्रस्थान कर गये जिस पर भगवान की अनुकम्पा हो जाए, उनका तो बिगड़ा हुआ कार्य ही सुधर जावे, अनहोनी भी होनी हो जावे, यही तो कृष्ण चरित्र है।  

हे मेरे जिज्ञासा अब दूसरी घटना जो पाण्डवों के काल में घटित हुई वह मेरे से श्रवण कर! बारह वर्ष के वनवास का समाप्ति काल था, उसी समय पांचो पाण्डव द्रौपदी एवं ऋषियों के साथ एक वन से दूसरे वन में भटक रहे थे। तेरहवां वर्ष अज्ञातवास को कहीं छुपकर बिताने की चिंता में थे।    

उसी समय एक ब्राह्मण-ब्रह्मर्षि भागता हुआ पाण्डवों के पास आया कहने लगा- आप पांचो भाई वीर हो, मैं एक भारी विपत्ति में फंस गया हूँ, आप मेरा उद्धार कीजिये? युधिष्ठिर ने कहा- कहिये ऋषिवर! हम आपकी क्या सेवा करें?  

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उस ऋषि ने कहा- मैं नित्यप्रति यज्ञ करता हूँ, मेरा यज्ञ करने का साधन अरणी एक हरिण सींगों में फंसाकर ले भागा है, वह तो अभी यहीं से होकर गया है, वह देखिये अभी भागा जा रहा है। वह मेरी अरणी वापिस लाकर दीजिये? जिससे मेरा यज्ञकार्य लोप न हो। इस अरणी के द्वारा ही मैं अग्नि प्रकट करके नित्य यज्ञ करता हूँ। मेरा नित्य नियम भंग न हो, ऐसा कार्य आप कीजिए।  

पाँचो भाई शस्त्र उठाकर उस हरिण के पीछे चल पड़े। आगे घने वन में जाकर वह हरिण तो लोप हो गया, कहीं दिखाई नहीं दिया। एक वृक्ष की छाया में पाँचो भाई बैठ गये युधिष्ठिर ने कहा- वह हरिण तो न जाने कहाँ गया, दिखाई नहीं देता। हमें भी बहुत प्यास लगी है, कहीं जल मिल जाये तो पीकर प्यास बुझायें और आगे बढ़ें।

धर्मराज ने नकुल से कहा- भईया ! पेड़ पर चढ़कर देखो कहीं जल दिखाई देता है तो जाओ! हमारे लिए जल ले आओ तथा अतिशीघ्र ही लौट आओ। नकुल ने पेड़ पर चढ़कर देखा तो थोड़ी दूर पर हरे भरे घने वृक्ष दिखाई दिये जो जल होने की सूचना दे रहे थे सारस, हंस आदि पक्षी उड़ते हुए देखकर नकुल ने कहा- भाई साहब! यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर जल अवश्य ही है।

मैं अभी जाता हैँ आपके लिए जल लेकर वापिस आता हूँ तब तक आप यहीं मेरी प्रतीक्षा कीजिए। ऐसा कहता हुआ नकुल तेजी से चला और शीघ्र ही तालाब पर पहुंचकर निर्मल जल का दर्शन किया।  

नकुल को प्यास लगी थी, पहले मैं जल पीलूं पीछे अपने भाईयों के लिए ले जाऊं। नकुल ने ज्यों ही जल में प्रवेश किया, त्यों ही वृक्ष के पीछे से आवाज आयी- नकुल! सावधान! पहले मेरे प्रश्नों का जवाब दे फिर जल पीना, अन्यथा तुम प्राणहीन हो जाओगे मेरा इस सरोवर पर पहले से ही अधिकार है। नकुल ने कहा- तुम मुझे रोकने वाले कौन हो? मेरे सामने आओ।  

नकुल को बड़ी प्यास लगी थी, उस बात की परवाह नहीं की सोचा, पहले जल पीलू फिर प्रश्नों का जवाब दूं।ज्यों ही जल पीने को प्रवेश किया जल को स्पर्श किया त्यों ही जल से बाहर भूमि पर गिर पड़े, गिरते ही नकुल अचेत हो गये बहुत देर हो गयी, नकुल लौटकर नहीं आया। युधिष्ठिर ने अपने भाई सहदेव से कहा- भाई ! तुम जाओ! अपने भाई नकुल को ले आओ तथा जल भी ले लाओ।

अब तक |नकुल आया नहीं क्या बात हुई? अतिशीघ्रता से आना, कहीं अपने भाई नकुल की तरह ही देरी मत कर देना। हम आपकी प्रतीक्षा में हैं।  

सहदेव अतिशीघ्रता से जल लेने चला और कहा मैं अभी गया और अभी लौटकर आया सहदेव ने जाकर तालाब के जल को देखा और अतिप्रसन्न हुआ, किन्तु अपने भाई नकुल की ऐसी स्थिति देखकर चिंतित भी हुआ। क्या हुआ है इसे जो इस प्रकार से अचेत पड़ा है ? किसी शस्त्र के निशान तो है नहीं, अच्छा जो भी होगा, फिर निपट लूंगा, पहले जल तो पीलूं?  

ज्यों ही जल पीने के लिए जल में प्रवेश किया त्यों ही आवाज आयी……. सहदेव सावधान! जलपान नहीं करना? पहले मेरे प्रश्नों का जवाब दो फिर जल पान करो? अन्यथा तुम्हारी भी वही दशा होगी जो तुम्हारे भाई नकुल की हुई है। सहदेव ने कहा- तुम मुझे रोकने वाले कौन हो,पहले मेरे सामने आओ, मुझे प्यास लगी है, मैं पहले जल पीऊंगा, फिर मैं तुम्हारे प्रश्नों का जवाब दूंगा। सहदेव ने ज्यों ही जल पीने की कोशिश की, त्यों ही अचेत होकर गिर पड़ा।  

युधिष्ठिर ने अपने भाई अर्जुन से कहा- हे वीर! तुम्हारे भाई जल लेने के लिए गए थे किन्तु अब तक लौटकर नहीं आये, तुम जाओ, अपने भाईयों को ले आओ तथा जल भी ले आओ। अपने भाई की आज्ञा शिरोधार्य करके अर्जुन गाण्डीव धनुष लेकर चला। किन्तु वहाँ जाकर क्या देखता है कि उनके दोनों भाई अचेत पड़े हैं, यह कार्य किसने किया? अर्जुन ने धनुष की टंकार की और विचार किया कि पहले जल पीलू, फिर उसे देखेंगे जिसने मेरे भाईयों की यह गति की है।  

अर्जुन ज्यों ही जल पीने लगा त्यों ही आकाशवाणी हुई, हे अर्जुन! ऐसा जल पीने का साहस मत करना, नहीं तो तेरी भी वही गति हो जाएगी जो तेरे दो भाईयों की हुई है। अर्जुन ने उस वाणी को नजरअंदाज किया तथा जल पीने की कोशिश की, जल पी नहीं सका, वहीं पर अचेत होकर गिर पड़ा।    

बहुत देर हो गयी, अब तक लौट कर नही आया है क्या बात है। अपने भाई को चिंतित देखकर भीम कहने लगा- भाई ! अब तो मैं जाता हूं, अपने भाईयों को ले आता हूं तथा जल भी। भीम बड़े ही गर्व से चला, वहाँ जाकर देखा तो तीनों भाई अचेत पड़े हुए हैं। अपने भाईयों को उठाने की कोशिश की, किन्तु कोई नहीं उठा।

इधर कोई व्यक्ति भी नहीं दिखाई देता, इनका किसी के साथ युद्ध हुआ है? ऐसा भी मालूम नहीं पड़ता। अभी पहले मैं जलपान करलं, फिर इन्हीं के बारे में विचार करूँगा। प्यास के मारे बोला भी नहीं जा रहा है, गला सूख गया है। भीम ने ज्योंहि जल पीने केलिए तालाब में प्रवेश किया, आवाज आयी…. भीमसेन सावधान! पहले जलपान नहीं करना, मेरे सवालों का जवाब देना है?

अन्यथा वही गति तेरी हो जाएगी, जो तुम्हारे 3 भाईयों की हुई है। भीम ने उनके वचनों की परवाह नहीं की, ज्यों ही जल पीने लगा, अभी तो गले में पंहुचा भी नहीं था कि वहीं पर जल के किनारे मूर्च्छित होकर गिर पड़े।  

चारों भाई अब तक लौटकर नहीं आये हैं क्या बात है ? मैं स्वयं चलूं। कुछ अनहोनी अवश्य ही हो गयी है। नहीं तो मेरे चारों भाई वीर है, उनका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। युद्ध के मैदान में तो चाहे स्वं इन्द्र-महादेव ही क्यों न आ जाये, उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। अब तो मैं अकेला रह गया हूं, मेरे भाईयों के बिना मेरा जीवन व्यर्थ ही है। चलो देखो क्या हो रहा है, ऐसा विचार करते हुए स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर चल पड़े।  

धर्मराज ने वहां तालाब पर जाकर देखा कि चारों भाई मृतक की भांति पड़े हुए हैं। ऐसा लगता है कि यहाँ पर भी दुर्योधन पंहुच गया है। हो सकता है, कहीं दुर्योधन ने जल में जहर तो नहीं मिला दिया है? यदि जहरयुक्त जल पीते तो इनका रंग नीला पड़ जाता, ये तो अचेत पड़े हुए हैं। शरीर की स्थिति तो ज्यों की त्यों है, इनके शरीर पर घाव भी नहीं हुआ है अतः युद्ध की तो सम्भावना ही नहीं है।  

प्यास बहुत ज्यादा लगी है, पहले जल पीकर प्यास बुझाऊं फिर विचार करूंगा कि इन्हें क्या हुआ है? इनका इलाज क्या हो सकता है? युधिष्ठिर ने ज्यों ही जल पीने की कोशिश की त्यों ही पूर्ववत आकाशवाणी हे धर्मराज युधिष्ठिर ! पहले मेरी बात सुनो? फिर जल पीना ! मेरा यह स्वच्छ सरोवर है, इसका जल तुम्हें पीने का कोई अधिकार नहीं है।

तुम धर्म की महत्ता जानते हो, इसलिए मैं तुम्हें कह रहा हूं कि हुई. अनधिकार चेष्टा मत करो। यदि करोगे तो तुम्हारी वही गति हो जाएगी, जो तुम्हारे चारों भाईयों की हुई है। पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो फिर जल पीओ।    

धर्मराज बोले, हे बाणी के बोलने वाले! जो तुम कहोंगे, वही मैं करूंगा, जो तुम्हारी वस्तु केवल तुम्हारे लिए निश्चित है, उसमें मेरा कोई अधिकार नहीं है। तुम मेरे सामने तो आओ, मैं तुम्हारे से वार्ता करना चाहता हूँ, किन्तु बिना सन्मुख हुए वार्ता कैसे हो सकती है? तुम यह बतालाओ कि तुम मुझसे वार्ता पूछने वाले कौन हो? क्या कोई देवता,राक्षस, गन्धर्व, यक्ष, मानव आदि में से कोई भी हो, जो भी हो, मेरे सामने तो आओ।  

उसने कहा मैं यही इन्हीं वृक्षों पर रहने वाला यक्ष हूं, तुम्हारे भाईयों की दुर्गति भी मेरी वजह से ही हुई है, उन्होंने मेरी बात की अवहेलना की थी। दूसरे के अधिकार की वस्तु पर जबरदस्ती की है। यक्ष ने प्रकट होकर इस प्रकार से युधिष्ठिर से प्रश्न पूछे। यक्ष ने पूछा- सूर्य को उदित्त कौन करता है?    

उसके चारों और कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है? युधिष्ठिर बोले- ब्रह्म सूर्य को उदित करता है। देवता उसके चारों ओर चलते हैं। धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है। इत्यादि अनेकों प्रश्न यक्ष ने पूछे और इनका समुचित उत्तर युधिष्ठिर ने दिया।  

युधिष्ठिर के उत्तर ज्ञानवर्द्धक थे उनको सुनकर यक्ष बहुत ही प्रसन्न हुआ और कहने लगा- हे | युधिष्ठिर! तुम्हारे चारों भाईयों में से किसी एक को तुम जिंदा कर लो, यह वरदान मैं तुझे देता हूँ। युधिष्ठिर बोले- हे यक्ष! यह जो श्याम वर्ण, अरुण नयन, सुविशाल शाल वृक्ष के समान ऊंचा और चौड़ी छाती वाला महा बाहु नकुल है, यही जीवित हो जाय।  

यक्ष ने कहा- राजन् ! जिसमें दस हजार हाथियों के समान बल है, उस भीम को छोड़कर तुम नकुल को क्यों जिलाना चाहते हो? तथा जिसके बाहुबल का पाण्डवों को पूरा भरोसा है उस अर्जुन को छोड़कर नकुल जिन्दा करने की इच्छा क्यों है?   युधिष्ठिर ने कहा- यदि धर्म का नाश किया जाय तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ता को नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय तो वही कर्त्ता की भी रक्षा कर लेता है, इसी से मैं धर्म का त्याग नही करता।मेरा विचार है कि वस्तुत सबके प्रति समान भाव रखना परम धर्म है।लोग मेरे विषय में ऐसा ही समझते है कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा है।  

धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग

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