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धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 5

 धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 5
धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 5
धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 5

पाण्डवों ने युद्ध पंचायती राज किया। वह राज उन्हें सुख नहीं दे सका। खून की नदियां बहाकर उनमें स्नान करने जैसा राज्य पाण्डवों को अच्छा नहीं लगा अपने प्रपौत्र अभिमन्यु के बेटे परीक्षित को राज देकर पांच पाण्डव एवं द्रौपदी हिमालय की ओर चले, इनका अंतिम यहाँ मुकाम हो गया।

एक दिन युधिष्ठिर ने द्रौपदी सहित अपने भाईयों को बुलाकर कहा- अब अन्तिम काल आ गया है, अब हमें यहां से प्रस्थान करना चाहिये। किसी भी राजा को अपने राज सिंहासन पर बैठे-बैठे नहीं मरना चाहिए। भाईयों! काल की गति बड़ी विचित्र है। हमारे कुल परिवार में ऐसा कोई राजा नहीं हुआ जो घर में खटिया पर पड़ा हुआ मरा हो। कौड़ निनाणवे राजा भोगी, गुरु के आखर कारण जोगी माया राणी राज तजीलो, गुरु भेटीलो जोग सझीलो, पिण्डा देख न झुरणा। अब हमें भी वन की तरफ प्रस्थान कर देना चाहिए।

युधिष्ठिर की बात का सभी ने समर्थन किया और कहा ऐसा ही होगा। पांचो पाण्डव सहित द्रौपदी ने पूर्व वनवास की भांति पुन: वल्कल वस्त्र धारण किया और नगरी से विदाई ले ली। नगर के लोगों ने अश्रुपूरित नेत्रों से विदाई दी और वापिस नगरी में लौट आये। नगरी से बाहर निकलकर पांचो पाण्डव प्रथम तो दक्षिण दिशा में चले। समुद्र किनारे तक की यात्रा की।

वहाँ अग्निदेव ने अर्जुन से कहा- हे अर्जुन! मैं वही अग्नि हूं, सप्त जिह्वा वाली, जो मैनें खाण्डव वन को जलाया था। अब जो तुम्हारे पास जो यह गाण्डीव धनुष है, इसे तुम पास मत रखो। मुझे वापिस लौटा दो, मैनें ही तुम्हें प्रदान किया था। अर्जुन तथा अन्य सभी भाईयों ने अपने अपने शस्त्र जल में समर्पित कर दिये। वरुण देवता का गाण्डीव धनुष वापिस सौंप दिया।

पाण्डव लोग अन्तिम तीर्थ यात्रा करते हुए दक्षिण से पश्चिम की ओर बढ़े तथा वहाँ से हिमालय में प्रवेश किया। पाण्डव लोग मार्ग में आगे बढ़ते ही जा रहे थे पांच पाण्डव, सती द्रौपदी तथा पीछे एक कुत्ता भी आ रहा था। यह न जाने कहाँ से पीछे लग गया? किन्तु यह तो हस्तिनापुर से पीछे-पीछे चला आ रहा है। सभी नगरवासी पीछे रह गये किन्तु यह कुता पीछा नहीं छोड़ रहा था। यह तो प्रत्येक कार्य को बड़ी ही सावधानी से निरीक्षण करता है। यह देखकर पाण्डवों को आश्चर्य होता था किन्तु पाण्डव आगे बढ़ते ही जा रहे थे।

वेदव्यासजी ने पाण्डवों को बतलाया था कि आप लोग हिमालय में जाओ तो वहां केदारनाथ में भगवान शिव तथा बद्रीनाथ में भगवान विष्णु के दर्शन अन्त समय में होना आवश्यक है। आप लोगों ने युद्ध भूमि में अनेक लोगों का वध किया है। वहां दिव्यदेवों के दर्शन से आपको शान्ति मिल सकेगो पूज्य वेदव्यासजी की आज्ञा को शिरोधार्य करके पाण्डव लोग प्रथम हरिद्वार से हिमालय में प्रवेश किया।

ऋषिकेश होते हुए पाण्डव लोग हिमालय की दिव्य छटा निहारते हुए गुप्त काशी पंहुचे। वहां की ऐसी प्रसिद्धि है कि शिवजी वहां गुप्त हो गये, इसलिए उस स्थान का नाम गुप्त काशी पड़ा। पाण्डव लोग धुन के पक्के थे, उन्हें शिव का दर्शन करना है तो करना ही है, ऐसा विचार करके आगे बड़े।

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 उच्च हिमालय शिखर वर्तमान में केदारनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। वहां पर पाण्डव लोग पुचे किन्तु वहां पर भी शिव दर्शन दुर्लभ हो गये पाण्डवों ने निराश होकर भी लक्ष्य का परित्याग नहीं किया।

युधिष्ठिर ने भाई भीम से कहा- भीम! तुम ऐसा करो कि इधर हिमालय में भैंसे हरी-हरी घास चर रही है इनके साथ एक भैंसा घास चर रहा है तुम इन भैसों को इधर से उधर निकालो, मुझे लगता है कि यहीं कही इन भैसों में शिवजी भैंसा बन करके विचरण कर रहे हो ? हम पापीजनों को दर्शन देना नहीं चाहते किना हम लोग दर्शन किये बिना आगे नहीं बढ़ सकते?

नकुल सहदेव से कहा भाई भीम तो पर्वत के दोनों तरफ पैर रखकर खड़े हो जायेंगे और तुम लोग इन भैसों को भीम के पैरों के नीचे से निकालो? इनमें जो शिव होगा वह भीम के पैरों के नीचे से नहीं निकलेगा। यही हमारी परीक्षा तथा पहचान होगी युधिष्ठिर की युक्ति काम आयी, जैसा धर्मराज ने कहा

था वैसा ही किया, जो शिव भैंसे के रूप में था वह पीछे रूक गया, आगे नहीं बढ़ा। दूसरी भैंसे तो भीम के पैरों के नीचे से निकल गयी। वहीं पर पाण्डवों ने पैर पकड़ लिये वह शिव भैंसे के रूप में नीचे धरती में अपना शिर गड़ा दिया। पीछे का भाग वहीं पर रह गया। इसी का दर्शन इस समय केदारनाथ में हो रहा है। पीछे पूंछ के भाग को केदार बोलते हैं। यही केदार दर्शन मन्दिर में इस समय विद्यमान है।

भैंसे की थुम्भी तुंगनाथ में विद्यमान है। थुम्भी को ही तुंग बोलते हैं। यह तुंगनाथ बद्री केदार के बीच में बहुत ही ऊंची पहाड़ की चोटी है। जहां पर तुंग दर्शनीय है। आगे का मुँह का भाग नेपाल के काठमाण्डू में दर्शनीय है। इस प्रकार से तीनों जगहों पर पाण्डवों ने दर्शन किया और आगे बढ़े।

अन्तिम यात्रा में भगवान विष्णु के दर्शन करना चाहिये। यहाँ से थोड़ी दूर ही भगवान नर-नारायण बद्री के नीचे विराजमान है। यह पवित्र स्थान भगवान का धाम है। इस धाम के दर्शन की इच्छा से पाण्डव लोग पंहुचे। जहाँ पर भगवान स्वयं ही नर नारायण के रूप में विराजमान हुए। ऐसे दिव्य स्थान का दर्शन कर सभी प्रकार की अभिलाषा पूरी करेगा। अन्त समय में यह दर्शन मुक्ति प्रदान करेगा। बद्रीनाथ के दर्शन करके पाण्डव लोग आगे बढ़े।

अलकनन्दा नदी के किनारे-किनारे जा रहे थे आगे चारों तरफ बर्फ तथा पहाड़ आ गये कहीं भी रास्ता दिखाई नहीं दिया, वहाँ से पश्चिम की तरफ चले किन्तु आगे सरस्वती नदी का उद्गम स्थान आ गया। नदी को पार कैसे किया जावे? बहुत ऊंचे पर्वतों के बीच में से बहुत ही गहराई में नदी बहती है। आगे जाने का कोई मार्ग न पाकर भीम ने एक बड़ी भारी शिला उस नदी पर रखकर पुल बनाया और उस पुल से पांचो पाण्डव पार हो गये। अब भी वह पुल विद्यमान है जिसे भीम पुल कहते हैं इस समय यह पुल बद्रीनाथ से थोड़ी दूरी पर विद्यमान है।

अलकनन्दा के किनारे-किनारे पाण्डव आगे बढ़े। वहाँ से आगे वसुन्धरा को देखा, जो बहुत ऊंचाई से गिरने वाली जल की धारा है। वहीं से अपने को जल कण बिन्दुओं से पवित्र करते हुए आगे हो बढ़े। पाण्डवों ने आगे स्वर्गारोहण किया। अलकापुरी से अलकनन्दा का उद्गम है। ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये, त्यों-त्यों केवल बर्फ हो बर्फ रह गयी, उस बर्फ पर चलना साधारण मानव के पाण्डवों का शरीर ठण्डा होकर शून्य होने लगा तथा एक-एक करके गिरने लगे शंरीरों को त्यागने लगे। की बात नहीं है।

सर्वप्रथम द्रौपदी ठण्ड से शून्य होकर गिर पड़ी। पाण्डव थोड़ी देर के लिए रूक गये। भीम ने पूछा धर्मराज! यह कैसे हुआ? द्रौपदी ने अपना साथ छोड़ दिया।हम तो सशरीर स्वर्ग में जा रहे थे किन्तु द्रौपदी यह द्रौपदी घर की लक्ष्मी के साथ ऐसा क्यों हुआ? हमारा साथ क्यों नहीं निभाया? 

 युधिष्ठिर बोले – हे भीम। हम लोग आगे बढ़ें। द्रौपदी की चिंता मत करो, यह सशरीर तो स्वर्ग में नही जा सकी किन्तु इसकी जीवात्मा हम से पूर्व ही पंहुच चुकी है। भईया! इसको तो सभी के प्रति समभाव रखना चाहिये था किन्तु यह अर्जुन के प्रति ज्यादा ही मोहग्रस्त थी। अर्जुन को महत्त्व ज्यादा देती थी। बस इस एक दोष के कारण हमारा साथ नहीं निभा सकी। हम लोग आगे बढ़ें।

 ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर आगे बढ़ गये। कुछ आगे बढ़े ही थे कि बर्फ में ठण्डा होकर सहदेव गिर पड़ा। सहदेव को गिरा हुआ देखकर भीम ने फिर पूछा: भईया थोड़ा रूककर यह तो बतलाओ कि यह सहदेव सदा ही हमारी सेवा में रहता था, कभी भी इसने अपनों से बड़ों की बात को अस्वीकार नहीं किया। आज सहदेव की यह गति कैसे हो गयी?

युधिष्ठिर ने कहा भाई भीम आगे बढ़ो। इसकी चिंता तुम मत करो। तुम्हारे इस भाई की दुर्गति नहीं होगी, यह इस पांच तत्व के शरीर को छोड़ चुका है। इसका जीव स्वर्ग में पंहुच चुका है। इसे तो सशरीर स्वर्ग में जाना था परंतु इसे यह अहंकार था कि मेरे बराबर और कोई विद्वान नहीं है। इसी गर्व की वजह से ही इसकी यह हालत हुई है। अपने आगे बढ़ो।

 ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर आगे बढ़ गये। कुछ दूरी तक आगे चलने पर नकुल भी गिर पड़ा। भीम ने पूछा भईया! यह नकुल भी अपनी आज्ञा पर चलता था। संसार में सुन्दरता में तो इसकी बराबरी करने वाला कोई नहीं था। सदा धर्म का पालन करने वाला यह अपना प्रिय भाई नकुल क्यों गिर पड़ा? इसने अपना साथ छोड़ दिया? जरा रूकिये? मुझे यह बताते जाईये।

 युधिष्ठिर ने कहा- भाई भीम! यद्यपि सर्वगुण सम्पन्न यह तुम्हारा भाई नकुल था किन्तु इसमें भी एक ही दोष है कि वह अपने को सभी से सुन्दर समझता था। इसी एक अहंकार की वजह से यह सशरीर स्वर्ग में नहीं जा सका किन्तु जीवात्मा द्वारा तो अपने से पूर्व ही पंहुच चुका है। आप लोग आगे बढ़ें। जिन्होनें शरीर त्याग दिया है उसकी चिंता न करें।

आगे-आगे युधिष्ठिर चल रहे हैं- पीछे-पीछे भीम तथा भीम के पीछे गाण्डिव धनुष धारी अर्जुन तथा सभी से पीछे एक कुत्ता चल रहा है। भीम ने पुनः रोका और कहा भाई युधिष्ठिर ! यह अपना प्रिय भाई अर्जुन जो विश्वप्रसिद्ध धनुषधारी था, यह तो बड़ा ही सरल, सौम्य, शुद्ध पवित्रात्मा था, यह तो भगवान कृष्ण का प्रिय सखा था, जिसके बल पर ही तो हमने सम्पूर्ण पृथ्वी जीत ली थी। वह भाई अर्जुन तो गिर पड़ा है। अपना साथ छोड़ दिया है। आप कृपा करके इसके बारे में भी बतला दीजिये? ऐसा क्यों हुआ? इसे तो सशरीर स्वर्ग में जाना चाहिये था?

युधिष्ठिर बोले- भईया सुनो! यह भाई अर्जुन तो अप्रतिम वीर था किन्तु फिर भी दुनिया में बड़ा बड़ी है, अर्जुन के पास जो पुरुष था वह उसका स्वयं का नहीं था, वह तो भगवान कृष्ण का ही दिया हुआ था। किन्तु अर्जुन अज्ञानतावश अपना ही मानता था। पराई वस्तु लेकर उसे अपना मान लेना, उस पर व्यर्थ का अहंकार करना यही दोष अर्जुन में था।

इसी कारण से सशरीर अर्जुन स्वर्ग में नहीं जा सका। यह तो अशरीरी होकर शीघ्र ही पंहुच जायेगा। अपने को अर्जुन के बारे में या अन्य किसी के बारे में चिंता नहीं करनी चाहिये। सभी अपने-अपने कर्मों का ही फल प्राप्त करते हैं इस अन्तिम निर्णय में किसी का कोई वश नहीं चलता है।

भीम जैसा बलवान भी बर्फ के आगे शिथिल होने लगा पैर लड़खड़ाने लगे, बेहोशी को प्राप्त होकर स्वयं भीम भी थोड़ी दूरी पर गिर पड़ा। भीम ने पीछे से आवाज लगायी- भईया! धर्मराज! मेरी भी एक बात सुनते जाओ? मैं भी अपने प्राणों को त्यागने को तैयार हूँ। मेरे में भी कोई दोष हो तो बताते जाईये। मैं क्यों आपका साथ छोड़ रहा हूँ।

युधिष्ठिर ने कहा भाई भीम! तुम्हारे में भी एक ही दोष था कि तुम अपने को बहुत बड़ा बलवान मानते हो जिस कारण से तुम यहीं रह गए, आगे नहीं बढ़ सके। गर्व ही मानव को ले डूबता है। यह अहंकार ही मनुष्य को आगे बढ़ने में बाधा खड़ी करता है। तुम इस दोष को जीवनभर नहीं समझ पाए,इसलिए तुम शरीर छोड़कर स्वर्ग चले जाओ।

धर्मराज युधिष्ठिर कथा भाग 6

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