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जाम्भोजी ने सांणीया (भूत) को रोटू गाव से भगाया भाग 2

जाम्भोजी ने सांणीया (भूत) को रोटू गाव से भगाया भाग 2

सांणीया (भूत) को रोटू गाव से भगाया
सांणीया (भूत) को रोटू गाव से भगाया

        सांणीया (भूत) को रोटू गाव से भगाया                   

   शब्द-91

ओ३म् छंदे मंदे बालक बुध्दै, कूड़े कपटे ऋद्ध न सिद्धे।

 मेरे गुरु जो दीन्ही शिक्षा, सर्व आलिंगण फेरी दीक्षा।

 जाण अजाण बहीया जब जब, सर्व अलिंगण मेटे तब तब। ममता हस्ती बंध्या काल, काल पर काले पसरत डाल।

ध्यान न डोले मन न टलै, अहनिश ब्रह्म ज्ञान उच्चरे।

काया पत नगरी मन पत राजा, पंच आतमा परिवारुं।

 है कोई आछै मही मंडल शूरा, मन राय सूं झूझ रचायले।

अथगा थगाय ले अबसा बसायले, अनबे माघ पाल ले।

 सत सत भाषा गुरुरायों, जरामरण भो भागू।

 नाथोजी ने वील्हों जी के प्रति इस प्रकार से बतलाते हुऐ कहा- हे वील्हा! जब मैं श्री देवजी के श्री माख की ज्योति चारों तरफ देखता था, उस समय मैं अकेला ही नहीं था पास में अनेक संत भक्त लोग बैठे हुए थे सतगुरु देव ने हंकारा किया- लंबी श्वास ली किन्तु कुछ भी बोले नहीं। उस समय वहां उपस्थित संत शिरोमणि रणधीर जी ने श्री देवजी से पूछा

आज आप किस पर प्रसन्न हुए है आपकी अलौकिक क्रियाएं देख कर कुछ न कुछ आश्चर्य जनक घटना का आभास होता है। श्री देवजी ने कहा- मैं देख रहा हूं कि सांणियां के अंदर बैठा हुआ प्रेत सांणियां पेदड़े को तो छोड़ गया किन्तु वह ननेऊ गांव के कूवें पर पहुंच गया है वहां जाकर उसने खेजड़ी के डाल को तोड़ा है वहां से दो आदमी उंट पर सवार होकर यहां सम्भराथल पर ही आ रहे है तथा अति शीघ्र ही पहुंचने वाले है, उनकी यह समस्या है कि खेजड़ी की डाल स्वतः ही कैसे टूट गयी।

 ननेऊ से वह प्रेत फलोदी के एक राजपूत में प्रवेश करके पहुंच गया है। यह रजपूत भी सांणिये की भांति ही भूत प्रेत सेवी है। अनेको कलाबाजी दिखाता है। वह रजपूत तथा उसकी धर्मपत्नी दोनों फ लौदी के राव हमीर के दरबार में पहुंच चुके है। रणधीरजी ने पूछा- हे देव । आप हमें इस बात को विस्तार से बतलाये कि वहां फलौदी के राज दरबार में पहुंच कर उसने क्या किया? यदि कथन करने योग्य वार्ता है तो अवश्य ही कहिये?

जाम्भोजी ने आगे की कथा विस्तार से कहते हुए कहा- कोट फलौदी में राव हमीर के दरबार में एक राजपूत अपनी स्त्री के साथ उंट पर सवार होकर पहुंचे, जब राव हमीर का दरबार लगा हुआ था तभी उस राजपूत ने प्रवेश करके सभी को नमन किया और कहने लगा- यदि आप लोग देखना चाहो तो मैं आपको दिव्य खेल दिखाने आया हूँ।

आप लोग देखे कि मैं सूर्य की किरणों द्वारा सूर्य भगवान तक पहुंचे जाउंगा। आप लोग तथा रावल हमीर आदि सभी सत्यवादी है, मेरी अमानत को संभाल कर के रखो तथा एक तो मेरी धर्मपत्नी है और मेरा उंट भी है, मैं वापिस आकर ले लूंगा। राव हमीर ने स्वीकृति प्रदान कर दी, अवश्य ही खेल दिखाये, हम सभी दिखेंगे।

राव हमीर ने उसकी स्त्री को राजमहल में रानियों के पास भेज दी, ओर उसका ऊंट सेवकों को सौंप दिया। उस क्षत्रिय ने अपनी जेब से कच्चे धागे की कूकड़ी निकाली और सभी के देखते ही देखते आकाश में फेंक दी और वह उस गाड़ी के सहारे सहारे सभी के देखते ही देखते आकाश में चला गया। 

कुछ दूर तक तो लोगों ने जाते हुए देखा किन्तु वह तो इतना ऊंचा चला गया लोगों की आंखो से ओझल हो गया।

 क्षत्रिय सूर्य लोक में गया है, वापिस आ जायेगा। सभा वहीं पर बैठो प्रतीक्षा कर रही थी कि आकाश से उसके शरीर के कटे हुए अंग गिरने लगे। सर्व प्रथम एक हाथ जो आभूपणों से युक्त था धरता पर आकर गिर पड़ा। देखते ही देखते दूसरा हाथ एवं दोनों पांव तथा धड भी आकर सभी के सामने गिर 

पड़ी। सभी ने देखा कि यह शरीर उस क्षत्रिय का है जो सूर्य लोक में गया था, कहीं युद्ध हुआ होगा और वह तो मारा जा चुका है।

 उस क्षत्रिय की धर्मपत्नी से कहा कि तुम्हारा पति तो वीर गति को प्राप्त हो गया है। ऐसी बात सनकर उस सती ने शरीर के अंग एकत्रित कर के पति के वियोग में विलाप करने लगी। राव हमीर ने समझाया किन्तु वह तो अपने पति के साथ ही सती होने के लिए तैयार हो गयी तथा बिना कुछ विलंब किये अपने पति के साथ ही सती भी हो गयी। सभी लोग जिंदा एवं मुरदे को साथ ही जला कर के वापिस लौट आये। तीसरे दिन का तैइया भी कर डाला, बात समास हो गयी।

दस दिन के पश्चात एक दिन राव हमीर राजदरबार में बैठे थे कि उस क्षत्रिय ने आकर मुजरा प्रणाम किया और कहने लगा-

 मैं वापिस आ गया हूं, मेरी स्त्री और ऊंट दे दो, मुझे कहीं अन्यत्र जाना है। हमोर तथा अन्य सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये, कहने लगे- हमने तो तुम्हारे कटे हुऐ शरीर को अग्नि में समर्पित कर दिया है, तुम्हारे शरीर के साथ ही तुम्हारी स्त्री भी जल चुकी है दस दिन व्यतीत हो गये है, जले हुए भी क्या वापिस लौटाए जा सकते है? क्षत्रिय कहने लगा

 मेरी अमानत आप देना नहीं चाहते हैं, पराई स्त्री को जबरदस्ती से छीन रहे है, मैंने तो सोचा था कि राजा प्रजा की रक्षा करता है किन्तु यह राजा तो चोर है राजा कब का भला होता है, सदा ही चोर लुटेरे होते है। या तो तुम मेरी स्त्री को वापिस दे दो जो तुमने महलों में छुपा कर रखी है अन्यथा मैं स्वयं बुला लेता हूं तुम्हारी बेइज्जती होगी।

 हमीर ने कहा- मैं कहां से देदूं, महलों में नहीं है, उसकी तो एक मुट्ठी भर राख हो गयी है। अच्छी बात है यदि तुम नहीं देना चाहते तो मैं ही बुला लेता हूं ऐसा कहते हुए आवाज लगायो, वह स्त्री अपने पति की आवाज सुन कर महलों से दौड़ती हुई चली आयी। राव हमीर ने यह आश्चर्य देखा और अन्य सहयोगियों ने भी देखा, राव हमीर के कुछ भी समझ में नहीं आया यह क्या हुआ, कैसे हुआ किंकर्तव्यविमूढ हमीर ने दो आदमियों को समराथल पर भेजा और आदेश दिया कि जाम्भोजी से पूछा कर आओ और हमें बतलाओं कि यह राज क्या था।

हे वील्हा! हम लोग देवजी के समीप थे, उसी समय हमीर के भेजे हुए दो ऊंट सवार तथा ननेऊ से भेजे हुए भी दोनों साथ ही सम्भराथल पहुंचे। वहां पर उपस्थित सभी के सामने ही देवजी ने यह शब्द सुनाया-

                                   रणधीर जी ने पूछा- हे महाराज | यह क्या आश्चर्य था? क्या हकीकत थी? जाम्भोजी ने बतलाया | कि यह तो भूत चेड़ों की ही करामात थी। न तो कोई आकाश मार्ग में गया और नहीं कोई मरा, नहीं जला।यह तो केवल देखने मात्र की बात थी, चेड़ों की ही करामात थी।

 हे रणधीर ! भूत प्रेतों की सेवा करना मंद कार्य है। भूत प्रेतों का सेवक मरने पर भूत प्रेत ही बनता | है। जिस की जो पूजा करेगा, वह वही होगा। बाहर कुछ अन्य भीतर कुछ ओर दिखावा मात्र करना छंद | है, जो अभी बालक बुद्धि के लोग है वे ही इन दिावे के कार्य में भाग लेते है और भ्रमित होते है। यहां | केवल झूठ कपट है न तो कोई सिद्धि है और न ही कोई रिद्धि है। हमारे जैसे गुरु वों ने शिक्षा देकर दीक्षित |

किया है। सभी जगह धर्म मर्यादा का प्रचार किया है। उसी तरफ इन जंजालो को छोड़ कर ध्यान दो, जब भा जीन कर या अनजान में कार्य किया है, धर्म कर्म किया है, तभी तभी उन्हें मनेत किया है, उनके पापों को अज्ञानता को मिटाया है।

मैं और मेरा यह माया है, ममता रूपी हस्ती काल के अधीन है, ज्यों ज्यों समय आगे बढ़ता जाता है त्यों त्यों अधिकता से बंधन का प्रसार होता है, किन्तु होना तो यही चाहिये था कि किसी भी प्रकार से ध्यान नडोले मन चंचल न होवे, रात दिवस ब्रह्म में ही लीन रह कर ब्रह्मज्ञान का उच्चारण करे।

 काया रूपी यह नगरी है, मन ही इस काया का राजा है, अन्य पांच ज्ञानेन्द्रिय पांच कर्मेन्द्रिय आदि इन्हीं सम्पूर्ण परिवार का आत्मा ही स्वामी । इस महो मंडल में ऐसा कोई शूर वीर होगा जो इस चंचल मन से झूझ युद्ध करले, यह कभी थकने वाला नहीं है इसे धकाय ले। यह कभी वशीभूत होने वाला नहीं है इसे वशीभूत एकाग्र करले, यह सदा ही मन मुखी चलने वाला है, इसे सच्चे पथ का पथिक बना ले। जाम्भेश्वरजी कहते है कि मैं यह सत्य कहता हूं कि गुरु के वचनों को स्वीकार करले, तो सदा सदा के लिये जन्म मरण का भय निवृत हो जायेगा।

जम्भोजी ने सांणीया (भूत) को रोटू गाव से भगाया भाग 1

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