शेयर करे :

Share on facebook
Facebook
Share on whatsapp
WhatsApp

चित्तौड़ की कथा भाग 2(JambhBhakti.com)

                       चित्तौड़ की कथा भाग 2

चित्तौड़ की कथा भाग 2
चित्तौड़ की कथा भाग 2

चित्तौड़ किला

विश्नोई कहने लगे – पार ब्रह्मा परमात्मा स्वंय सम्भराथल पर प्रगट रूप से विराजमान है जो सा चित में बस गया है। ऐसा प्रतीत होता है मानों जगत प्रकाशित करने के लिये सूर्योदय ही हो गया।

 सृजनहार स्वंय शिव रूप से समराथल पर प्रगट हुए हैं। स्वंय सृष्टि के कर्ता ने दिव्य शरीर किया है। जिसे हम अपनी आंखो से देख सकते है, वार्तालाप कर सकते है। परमात्मा धरती, आकाश सा |पाताल,आदि में सभी जीवों को संभाला है।

 तब रानी ने पूछा- वह पूर्ण पुरूष किस देश में प्रगट हुआ है। विश्नोइयों ने कहा उतम बागड देश धोरों की धरती समराथल पर प्रगट हुए हैं। उनसे भेंट मिलन सभी जातियों के लोगों की होती है। दर्शन करने हेतु जमात वहां पर एकत्रित होती है। अनेकानेक जिज्ञासा प्रगट करते हैं उनका दर्शन स्पर्श करके लोग अपना कार्य सिद्ध करते हैं। लोग उतम सीधा व्यापार कर रहे हैं। चाहे हिन्दू हो या मुसलमान सभी |

सेवा करते हैं। दया स्वरूप देव की पहचान हो है। चारो तरफ चाव उत्साह फैला हुआ है | राव रंक,पातशाह,अनेकानेक सच्चे मार्ग के अनुनायी बने है। विश्नोई कहने लगे -हम भी उसी जमाति के लोग है। श्री देव का दर्शन,स्पर्श,पाहल लेकर कृतार्थ हुए है विश्नोइयों ने जब विधि पूर्वक वार्ता का बखान किया और झाली ने प्रेम पूर्वक श्रवण किया । रानी ने अन्तर भाव से सतगुरु को पहचान लिया कि है तो साक्षात् सिरजनहार ही। प्रगट रूप से रानी ने कहा

हे भाई लोगो । देवजी तो दया रूप है। आप लोग प्राण मत त्यागो। मेरे अन्तर में आरती भाव जग गया है। मैं इस समय प्रार्थना कर रही हूं कि विपति स्वंय जाम्भोजी हो मिटावे। आप लोग भी भगवान से अर्ज करो कि इस विपति से किस प्रकार से छूटे।

रानी कहने लगी-देवजी का प्रताप पका है। यदि दिलायेगें तो हम आप से डाण नहीं लेंगे। किन्तु यह बात उनसे पूछने से हो प्रमाण होगी विश्नोई बन्धुओं ने रानी से अरदास की कि तब तक हमारे बैल बिना घास के भूखे कैसे रहेंगै गुरु से पूछ कर आने में तो कुछ दिन लगेंगे। हम लोग अपना दुख आपके सामने कह रहे हैं।

उनकी विनती सुन कर रानी के मन में प्रेम भाव जागा और बैलों को चरने के लिये घास वाला जंगल सींप दिया। और कहा – यहां पर तुम्हारे बैल घास चरेगे, सुखी रहेंगे। आप लोग सम्भराधल पर उनसे पूर्ण कर आओ। मेरे लिये श्री देवजी क्या आज्ञा देते हैं यही पता करके आना है। रानी कहने लगी -जोवों के मालिक की यदि इच्छा होगी तो हमारे राज्य में धन की कोई कमी नहीं रहेगी।

वो ही देने वाले है और दिलाने वाले भी वही है। उनका दिया हुआ हम कितना हो खर्च करेंगे तो भी कम नहीं पड़ेगा। रानी साधु संतो की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझती थी। इसी दया भाव से बकसीस प्रदान कर दी। शायद इसी आय से कि देवजी हमें इनसे डाण अवश्य ही दिलायेगें इसलिये घास वाला खेत दे दिया। विश्नोइयों ने रानी का विश्वास हासिल किया और बैल घास चरने लगे।

रानी कहने लगी आप जल्दी हो देवजी के पास जाओ । दो तो जाम्भाणी जायेंगे और दो व्यक्ति विश्वास पात्र राज दरबार से जायेगे। ये चारों जाकर जाम्भोजी से संदेशा लेकर अति शीघ्र आयेगें। न जाने कि दिन लगे होगे किन्तु शीघ्र हो देवजी के पास समराथल पर चारों लोग पहुंच गये।।

 रानी द्वारा दी हुई भेंट देवजी के सामने रखो और अरदास करते हुए कहा – हे देव । चितौड़ के र सांगा ने हमसे डण मांगा है। झाली रानी ने हमको यहां पर भेजा है, हमें क्या करना चाहिये। इसन हो प्रमाण है देवजी ने उन लोगों को बैठाया और सात्वनां दी मैं अवश्य ही कुछ बतलाऊगा तब तक आप बैठे।

गंगा पार से विश्नोइयो की एक जमात सतगुरु के चरणों का दर्शन स्पर्श करने हेतु चली। विश्नोई आनन्द में अभिभूत होकर चले थे। मार्ग में एक रात्रि भीयें के गांव में निवास किया। वहां भीयें से भेंट हो गयी। भीयां वाराणसी में विद्या पढा था। भीयें ने पूछा कि आप लोग कहां जा रहे हो। विश्नोइयों ने कहा कि हम लोग बागड़ देश जा रहे है। वहां पर साक्षात विष्णु का ही अवतार हुआ है। उनका दर्शन, स्पर्श,शब्द,श्रवण करके जीवन का लाभ उठायेगे।

भीयें ने विद्या तो पढी थी किन्तु हृदय का ताला अब तक खुला नहीं था। कुतर्क करने में वह चतुर था, श्रद्धा,विश्वास नहीं था मैं पण्डित हूं इसलिये सभी का पूज्य हूं। यही अहंकार भींये को ज्ञान से दूर हटाता था। वह व्यर्थ का बकवास करता था। विश्नोइयों से ज्ञान की वार्ता करने लगा।

भीयां कहने लगा-आप लोगों को किसी ने भरमाया है। ये बाते आपने किसी अनपढ योगी साधु द्वारा सुनी होगी कि सम्भराथल पर अवतार हुआ है। आप लोग सार तत्व नहीं जानते। आप लोगों ने शास्त्र नहीं पड़े हैं। कलयुग में तो एक ही अवतार होगा, वह कलयुग के अन्त में जो कलयुग की करणी करता है वह कलयुग से पार कैसे होगा।

विश्नोई कहने लगे हे भीयां । हम अधिक व्यर्थ की वार्ता आप से कर के समय बरबाद नहीं करना चाहते। आप ही हमारे साथ ही चलो। वहां आंखो से देखोगे तो स्वयं ही पता चल जायेगा विश्नोइयों की बात स्वीकार करके भींये ने हाथ में पुस्तक ले लो और कहने लगा

हे विशनोइयों ! मैं प्रण करके साथ चल रहा हूं आप लोग भी अपने प्रण के पके रहना कही बीच में ही प्रण नहीं त्याग देना। इस प्रकार से विवाद करते हुए वह दिन व्यतीत हो गया इसलिये उस दिन जमात उसी |गांव में ही रुक गयी। भीये की धर्म पत्नी कहने लगी-हे पतिदेव । हठ छोड़ दो, विवाद न करो, ये हमारे जमीन दार लोग है जैसा ये कहते है वैसा स्वीकार क्यों नहीं करते। ऐसा वचन अपनी नारी का सुनकर भीया नाराज हुआ किन्तु अपना हठ नहीं छोड़ा।

 प्रात:काल विश्नोइयों की जमात के साथ हो भीयो अपने पुस्तक शास्त्र लेकर गाड़ी पर बैठ गया बहुत दिन चलने के पश्चात् भीयो जमात के साथ सम्भराथल पर पहुंचा। सभी ने अपनी अपनी भेंट गुरुदेव के सामने रखी। चरण स्पर्श किया.किन्तु भींये ने अहंकार वश न तो प्रणाम किया और न ही कुछ भेंट ही रखी।

 भीया सतगुरु के सन्मुख हुआ और ” द का अर्थ पूर। सतगुरु ने “ट” के चार अर्थ बताये पहला अर्थ दान, दूसरा अर्थ दयाभाव, तीसरा अर्थ अपने इष्ट देव का स्मरण, चौथा अर्थ उस व्यक्ति की देव लोक में भी प्रतिष्ठा है जो”द” के अर्थ को जानता है।

भिये ने पूछा – कलयुग में तो एक हो अवतार होगा वह भी कलयुग के अन्तिम में। आप स्वंय को अवतार कैसे कहते है ? मैं पुस्तक पढता हूँ, विचार करता है, कलयुग में अन्य कोई अवतार नहीं है। जाम्भोजी ने कहा- अन्य अवतार तो शास्त्रों द्वारा प्रकट है किन्तु यह सम्भराय सोवन नगरी पर तो यह गुप्त अवतार है।

 भीयो कहने लगा – इस सोने की नगरी को आप आंखो से दियाले तप में मानूगां, अन्यथा कहने मात्र से क्या होता है। आंखो से देखने से ही प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। मुझे पका विश्वास एवं दा होगी तो में आपको तीनों लोको का राव अवतार मानूंगा।

 जम्भेश्वर जी अपने साथ में रणधीर बावल दूसरा ध्यान खियों,तीसरा सैंसोजी राठोड़, चौथा दूजैन माल तथा पांचवा स्वयं भीया लौहार। इন ঘা की चौकस – सावधान करके साथ चलने के लिये तैयार किया।सतगुरु के ये पांचो लोग भाय आये अच्छे लगे इसलिये इन्हें सोवनी नगरी दिखाई।

 श्री देवजी समराथल पर हरि ककेहड़ी वृक्ष के नीचे विराजमान होते, वहां से पूर्व की ओर इन पांचो को ले गये। जहां पर तालाब है, जहां से मिट्टी निकालते है ठीक उसी जगह पर ले गये। प्रथम तो उनसे कहा एक मन एक दिल से सतगुरु में स्थिर हो जाओ। जब उनकी चंचल वृति शांत हो गयी तब उन्हें वही पर मिट्टी हठायी तो नीचे परदे दिखाई दिये। जिनके पीछे अवश्य ही कुछ छूपा होगा पड़दे के पीछे भारी किवाड़ जड़ा हुआ दिखाई दिया। वहां बिना सूर्य ही प्रकाश दिखाई दिया मानों सूर्य उदय हो गया हो। वहां पर सोने के फाटक लगे हुए देखे। सोने की ही दीवारे थी।

 देवजी ने कहा- हे भीया ! ये तुम्हारे ही घड़े हुऐ है। किन्तु सोने के ताले जड़े हुए दिखाई दिये। सतगुरु की महिमा कौन वर्णन कर सकता है, उनकी शक्ति को कौन सहन करेगा आगे बढ़ नहीं सके। सतगुरु ने कहा ताक में तालो रखी है,आप खोलिये और अन्दर प्रवेश कीजिये। कीवाड़, तो अवश्य ही जड़े हुए है किन्तु चावी -ताली मेरे पास है।

उसे लीजिये और अन्दर प्रवेश कीजिये।भीया कहने लगा हे देव । यदि हमारे से ही किवाड़ खुल जाते तो आपको कौन पूछता। हम तो कभी के प्रवेश कर गये होते। आपने ही जड़े है और आप ही खोलिये। जब तक आप वचन नहीं दोगे तब तक ये कीवाड़ खुलेगे नहीं। श्री देवजी ने उधार दिये और उनके मन को भ्रान्ति को मिटाकर सोनवी संभरानगरी दिखाई। सहज भाव से हो सतगुरु ने ताला खोला, दरवाजे उघाड़े और सहज में ही पांचू जनों को अन्दर प्रवेश करवाया।

 वहां किसी प्रकार का सूर्य चन्द्र आदि का प्रकाश नहीं था श्री देवजी के शरीर का ही पूर्ण प्रकाश हो रहा था देव ज्योति के प्रकाश से अनेक महल मन्दिर आवास गृह देखे। भींये ने सोनवी नगरी और उनके स्वामी श्री जम्भेश्वर को आंखो से देखा और कहने लगा 

 अब आप मुझे भी विश्नोई करो। मैंने खोजते खोजते मालिक को प्राप्त कर लिया है। यही सम्भरा नगरी और वही विष्णु अवतार है। मैंने सत्य को जान लिया है। ये तो साक्षात सृष्टि के कर्ता धर्ता सभी कुछ है। शास्त्रों की गति से परे है।

वहां पर सतगुरु ने आज्ञा प्रदान की कि मैं जो वस्तुएं तुम्हें यहां से ले जाने के लिये कहूं वहीं आप पांचू लोग उठाले अन्य कोई वस्तु उठाना नहीं। सतगुरु ने कहा एक सोने की मूण – मटका, दूसरी झारी,तीसरी माला,चौथी सुलझावणी, और पांचवा स्वर्ण कलश ये पांचो वस्तुऐ लेकर देवजी के पीछे पीछे स्वर्ण नगरी से बाहर आ गये।

न जाने रणधीर बावल के मन में क्या आया,अनायास ही एक सोने की सिला-सिलम हाथ में उठा ली और उसे देखते ही देखते बाहर निकल आये। रणवीर ने बाहर आकर अपने ही हाथ में पराई वस्तु देखकर पछतावा किया कि मैं बिना पूछे यह अलौकिक वस्तु ले आया। किसी ने देखा ही नहीं और नहीं मुझे किसी ने रोका ही, अन्तर्यामी श्री देवजी ने सभी कुछ जानते हुए मुझे रोका नहीं,अवश्य ही इसमें कुछ राज होगा।

 जाम्भोजी ने कहा -रणधीर । बिना पूछे क्या ले आया जो पछता रहा है। रणधीर ने क्षमा याचना मांगी  परन्तु श्री देवजी ने कहा डरो मत ! इसे तूं परोपकार के कार्य में लगाते रहना। किन्तु है तो तेरी मृत्यु हो जरा बच के रहना।

भीये के मन में आनन्द हुआ, पांचो लोगो को लेकर श्री देवजी वापिस सम्भराथल आये। लोगा अलौकिक वस्तुएं देखी तो उन पर अलग अलग जो जिसको थी उसी का ही नाम था। बीकानेर का राजा जाम्भा पुराण लूणकरण पूर्व जन्म से ही सेवक था इसलिये स्वर्ण कलश राजा लूणकरण को देने का आदेश दिया,क्योंकि वह उन्हीं के नाम से ही था।

चित्तौड़ की कथा भाग 3

शेयर करे :

Share on facebook
Facebook
Share on whatsapp
WhatsApp

जांभोजि द्वारा किए गए प्रश्न बिश्नोई समाज के बारे में?

 जांभोजि द्वारा किए गए प्रश्न बिश्नोई समाज के बारे में? भगवान श्री जाम्भोजी और उनके परम शिष्य रणधीर जी का प्रश्नोत्तर दिया गया है जिसका

Read More »