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चित्तौड़ की कथा ओर जाम्भोजी भाग 1

चित्तौड़ की कथा ओर जाम्भोजी
चित्तौड़ की कथा ओर जाम्भोजी

                        चित्तौड़ की कथा ओर जाम्भोजी भाग 1

वील्हो उवाच- हे गुरु देव। आपने अब तक अनेकानेक भक्त, योगी की कथाओं द्वारा श्री जाम्बेश्वरजी के जीवन चरित्र का वर्णन किया जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा अब आगे मैं उस समय के राजा लोगों के बारे में सुनना चाहता हूं। वे राजा लोग जाम्भोजी के सम्पर्क में अवश्य हो आये होगे। उन्होने किस प्रकार से शिष्यत्व स्वीकार किया। क्योंकि राजा लोग तो बहुत ही रजोगुणी होते है। उनमें काम क्रोध तथा लोभ आदि कहीं ज्यादा ही होते है। उनके लिए समर्पण होना कठिन ही है।

 नाथोजी उवाच-हे शिष्य । जाम्भोजी के शरण में तत्कालीन राजा लोग आये थे उन्होनें शिष्यत्व भी स्वीकार किया था। यह जाम्भोजी का कृष्ण चरित्र ही था, कृष्ण चरित्र से अनहोनी भी होनी हो जाती है। असंभव भी संभव हो जाता है। अनेक राजाओं को विचित्र कथाओं में सर्वप्रथम मैं तुझे चितौड़ नरेश सांगा राणा एवं उनकी माता झालीराणी की कथा सुनाता हूं।

 “एक समै पुरव का विशनोई बालद्य लादी चितौड़ आया। सांग राण दांण मांग्यी विसनोइया ना कारयौ। झालीराणी कह जाम्भोजी न पूछो। जोड़ बकस्यौ। जांभाजी झारी, माला, सुलझावणी दोन्ही। झाली नु जलम सोझ पड़ी। झाली नुं सबद सुणायो। जाम्भोजी श्री वायक कहै

                                शब्द 63

ओ३म् आतर पातर राही रूक्मण, मेल्हा मंदिर भोयो।

गढ़ सोना तेपण मेल्हा, रहा छड़ा सी जोयो।

रात पड़ा पाला भी जाग्या,दिवस तपंता सुरू।

उन्हा ठाढा पवना भी जाग्या, घन बरसंता नीरू।

दुनीतणा औचाट भी जाग्या, के के नुगरा देता गाल गहीरू।

जिहि तन ऊंना ओढ़ण ओढ़ां, तिहिं ओढ़ंता चिरू ।

जां हाथे जप माली जपा, तहां जपंता हीरू।

बारां काजै पड़यो बिछा हो, संभल संभल झूरू।

 राधा सीता हनुमंत पाखो, कौन बंधावत धीरू।

 मागर मणियां काच कथा, हीरस हीरा हीरू।

विखा पटंतर पड़ता आया, पूरस पूरा पूरू।

 जे रिण राहे सूर गहीजै, तो सूरस सूरा सूरू।

दुखिया है जे सुखिया होयसै, करें राज गहीरू।

 महा अंगूठी बिरखा ओल्हो, जेठ ने ठंडा नीरू।

 पलंग न पोढण सेज न सोवण, कंठ रुलाता हीरू।

इतना मोह न मानै शिंभु, तहीं तहीं सूसू ।

 घोड़ा चोली बाल गुदाई, श्री राम का भाई गुरु की वाचा बहियो।

राघो सीतो हनवंत पाखो, दुःख सुख कासू कहियों।

 एक समय पूर्व देश के विश्नोई प्रमार, विधियां, उमरा आदि गोत्र के लोग व्यापार करने हेतु अनेक देशों में भ्रमण करते हुए अपनी बैलगाड़ियों पर सामान लेकर चित्तौड़ नगरी की राज्य सीमा में प्रवेश किया। जाम्भोजी ने उनको विश्नोई बनाया था। उन लोगो ने अपनत्व छोड़ दिया था और विश्नोई पंथ में सम्मिलित हुऐ थे। अपना पुश्तैनी धन्धा व्यापार करना त्याग नहीं किया था। विश्नोई बनकर गुरु की शरण में आ गये थे। अब वो लोग किसी से भी डरते नहीं थे। सभी देशों में निर्भय होकर भ्रमण करते थे। एक देश से दूसरे देश में वस्तु को ले जाना क्रय विक्रय करना,लाभ कमाना उससे अपनी आजीविका चलाना ही उनका अपना कर्म था।

इस प्रकार से कार्य करते हुए एक समय विश्नोई व्यापारी जमात चितौड़ पहुंच गयी। चितौड़ में वस्तुओं की बिक्री की। लाभ का सौदा किया। दरबार में खबर हुई कि पूर्व देश के व्यापारी लोग सौदा बेच रहे है। चितौड़ के राजा सांगा ने अपने लोगो को भेजा और विश्नोइयों से कर मांगने का आदेश दिया।

 जब डाण – कर मांगने वालों ने अन्य व्यापारियो की भांति विश्नोइयों से भी कर मांगा तो विश्नोई कहने। लगे- हे भाई आप लोग हम से कर मांगने वाले कौन होते हो? कहां से आये है ? उन कर्मचारियों ने कहा हमें राजा सांगा ने भेजा है। इस देश की सीमा में व्यापार करने वाले व्यापारी को कर चुकाना होता है तभी आप लोग वस्तु का व्यापार कर सकते हो।

विश्नोइयों ने कहा हम जाम्भोजी के शिष्य विश्नोई है धर्म कर्म का पालन करने वाले है हमारे तो पातस्याह एक जाम्भोजी है” सर्व भूमि गोपाल की ” अन्य कोई नहीं है। हम तो केवल जाम्भोजी की आज्ञा का पालन करने वाले है। आपको कर नहीं देंगे।

राज कर्मचारी कहने लगे – हे विशनोइयो । राणा सांगा को पातस्याही में ऐसा कौन मा जबरदस्त है जो कर नहीं देगा। आपको पता होना चाहिये कि सिर पर पातस्याह तप रहा है। यदि कर नहीं देना है तो पातशाह के पास ही चलो। ऐसा कहते हुए उन कर्मचारियों ने विश्नोइयों को राजा के सामने उपस्थित|किया।

राणा कहने लगा आप लोग कौन होते है ? मैं आपको देखकर समझ नहीं पा रहा हूँ तुम्हारी जाति क्या है। राणा क्रोधित होकर कहने लगा मैं कर छोडूंगा नहीं। मैं छोड़ भी कैसे दें, न ही तुम्हारा भेष साधु का है इसलिये साधु सन्यांसी तुम लोग हो नहीं। न ही तुमने अब तक कोई विशेष बलिदानी कार्य ही किया है। नहीं धर्म रक्षार्थ प्राणों को निछावर ही किया है। न हो आप लोगों ने ब्राह्मण आदि का वेश बनाया है।

 राजा कहने लगा – आप लोग डण देवो तो पीछा करेगा। धर्म रक्षार्थ ब्राह्ण,चारण, भाट ये लोग बलिदान दे देते हैं। इसलिये उन्हें डाण माफ होता है। आप लोगों में तो ऐसा कुछ भी नहीं है। विश्नोई कान लगे हे राजा । यदि आप क्रोध न करे तो हम आप से बात कहे। आप लोग जिनके बलिदान की बात कहते है जिन्हें आप धार्मिक बतला रहे है उनसे कहीं अधिक हमारा यहां पर बलिदान होगा। हम लोग डाण नहीं देंगे किन्तु अपना बलिदान देगें।

हे राणा । विश्नोइयों से आप जबरदस्ती न करे। आप न्यात जमात को एकत्रित कर ले सभी से पूर्व ले। हम बलिदान देने वाले धर्म प्रेमी जन है हम से जगात नहीं ली जाती है। राणा कहने लगा- हमने सुना है कि धर्म रक्षार्थ बलिदान हो जाते है वे लोग आप नहीं दूसरे होते हैं।

 चारण, भाट, ब्राह्मण,योगी,याचक,और भगवान ये लोग तागा करते है। अपने शरीर को भी तुच्छ मान कर त्याग देते है किन्तु विश्नोई नहीं।

विश्नोई कहने लगे – हमारा तागा – बलिदान तो जगत प्रसिद्ध है। हमसे तो अन्य राजा लोग भी डाण नहीं लेते है। अजमेर के करमसी पंवार,जेसलमेर के राजा जेतसो, नागौर का महमद खां,फलोदी के राव हमीर, मेड़ते का राव दूदा, जोधपुर का राव सांतल,जगता,गोपाल, अन्य पातस्याह, खाना, खोजा,मोर का,मोर,आदि सभी राजा पातशाह.हकीम आदि विश्नोइयों से डाण नहीं लेते।

 इस मही मंडल में जाम्भोजी की मर्यादा कौन मिटा सकता है। हे राणा | हम लोग बलिदान करके आंखो से दिखायेगे। संभल कर विचार से बात कीजिये। तीन दिन के पश्चात् हम लोग सभी लोग शरीर को छोड़ देगें किन्तु डाण नहीं देंगे। हमने तो कर्ता धर्ता विष्णु जाम्भोजी से कवल किया है। अपने नियम धर्म को नहीं छोड़ेंगे, किन्तु बलिदान दे देगे। ऐसा कहते हुए विश्नोइयों ने पवली द्वार पर धरना दे दिया। तन मन धन त्याग कर मरने को तैयार हो गये।

 नगरी के कई लोग भयभीत हुए।ज्यों ज्यों लोग भयभीत होन लगे त्यों त्यों विश्नोइयों में मजबूती आने लगी। जब राणा से बात नहीं संभली तो बात राणा की मां झालीराणी तक पहुंची। रानी ने सुना कि मात्र दण के लिये बेटे ने साधु पुरूषों को सताया है यदि ये लोग बलिदान हो गये तो बड़ा भारी अपराध हो जायेगा। ये संत पुरूष तो पीछे हटने वाले नहीं है। मुझे ही कुछ करना चाहिये।

 साधु सन्जनों की तो रानी सेवक थी। उन्हें इन पर दया आयी,किन्तु रानी तो सामने नहीं आती, परदे| में रहती है। इनका कष्ट दूर कैसे किया जाए। करूणामयी माता झाली राणी पड़दे की परवाह न करके महलों से नीचे उतरी। अपनी सहेली के साथ राणी पड़दे में खड़़ी हुई। अपने प्रधान पुरूष को पास बुलाया और कहने लगी

हे प्रधान – तुम जल्दी जाओ और उन तागाला विश्नोइयों को मेरे पास बुला लाओ। प्रधान पुरूष ने उन विश्नोइयों से कहा- रानी आप पर प्रसन्न है, उन्होंने आप को बुलाया है, अभी अति शीघ्र चलो। रानी से सवाल जबाब करो। तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा। अति शीघ्र ही विश्नोई प्रधान के साथ राजमहल

में रानी के सामने हाजिर हुए और रानी को आशीष दी।

रानी ने जाम्भाणी लोगो से पूछा हे भाइयों । मैं आपकी बहन है, आप मुझे सत्य बतलाओ कि आप किस जाति के है, कौन तुम्हारा गुरु एवं मार्ग है पूजा जप किसकी करते हो सेवा चाकरी किसकी करते हो। आप लोग हिन्दू हो या मुसलमान, किस धर्म में आप चलते हो।

 विश्नोई कहने लगे हम लोग विष्णु के उपासक विश्नोई है। विष्णु जाम्भोजी ही हमारे इष्ट देवता है। सम्भल पर विराजमान जाम्भोजी हो हमारे सतगुरु है। सतपंथ के हम अनुयायी है। हम लोग धर्म पर चलने वाले है क्योकि हमारे श्री देव जी ने सर्व प्रथम दया धर्म बतलाया है। बाहर भीतर एक रस,कपट भाव का | परित्याग, बतलाया है। जैसा कहना वैसा ही आचरण यतलाया है। तीथों में जाकर स्नान करना बतलाया है।दान तप शील, शुद्ध भाव इन चार नियमों पर चलने का आदेश दिया है।

 झाली ने यह वार्ता सुनी तो कहने लगी -ये तो सभी हिन्दुओं के मुख्य धर्म हैं, ऐसी वार्ता सुनकर अति न हुई। कहने लगी हे भाई लोगो । तुम्हारे पर गुरु की अपार कृपा है,तुम्हारे सिर पर भगवान का हाथ আन क्या बिगाड़ सकता है। रानी के मधुर वचनों को सुनना तो विश्नोइयों के लिए अमृत तुल्य प्रतीत हुआ।

चित्तौड़ की कथा भाग 2

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