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जाम्भोजी का भ्रमण भाग 1

जाम्भोजी का भ्रमण भाग 1
जाम्भोजी का भ्रमण भाग 1

                  जाम्भोजी का भ्रमण भाग 1

पश्चिम देशों का भ्रमण करके श्री देवजी समराथल पर विराजमान हुऐ। कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात एक दिन एकत्रित जन समूह ने प्रार्थना करते हुए कहा- हे देवजी! आपके शिष्य हमारे गुरु भाई कहां कहां निवास करते है? आप तो अन्तर्दृष्टि से सभी कुछ जानते है किन्तु हम अल्पज्ञ जीव इन आंखो से दर्शन करना चाहते है। आप एक बार जीवों पर कृपा करने हेतु प्रस्थान कीजिए जिससे हमारा भी आपके साथ कल्याण हो सके।

 श्री जांभेश्वर जी भक्तों की इच्छा पूर्ण करने हेतु पूर्व देश गंगा पार जाने का निश्चय किया। सभी भक्त संतो को भी साथ ले चलने का विचार किया। सभी साथ चलने वालों को अपनी अपनी सवारी साथ लेकर चलने की आज्ञा प्रदान की। समय पर अपने साथ चार हजार सेवकों को साथ में लेकर सम्भराथल से प्रस्थान किया।

नाथोजी कहते है कि हे वील्ह! सर्व प्रथम सांवतसर गांव में जमात सहित निवास किया था। जहां पर श्री देवजी ने साथरियों के साथ निवास किया है वहां पर साथरी बनी है। इस प्रकार से सांवतसर में साथरी की स्थापना करके वहां के निवासियों को कृतार्थ किया जाम्भोजी अकेले नहीं थे साथ में हजारों की संख्या में संत भक्त थे।

सांवतसर के धारणियां विश्नोईयों ने श्री देवजी के साथ आये हुऐ सुभ्यागतों का आदर सत्कार |किया और भोजनादि बड़े प्रेम से जिमाया तथा पुण्य के भागी बनें। सभी अपनी अपनी श्रद्धानुसार घृत अग, मिष्ठान्न नारियल आदि श्री चरणों में भेंट चढ़ाया । श्री देवजी हमारे गांव में पधारे है, हमारा अहोभाग्य है। इसी खुशी में रात्रि में जागरण हुआ साखी शब्द आदि गाये।

प्रात: काल स्वयं श्री देवजी ने हवन किया और लोगों को नियम मर्यादा से अवगत करवाया। हवन प्रसाद का सुख प्राप्त कर के ग्रामीण लोग कृतार्थ हुए। सभी साथरियों गुरु भाईयों को भोजन करवा कर के अश्रुपूर्ण नेत्रों से विदाई दी। श्री देवजी के साथ आये हुए संत भक्तों ने गांव के लोगों की अपने गुरु भाईयों कीभूरी भूरो प्रशंसा की और आगे का मार्ग लिया।

 दूसरी मंजिल में रोटू गांव में श्री देवजी अपने साध्वियों सहित पहुंचे। वहां पर भी पूर्व परिचित ग्राम वासियों ने आगत स्वागत किया। साथरी पर ही श्री देवजी के साथ ही आसन लगाया। पूर्व में नौरंगी को भात श्री देवजी ने भरा था रोटू में श्री देव ने कुछ समय पहले ही तो खेजड़ियों का बाग लगाया गांव के लोगों को निहाल कर दिया था।

 श्री जम्भदेवजी आज रोटू में आ गए है। अबकी बार न जाने किसको निहाल करेंगे ऐसी वार्ता श्रवण कर के आस पास के गांवों के लोग अपना दुख दर्द मिटाने के लिए एकत्रित होने लगे थे। हे वौल्ह।| केवल रोटू गांव की ही बात नहीं थी वहां तो रामसर, गुगरियाली, अबाद, दुगोली, भ्रनाऊ, खारी आदि 

सभी गांवों के लोग अपनी अपनी भेंट लेकर मिलने के लिए आऐ थे। रोटू पर तो देवजी का स्नेह सदा ही रहा था। इसीलिए वहां पर पांच दिनों तक ठहरे थे। जो जिसने सत वरदान मांगा उसकी इच्छा पूर्ण को थी। विशेष रूप से रोटू गांव के लोगों को आदेश देते हुए कहा- तुम्हारे यहां तो त्रेता युग की तुलसी ये खेजड़िया है। आप लोग इनकी रक्षा करना ये तुम्हारी रक्षा करेगी।

यह बाग हरा-भरा रहेगा तो तुम्हारे यहां वर्षा की कमी नहीं होगी ये खेजड़िया कहा से भी वर्षा को खींच कर ले आयेगी और तुम्हारे यहा पर तो वर्षा अवश्य ही करवायेगी। ये तुम्हे शीत गर्मी से भी बचाएगी। तुम्हें जीवन का प्राण आधार यहीं से ही मिलेगा।

 इन वृक्षों के नीचे उपर निवास करने वाले पशु पक्षी भी तुम्हारे जीवन के आधार है। यदि तुम इन हरे वृक्ष, पशु, पक्षी जीव जन्तुओं की रक्षा करोगे तो तुम्हारी रक्षा स्वतः ही हो जायेगी। एक के विना दूसरे का जीवन असंभव है। इस प्रकार से रोटू गांव तथा आस पास के लोगों को उपदेश देकर श्री देवजी वहां से अपने साथियों सहित प्रस्थान किया।

आगे गंगा पार का देश अपने साथरी भक्तों को दिखाने के लिए रवाना हुए। शाम को भनाऊ में निवास किया। दूसरे दिन दूणपुर आये। वहां दूणपुर में दो राठीड़ जाम्भोजी से परिचित हो चुका था, लोगों ने कहा-वीदे राठौड़ का विवाद मिटाने वाले श्री देव आज अपनी नगरी में आ गये है हमारा सौभाग्य होगा कि हम भी दर्शन-स्पर्श करके उनको अपना अहंकार समर्पित कर दे,

यह मैं का व्यर्थ का भार उतार दे। मोतिये का पता लगा के आज हमारे प्राणेश्वर अपनी नगरी में आ गये है तो खुशी का ठिकाना ही न रहा। सभी को संतुष्ट करके जमात आगे चल पड़ी।

तीसरा पड़ाव श्री देवजी ने चुरू के निकट सातड़ा गांव तथा मोलासर के गांव की सीमा पर घने वन में किया था। उसी पवित्र भूमि को धाम बना कर आगे के लिए प्रस्थान किया था, जहां जहां पर भी श्री चरणों में भूमिस्पर्श होती थी वही पर ही धाम बन जाता था क्यों न हो, मरू भूमि का यह सौभाग्य हो था इस कठोर कंटक प्रदेश में प्रथम बार स्वयं विष्णु ही अवतार लेकर भ्रमण कर रहे थे।

इससे पूर्व प्रेता युग में राम रूप में विष्णु ने अयोध्या से चल कर लंका तक की भूमि को तीर्थस्थली बनाया था। द्वापर युग में भी श्री कृष्ण के रूप में विचरण करते हुए विशेष रूप से वृज भूमि को अति पवित्र तीर्थ रूप बना दिया था सामान्य रूप से वृन्दावन से द्वारिका तक की भूमि श्री कृष्ण के चरणों से पवित्र हुई थी। इस समय कलयुग में श्री देवजी ने बागड़ देश को अयोध्या, वृंदावन, काशी सदृश तीर्थ स्थल बना दिया।

 इस समय भी उनके चरणों से सुवासित हुई भूमि पवित्र हो रही है। यहां की भूमि का दर्शन करने से हो पापियों के पाप कट जाते है। जिस प्रकार गंगा में स्नान करने से पापियों के पाप कट जाते है। उसी प्रकार संत महापुरूषों के चरण भी गंगा की धारा सदृश पवित्र करने वाले है। यहां सातडा मौलीस में निवासियों ने उस भूमि को जाम्भोजी की वणी से नाम से विख्यात की है।

उस भूमि को ही देवालय माव् पूजा करते है और अपने जीवन को कृतार्थ करते है। हे वील्ह कभी तुम भी जाकर अवश्य ही दर्शन के तथा गुप्त रहस्य को लोगों के सामने उजागर करो।

नाथोजी आगे की वार्ता कहने लगे- हे वील्ह श्री देवजी के चरण तो एक क्षण भी कहाँ टिक जाते है तो वह पृथिवी धन्य हो जाती है। हमने तो वहां एक रात्रि विश्राम किया था। वहां से जाम्भोजी को आज्ञा पाकर अपने अपने रथ जोते और उतर दिशा की तरफ आगे बढे थे उस दिन का मार्ग काफी लंबा था अति शीघ्र से चलकर हम लोग झूपा गांव में पहुंचे थे। यह गांव मरूभूमि का अंतिम गांव है।

 नित्य क्रिया होम जप तप से निवृत हो गए थे। हमने देखा कि आज तो श्री देवजी एक टक दृष्टि से उत्तर की तरफ देख रहे है। कुछ अवश्य हो विशेष बात होगी। हमने श्री देवजो की दृष्टि अपनी और खींचते हुए पूछा

सतगुरु देव! आज हमने आपको एक टक दृष्टि से उत्तर की तरफ निहारते हुए देखा है इधर तो है कोई कहीं गांव भी नही है। वन का ही साम्राज्य है क्या होगा इधर देखने के लिए? यदि कुछ होगा तो हमें भी बतलाने का कष्ट करें। श्री देवजी ने कहा- मैं इस भूमि को देख रहा हूँ, बहुत दूर तक निर्जन है किन्तु यह भूमि बसने योग्य है आप लोग अपने परिवार सहित यहाँ आकर वस जाओ।

यदि इस समय यहां बागड़ देश में धर्म का राज्य स्थापित हो चुका है। लोग धर्म, कर्म, यज्ञ करने लगे है इस लिये यहां पर समय पर वर्षा हो रही है। किन्तु कालांतर में सदा ही ऐसा होना कठिन होगा। मैं देखता हूँ, जन संख्या को अभिवृद्धि होगी तो अत्याचार बढेगे। यज्ञ कर्म समाप्त प्राय हो जायेंगे तो अत्याचार बढेंगे, यज्ञ कर्म समाप्त प्रायः हो जायेंगे तो अकाल पड़ने लगेंगे।

ऐसी अवस्था में आपको कुल परंपरा के विश्नोई लोग यहां इस भूमि पर बसेंगे। इस समय में यहां से लेकर बंगला तक विश्नोईयों का निवास इस भूमि पर देख रहा हूँ।

 झूपे से प्रस्थान कर के बीच-बीच में निवास करते हुए श्री जम्भदेवजी जमात सहित दिल्ली आये। जाम्भोजी के शिष्य हास्य-किस्मत ने दिल्ली में यमुना के किनारे अपना आत्रम बनाया उसी आश्रम में यमुना के किनारे जमात ने श्री देवजी के सहित आसन लगाया यमुना में स्नान किया। सांयकाल में जागरण किया और प्रातः काल हवन सभी साथरियों ने मिल कर किया।

पहले भी कई बार विश्नोईयों को जमात ने यहां हवन किया था। शब्दों की ध्वनि सुन कर हास्म कास्म जाम्भोजी के शिष्य बने थे।

हास्म कास्म सदा ही प्रतीक्षा में थे कि न जाने कब वो स्वयं ईश्वर हरि आयेंगे। जिन्होंने हमें इस पथ का पथिक बनाया था किन्तु आज तो सामने प्रत्यक्ष देखा था हृदय की उमंग प्रेमाश्रुओं द्वारा बाहर निकल पड़ी। कहने लगे- हम क्या सत्य ही देख रहे है? या स्वप्न ले रहे है। अब हमने जीवन को सफल कर लिया। उनकी कृपा सिन्धु की एक दृष्टि उपर पड़ जाये तो महान पापी जन भी तर जाते हैं ऐसे कहते हुए श्री देवजी के चरणों में दण्डवत प्रणाम किया।

 देवजी ने उनके सिर पर अपना हस्तकमल रखा और कहा- हे भक्तों खड़े हो जाओ, तुम्हारे प्रेम की बाढ़ में तो सभी पाप धुल गए है अब पापो का लवलेश ही नहीं रहा। नाथोजी कहते है हे वील्हा! इस प्रकार से हमने हास्म कास्म का प्रेम देखा था, वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी। ऐसा प्रेम यदि सभी का ही परमात्मा हरि के प्रति हो जाये तो जन्मो जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

हास्म कास्म ने तो हमें भी जाम्भोजी के सदृश मान कर दण्डवत प्रणाम किया था- हमने कहा था कि आप ऐसा न करें, श्री देवजी के सामने हमें शर्मिंदा न करें। हास्म कास्म ने कहा- आप भी तो देवजी | के साथ ही रहते है उनकी संगति से सुगंधित हुए है, जिस प्रकार से चंदन के पेड़ के पास रहने वाला दूसरा वृक्ष भी सुगंधित हो जाता है। मैं आप लोगों में वही प्रभाव देख रहा हूँ।

श्री देवजी ने हास्म कास्म की शल मंगल पूछी- उन्होंने कहा- हे देवजी! आपकी कृपा जिन पर हो जाती है उसका मंगल सदैव बना रहता है। मेरी बहुत इच्छा थी कि मृत्यु से पूर्व आपके दर्शन स्पर्श वार्तालाप हो जाये तो कृतार्थ हो जाये।

 इस समय हम अति वृद्ध हो चुके है। आपके पास आ नहीं सकते थे किन्तु आप स्वयं ही दर्शन देने हेतु इस गरीब को झोंपड़ी पर आ गए। यह मैं समझ गया हूं कि आप प्रेम के भूखे है। केई बड़े राज महलों को छोड़ कर स्वतः ही चले आये है। श्री देवजी ने साह सिकंदर की बात पूछी तब हास्म कास्म कहने लगे

हे देव! आपका शिष्य सिकंदर तो अपना नियम जब तक जोवित रहा तब तक निभाता रहा किन्तु अब उनकी दोनों बेगमें भी इस संसार में नहीं रही अपने पति सिकंदर के साथ ही भिस्त चली गयी है। इस समय उनके घर में भक्ति भाव नहीं है। वह तो सिकंदर के साथ ही चला गया है। सिकंदर का बेटा इब्राहिम इस समय यहां का बादशाह बना हुआ है किन्तु वो साह सिकंदर वाली बात बेटे में नहीं है। यह तो हरि से विमुख है।

 जब हासम कासम की वार्ता चल रही थी उसी समय एक काजी ने भी सुना कि हास्म कास्म घर एक बड़ी भारी जमात आयी है। तो वह काजी भी चला आया और श्री देवजी से पूछने लगा- आप कहां रहते हो? आपका स्थान कौन सा है? कहां से आये हो? और कहां को जाना है?

काजी की बात सुनकर श्रीदेवजी मुस्कराते हुए कहने लगे हे काजी ! हम तो शून्य में रहते हैं और शून्य से ही आये हैं तथा शून्य में ही जायेंगे, मेरा वही शून्य परम स्थान है उसी शून्य से ही मैं आया हूँ और घट घट में जायेंगे, प्रत्येक श्वांस प्रश्वास के साथ ही मैं रहता हू।सभी के अन्दर एवं सभी के बाहर भी मैं रहता हूँ: जहां कुछ भी चेतन रूप से विद्यमान है वही मैं ही रहता हूँ। वह चेतनता भी मैं ही हूँ। मैं और सर्व जगत एक ही है, आप लोग मुझे ज्ञान नेत्रों से देखों तो मैं असली रूप में दिखाई दूंगा। ऐसी वार्ता श्रीमुख से श्रवण कर वह काजी शीघ्र ही राजदरबार में गया।

काजी के चले जाने के पश्चात हासम कासम ने प्रार्थना की। है गुरुदेव! आप आज अपनी मण्डली सहित मेरे मेहमान बने हैं मेरा अति सौभाग्य है, मेरे यहां आप मण्डली सहित भोजन करो तभी मेरी तृप्ति होगी। उसी समय ही श्रीदेवजी ने उनका निमंत्रण स्वीकार किया।

 भण्डारी को भेजा और कहा-जाओ भोजन तैयार करो। न्यात जमात भोजन करेगी भण्डारियों ने जाकर नये मकान को जल छिड़क कर शुद्ध किया। उसमें हवन करके प्रथम देवता को आहुति प्रदान की, वातावरण को सुगंधित किया। और उसमें बैठ कर पांच पकवान बनाये सभी न्यात जमात को प्रेम से भोजन करने हेतु बुलाया। पंक्ति लगा कर भोजन हेतु बैटाया, ईश्वरीय प्रार्थना ध्वनि बोल कर जल का आचमन करके भोजन किया।

 भोजन होने के पश्चात दोनों भाई श्री देवजी के पास हाथ जोड़ कर बैठे हुऐ क्षमा याचना करने लगे। इतने में ही एक संदेश वाहक आया और श्री देवजी से कहने लगा- सिकंदर बादशाह का बेटा आप से द्वेष रखता है तथा उसने अनेक कुकर्म किये है, अपने पिता के पश को मिट्टी में मिला दिया है। इस समय

हे पीर जी। वह आपको अपने महलों में बुलाने के लिए मुझे भेजा है।

 हे वोल्हा। श्री जाम्बेश्वरजी तो पट घट की जानने वाले है तो ये अकेले हो इग्राहिम से मिलने के लिए चल पड़े। श्री देवजी ने महल में प्रवेश किया और नौ दरवाजे पार करते गए न्योहि पछे ताले पड़़ते गये। नौ दरवाजे बंद कर ताले लगा कर द्वार पाल ने बाहर आकर देखा तो श्री देवजी उसे बाहर खड़े दिखाई दिए।

        जाम्भोजी का भ्रमण  भाग 2

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