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गौचारण अवस्था जम्भेश्वर भगवान की ………समराथल धोरा कथा 4

                                         गौचारण अवस्था जम्भेश्वर भगवान 

गौचारण अवस्था जम्भेश्वर भगवान
गौचारण अवस्था जम्भेश्वर भगवान

                                                               भाग 1

उस समय में पीपासरवासियों के पास में पशुधन का ही बाहुल्य था। खेती बाड़ी की तरफ ध्यान कम था केवल पशु पालन ही मुख्य आजीविका थी। ग्राम के एक तरफ तो अन्न निपजाने के लिये खेती होती थी तो दूसरी तरफ पशुओं के चरने के लिये विशाल वन खण्ड का भू-भाग हुआ करता था। जिसमें पशु निर्बाध गति से विचरण कर सके। पीपासर से उतर की तरफ सम्भराथल का वन खण्ड जिसमें ग्वाल-बाल पशुओं को चराया करते थे।

यह सम्भराथल ही अन्तिम छोर हुआ करता था। पीपासर से चलकर सम्भराथल तक गऊवें आती थी, वहीं पर दिनभर विचरण करती थी। ग्वाल बालक वहीं सम्भराथल की हरि कंकेड़ियों के नीचे खेल खेला करते थे। सायं को वापिस पीपासर लौट जाया करते थे।

 जब लोहट बालक जम्भदेव कुछ बड़े हुए, गऊ चराने के लायक हो गये तब एक दिन लोहट जी ने अपने पास बिठाकर प्रेम से समझाया कि प्रिय पुत्र! अब तुम बड़े हो चुके हो देखो, तुम्हारे सदृश बड़े हुए बालक गऊवें चराने के लिये वन में जाते हैं उसी प्रकार तुम भी कल से उनके साथ में जाया करो, देखो ! वन में सचेत रहना होगा कहीं पशु खो न जाये, कोई जंगली भेड़िया, सिंह आदि गांवों को मार न दें और कहीं तुम ही मेरे लाडले पुत्र खो न जावो।

इस प्रकार की अनेकों हिदायतें देकर दूसरे दिन प्रातः ही गऊवों के पीछे भेज दिये गये। ग्वाल-बाल तथा गांव के सहित अन्तिम सीमा पीपासर से सम्भराथल पर पहुंचे तो सुमेरू पर्वत सदृश सर्वोच्च तपस्थली को इस प्रकार से देखा तो उसके सर्वोच्च शिखर पर चढ़कर आसीन होने की इच्छा जागृत हुई। गऊवें तो अपने-अपने ठोर विचरण कर रही थी किन्तु ग्वाल-बालों सहित जम्भदेव उसी सम्भराथल पर मंडप मेड़ी रूपी कंकेहड़ी वृक्ष के नीचे आसन लगाकर अनायास ही समाधिस्थ हो गये।

 ग्वाल-बालों को तो अपने ही खेल क्रीड़ा से फुर्सत नहीं थी कौन किसको देखता दिन व्यतीत हो चुका था सायं के समय बालक तो पशुधन लेकर अपने-अपने घर पहुंच चुके थे किन्तु लोहे का छोटा बालक गऊवों के साथ घर पर नहीं लौटा था। लोहट जी चिन्तित होकर अन्य बालकों के घर-घर पहुंचकर उनसे अता-पता पूछा तथा अपनी अवस्था का बखान किया तब बालकों ने कहा कि आप हमें दोष न दें।

आपका बालक तो वहीं सम्भराथल पर एक वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठ गया था। हम लोगों से तो बातचीत भी नहीं की और न ही हमारे साथ खेल ही खेला। जैसा हम लोग खाते-पीते हैं वैसे वह तो खाता-पीता भी नहीं है फिर भी शरीर से तो हष्ट-पुष्ट ही दिखता है। कुछ ऐसा लगता है कि उनको ऐसी कोई और अलौकिक शक्ति प्राप्त हो रही है। जिसके बल पर वह बैठ भी सकता है और भूख प्यास को भी जीत सकता है।

 दूसरे दिन से लोहट जी ने सभी बच्चों से कहा कि भाई देखो! मैं तो अब बूढ़ा हो चुका हूं, मेरे में तो गऊ चराने का सामर्थ्य नहीं है एक ही बालक वृद्ध अवस्था में किसी महात्मा के वरदान से प्राप्त हुआ है वह भी महात्मा जैसा ही हो गया है उन्हें तो किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है। मैं कहां तक दुःख प्रगट करूं। अब तो मेरे आंसू भी सुख चुके हैं वह सरिता सूख चुकी है जहा से अश्रओं की धारा प्रवाहित होती थी अब तो आप लोगों पर ही भरोसा है आप लोग यदि संभाल सको तो गऊवों को चराने ले जाओ। उस गूंगे का तो मुझे भरोसा नहीं है।

सभी बालकों ने एक साथ हां कहा और अपनी तथा लोहट की गऊवों को लेकर सम्भराथल पर पहुंचे। वहां पर पशु धन को तो जम्भेश्वर को सौंप दिया और सभी खेल खेलने में मस्त हो गये किन्तु बीच-बीच में पशुओं को घेरकर लाने की समस्या सामने आने लगी जिससे खेल में विघ्न पैदा हो जाता था।

इस समस्या का समाधान जम्भदेव ने इस प्रकार किया कि बारी-बारी से सभी लोग पशुओं को घेरने के लिये जाया करेंगे तब सर्वप्रथम लोहट बालक को ही बारी संभला दी थी और सभी निश्चित होकर खेल में ही मस्त हो गये सांझ के समय जब बालकों को जब घर की सुधी आयी तब सभी ने देखा कि पशु जो गाय, भैंस, ऊंट, बकरी आदि थे उनका तो कहीं पता ही नहीं है सभी लोग घबराकर कहने लगे कि भाई लोहट जी ने ठीक ही कहा था कि उस गूंगे का भरोसा नहीं करना वो कहीं पशुधन खो न दे।

आज तो हम सभी लोग ठग गये हैं अब घर पर क्या मुंह लेकर जायेंगे इस प्रकार से चिन्ता से व्याकुल देखकर जम्भदेव जी ने कहा कि तुम चिन्ता न करो मैं अभी बुला लता हूं। वहीं पर सम्भराथल की सिद्ध भूमि पर खड़े होकर अपना दाहिना हाथ चारों तरफ घुमा दिया जिससे सभी पशु चारों दिशाओं से वापिस अपने-अपने सुरक्षित स्थान में आ गये। कुछ बालक धैर्य छोड़ चुके थे वे चारों ओर भाग-दौड़ करते हुए खाली हाथ वापिस लौट आये, आगे आकर देखा तो धन वहीं पर चरता हुआ दिखाई दिया।

 वील्हेजी ने इसलिये तो कहा है “परच्या पशु और पक्षियां जीवां उत्तम जात, धन्य दिहाड़ो रैण ही प्रगट्यो गुरु संसार” जम्भेश्वर जी तो यही बतलाना चाह रहे थे कि जब तुम लोग खेल ही खेलना चाहते हो तो निर्भय होकर सभी चिन्ताओं से मुक्त होकर खेलो। यह संसार तो एक खेल मात्र ही है इसे कभी सच्चा नहीं मानना यदि इसी को सच्चा मान लिया तो तुम कभी खेल को खेल ही नहीं सकते सदा चिन्तित बन्धनों में जकड़े रहोगे जो तुम्हारे लिये दुःखदायी है।

जो कुछ भी तुम्हारे पास अहंकार की सामग्री विशेष है उसे  तुम लोग मेरे समर्पण कर दो अपनी मत समझो उसकी रक्षा का भार उसी परमपिता परमेश्वर पर छोड़कर यदि खेल की रचना करोगे तभी वास्तव में खेल खेलने में सफल हो सकोगे नहीं तो ” दुविधा में दोऊ गये माया मिली न राम” उसी दिन से बालकों को सच्चा विश्वास हो गया कि अब हमारा पशुधन कहीं खो नहीं सकता

उसे कोई जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचा सकता उनका कार्य तो केवल इतना ही रह गया था कि पीपासर से धन पशुओं को सम्भराथल तक पहुंचा देना और सम्भराथल से पीपासर तक बाकी रक्षा का कार्य जम्भदेव पर छोड़कर बालक आनन्दित रहने लगे।

संसार में रहते हुए आनन्दित रहने का भी यही परम सूत्र है जो इस समझ को अपना लेता है वह भी उसी प्रकार से आनन्दित रहने लग जाता है।

 इस प्रकार की यह गोचारण लीला सम्भराथल पर अबाध गति से चल रही थी। एक दिन सभी ग्वाल बाल एकत्रित होकर जम्भदेव जी से कहने लगे आप तो हमारी सदा ही रक्षा ही करते हैं किन्तु हमारे साथ कभी खेलते क्यों नहीं केवल दृष्टाभाव से देखने से तो आपको क्या आनन्द मिलता होगा। जम्भदेव जी ने कहा कि जो सुख दृष्टा-साक्षी भाव में है वह आनन्द खेलने में नहीं मिला करता है यदि कोई खेल को ही हार-जीत मान लेता है तो वह निश्चित ही दुखी हो जाता है।

किन्तु असलियत में तो दृष्टा भाव ही आनन्ददायक होता है। यही नियम संसार के जीवों पर लागू होता है किन्तु यह बात बालकों की समझ में नहीं आ सकी। बालक ही क्यों बूढ़ों के भी समझ में यह बात क्या आ सकी है?

बालकों के हठ के सामने जम्भदेव की एक भी नहीं चली आखिर में खेलने के लिये तैयार हो गये तब सभी बालकों ने निर्णय किया कि आज इस पवित्र भूमि पर कोई दिव्य ही खेल रचना चाहिये क्योंकि आज हम सभी मिलकर जम्भदेव को ही हरायेंगे फिर देखेंगे कि हार से दुःख होता है या नहीं, केवल उपदेश देना तो सरल है किन्तु उसको जीवन में उतारना अति कठिन होता है। इसलिए लुकमींच को खेल ही खेला जाएगा।

सर्वप्रथम जम्भदेव जी से ही कहा कि आप आंख बन्द करके पेड़ के पीछे बैठ जाइये हम सभी लोग छुप जाते हैं फिर हमें खोज लेना ऐसा ही किया गया जहां पर भी बालक।

लुकने-छिपाने के लिये जाते वहां पर ही आंख बन्द किये हुए जम्भ बालक बैठे हए दिखायी देते। सभी ने मिलकर सोचा कि यह तो चालाकी है हम जहां पर भी छिपने के लिये जाते है वहीं पर हम से आगे पहुंच जाते हैं। तब सभी ने एक स्वर से कहा कि तुम हमारे साथ चालाकी से खेल रहे हो यह नहीं चलेगा। अब तुम छिप जाओ, जहां पर भी छिपना चाहते हो हम खोज लेंगे। क्योंकि खोजने में हम अति चतुर हैं।

जम्भदेव जी ने हां कहकर स्वीकृति दे दी और सभी से आंख बन्द करवाकर उसी सम्भराथल पर ही ऐसे छुप गये जो कि एक माह तक पता भी न चला बालक तो दिनभर खोज करके सांय को घर लौट आते दूसरे दिन फिर उसी प्रकार से खोजा करते थे।

 इस वार्ता का पता लोहट हांसा तथा ग्रामवासियों को भी लगा तब वे हैरान होकर तमाम सम्भराथल की झाड़ियों, लोगों, कुमठा, कंकेहड़ी आदि में खोजते रहे किन्तु वहां पर भी पता न चल सका। आखिर हारकर सिर कूटकर प्रभु का ऐसा ही विधान मानकर घर पर बैठ गये, वापिस आने की प्रतीक्षा में दिन व्यतीत करने लगे इसी बीच जम्भगुरु जी तो धरती में प्रवेश करके पाताल लोक में चले गये वहां पर प्रहलाद पंथी जीवों को सचेत करके उन्हें अमृतमय पाहल पिलाकर बिश्नोई बनाया तथा यही नियम धर्म बतलाकर वापिस एक महीने पश्चात् सम्भराथल आये।

प्रातः काल की बेला में एक दिन ग्वाल बाल उदास मन से सम्भराथल पर पहुंचे थे कि पूर्व दिनों की भांति उस दिन भी सम्भराथल पर ध्यानावस्था में जम्भदेव बैठे दिखाई दिये। बालकों ने ध्यानपूर्वक एकाग्रमन से देखा तो आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा। उनमें से एक दो बालक एक श्वास से ही भागते हुए पीपासर पहुंचे और जाकर यह खुश-खबरी पीपासर निवासियों को देते हुए बधाई मांगी। उसी समय ही लोहट हांसा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

उन बालकों को बहुत सी बधाईयां देते हुए पूछा कि यह बात तुमने आंखों से देखकर कही है या सनी-सनाई कही जा रही है। बालक ने बताया कि यह मैंने अपनी इन्हीं आंखों से सदा की भांति ध्यान लगाये बैठा देखा है। उस बालक की वार्ता पर विश्वास करके लोहट हांसा सहित सभी ग्रामवासी,

नरनारी बाल-वृद्ध सम्भराथल की तरफ भाग करके पहुंचे कि हाथ में आया हुआ हीरा कहीं फिर से खो न जाये इसलिये अति शीघ्रता से सभी जन सम्भराथल पहुंचकर दर्शन किया प्रेम से मिलाप करके आनन्द का अनुभव करते। वापिस धूमधाम गाजे-बाजे के सहित पुन: पीपासर में प्रवेश करवाया ।

                                                             भाग 2

  जिन्होनें इन पांच तत्वों को जीत लिया है उसके लिये ये आकाश, वायु, तेज, जल, धरणी बाधा उत्पन्न नहीं कर सकते। जन साधारण को तो ऐसा ही मालूम पड़ता है कि यह असंभव बात कैसे संभव हो सकती है किन्तु योगी के लिये तो यह सामान्य सी बात है। फिर जो स्वयं विष्णु के ही अवतार रूप में हो उनके लिये तो संसार में कुछ भी असंभव नहीं हो सकता इसलिये पाताल लोक में जाना भी संभव हो सकता है और प्रहलाद पंथ के बिछुड़े हुए जीवों को ढूंढ़ करके पार उतारना भी अपना कर्त्तव्य कर्म समझते थे।

जो जीव भाग्य या कर्म वश जिस देश, काल, जाति में जहां पर भी पहुंचा है उनको वहीं से वापिस मुक्तिधाम में इसी प्रकार से ही पहुंचाया जा सकता था। इसलिये सर्वप्रथम पाताल लोक में ही जाकर जम्भदेव जी ने बिश्नोई धर्म की स्थापना की थी।  

पाताल लोक से कोई अन्यथा न समझे इस समय अमेरिका आदि पश्चिम दूर देशों को उस समय की भाषा में पाताल लोक कह दिया गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं है। वर्तमान में उन्हीं देशों में अनेक धर्मावलम्बी लोग रहते ही है। यदि विचार करके उदारता से देखा जाय तो वर्तमान का पारसी धर्म बिश्नोई धर्म से काफी मिलता-जुलता प्रतीत होता है। समयानुसार कुछ तो परिवर्तन होना अवश्यंभावी है। लेकिन मूलरूप से एकता की काफी गुंजाइस प्रतीत होती है। यह एक खोज का स्वतन्त्र विषय है जो विचारणीय है।  

ग्वाल-बाल सहित सम्भराथल पर विराजमान होकर जम्भदेव जी गऊवें चराया करते थे उसी समय वहां पर अत्यधिक घना वन दूर-दूर तक फैला हुआ था। जिसमें गाय, भैंस, ऊंट, बकरी आदि पालतू पशु अबाध गति स विचरण करते हुए वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे। हरे-भरे विशाल वन को देखकर मेघ ऊमड़ कर आया करते थे और अथाघ वर्षा से परिपूरित कर देते थे उस समय चारों ओर खुशहाली का साम्राज्य था।

यहां तक कि जोधपुर राज घराने के ऊंट आदि पशु भी वहीं पर रहा करते थे. जिनकी रखवाली ग्वाले किया करते थे। पीछे राज कुंवर वीदा तथा ऊदो ये दोनों ही अपने को शूरवीर समझते थे तथा अपनी करामात के कारण ही चोर डाकुओं को भयभीत करते थे।    

एक समय सम्भराथल पर जम्भदेव जी विराजमान थे उसी समय ही डाकुओं के समूह ने वहां से जोधपुर राज घराने का तथा कुछ जाट वर्गों के पशुधन को जबरदस्ती से ग्वालों से छीन लिया और सम्भराथल के अति निकट से हो लेकर जा रहे थे। तब ग्वाल-बालों ने कहा हे देव! आप नित्यप्रति इसी थल पर बैठकर अनेक चरित्र दिखलाते हो आज बेचारे इन पशुओं पर विपत्ति आ चुकी है इन्हें जबरदस्ती से यह स्थान छुड़ाकर डाकू लोग ले जा रहे हैं।

इनसे पीछा छुड़ाने के लिए बाहर अवश्य ही आयेगी उस समय निश्चित ही युद्ध होगा उसमें खून-खराबा होगा ही, आप कृपा करके इनसे पशुधन को मुक्त करवा दीजिये। तब जम्भदेव जी ने कहा कि आप लोग इसी उच्चस्थल से अपनी एक सेना बना लीजिये। आपके पास यदि कोई शस्त्र नहीं है, घोड़ा सवारी के लिये नहीं है तो भी कोई बात नहीं, ये तुम्हारी लाठियां ही अश्व तथा शस्त्रों का कार्य करेगी।  

 ग्वाल बालकों ने ऐसा ही किया, उसी समय ही डाकुओं को अस्त्र-शस्त्र सुाज्जित बहुत भारी सेना आती दिखायी दी जिससे भयभीत होकर पशुओं को छोड़कर भाग गये। यह सभी कुछ सिद्ध स्थल पर गुरु जम्भेश्वर जी ने अपने योग बल से किया था। जिसमें एक से अनेक दिखने की करामात बालकों को दी थी उनका उत्साह संवर्धन किया था निरुत्साहित डाकुओं के लिये उत्साह युक्त बालकों की सेना हजार गुणा दिखलाई दे तो आश्चर्य ही क्या है।

इसी प्रकार से पशुधन वहीं सुख शांति पूर्वक विचरण में मस्त हो गया पीछे से राजकुमार वीदो तथा ऊदोजी अपनी सेना सहित पशुओं को छुड़वाने आये तब वहीं पर ही पशुओं को विचरण करते हुए देखकर आश्चर्यचकित रह गये और ग्वाल-बालों से पूछा तब उन्होनें बतलाया कि यह करामात तो हमारे ही साथी जम्भदेव की है उन्होनें ही यह धन छुड़ाया है।   सभी मिलकर सम्भराथल की सर्वोच्च हरि कंकेहड़ी के नीचे विराजमान जम्भदेव जी के समीप पहुंचे सभी ने हाथ जोड़कर अभिवादन किया तथा अपने जीवन को परमात्म की ज्योति से अवलोकित किया।

उसी समय ही आश्चर्यचकित होकर ऊदोजी तथा वीदोजी राठौड़ ने कुछ प्रश्न भी पूछे थे जिसका उत्तर शब्दवाणी द्वारा दिया जो शब्द नं. 2 से लेकर 6 तक उन्हीं के प्रश्नों के उत्तर रूप में कहे गये है प्रथम शब्द गुरु चिन्हों-पीपासर में ही एक पुरोहित के प्रति कहा था तथा दो से लेकर लगातार 6 तक ये शब्द गौ चराते समय ही संभराथल पर विराजमान होकर कहे है।    

उस समय कुछ तो भोले-भाले सीधे सरल सज्जन प्रकृति के लोग थे तथा कुछ अति चतुर चालाक तथा उदण्ड प्रकृति के मानव उस मरुस्थल में बसा करते थे तथा कुछ अज्ञानता में भटक रहे थे उन्हें कोई ज्ञान की किरण उदय करवाने वाला कोई नजर नहीं आ रहा था ऐसे समय में चमत्कार तथा शब्दवाणी ये दो ही रास्ते-धारायें प्रवाहित करके उनको प्रभावित करना परमावश्यक था।

ये दोनों ही धारायें अधिकतर संभराथल से ही प्रवाहित हुई हैं क्योंकि वह सर्वोच्च स्थल पर था। उसी से प्रवाहित हुई ज्ञान गंगा दूर-दूर देश तक पहुंच सकी थी। दोनों राजकुमार सेना सहित अग्नि को प्रज्वलित करके आये थे अग्नि यदि दहकती तो या तो स्वयं भस्म हो जाते या फिर सामने वालों को भस्मी भूत कर देते किन्तु यह कार्य होने से पूर्व ही सम्भराथल पर पहुंचकर ज्ञान गंगा में स्नान करने से अग्नि शीतल हो गई और वापिस अपने घर को लौट गए चिट्ठी भी नहीं टूटी और सांप भी मर गया”  

जब से जम्भदेव जी ने दिव्य पवित्र भूमि सम्भराथल के ऊपर ही अपना आसन जमाया तभी से पीपासर का पशु गऊ आदि वहीं सम्भराथल के आसपास ही अधिक घास खाने के लिए मंडराने लगा था ऐसा लगता था मानों कि सम्भराथल की घास में कुछ ज्यादा ही आकर्षण या मीठापन आ गया हो या उससे ही तृप्ति का अनुभव होता होगा। दिनभर का समय वन में व्यतीत निश्चित भाव से गऊवें किया करती थी किन्तु सांय समय में तो अपने प्रिय बछड़ों की याद उन्हें सताती थी तथा जल की प्यास भी तो लग जाया करती थी।

तब वे गऊवें वहां से तीव्र गति से रवाना होकर अति शीघ्र ही। पीपासर के कुवे पर पानी पिया करती थी फिर अपने-अपने घर बलों दूध पिलाया करती थी। यही क्रम नित्यप्रति चला करता था।    किन्तु उनके सामने नित्य प्रति जटिल समस्या पानी पीते समय आया करती थी पानी पीने की जगह तो थोड़ी हुआ करती थी किन्तु पशु आत्मिक हुआ करते थे सभी एक साथ तो जल पी नहीं सकते।

इसलिये आपस में लड़ाई-झगड़े मारपीट हो जाया करती थी। बेचारे कमजोर पश परेशान होकर सभी से पीछे खड़े होकर प्रतीक्षा किया करते थे। सदा के लिये इस झंझट को देखकर जम्भदेव जी ने पशुओं को भी सैनी से समझाया कि इस प्रकार से लड़ाई-झगड़े अच्छे नहीं हुआ करते। ये लड़ाईयां तो मूर्ख मनुष्यों का काम है। तुम तो समझदार पशु हो मेरी आज्ञा का पालन करते हो। इसलिये कल से मैं जिसको आज्ञा दूंगा वही पहले जल पीयेगा।

दूसरे रोज से यही कार्यक्रम प्रारम्भ हो गया जितनी अंगुली उठाते, उतने ही पशु पहले जाकर पानी पीते पीछे को लाईन लगाये खड़े रहा करते जब तक हाथ का इशारा प्राप्त नहीं करते तब तक कोई भी पशु आगे नहीं बढ़ पाता था इसी प्रकार से गांव के सभी पशु शांति से जल पीकर आनन्दित होने लगे।   एक दिन मेड़ते का राव दूदा पीपासर के कुवे पर तम्बू लगाकर बैठा हुआ सन्ध्या उपासना कर रहा था। दूध विपत्ति में फंसा हुआ था।

क्योंकि उसको बड़े भाई बरसिंग ने देश निकाला दिया था। मेड़ते से चलकर बीकानेर अपने बड़े भाई बीका की शरण में शायद जा रहा होगा बीच में पीपासर के कुवे पर साथियों सहित अपने दुर्भाग्य को कोसता हुआ परमात्मा से प्रार्थना करने में संलग्न था। किन्तु उसी समय ही जम्भदेव जी द्वारा इस प्रकार से पशुओं का जल पिलाना देखकर आश्चर्यचकित रह गया और अकस्मात मुख से निकल पड़ा कि अचम्भा है। दूदे ने अपना भाग्य अजमाना चाहा था किन्तु वहीं पर इतने लोगों के सामने हिम्मत नहीं पड़ सकी। विचार किया कि एकान्त में ही मिलना अच्छा होगा।

इसी विचार से तुरन्त पूजा-पाठ समाप्त किया ही था उसी समय ही ज्योंही पशु वन में जाने के लिये वहां से रवाना हुए त्योंहि जम्भदेव जी भी उनके पीछे पीछे वहां से चल पड़े तब दुदे ने सोचा अब मोका अच्छा है थोड़ी दूर ओर वन में जाने दिया जाय वहीं पर अचंभे जी से भेंट करूंगा। अपने जीवन का लेखा जोखा पूछूंगा।   अच्छी घोड़ी ऊपर सवार होकर दूदा वहां से रवाना हुआ ही था कि अब तो नजदीक ही जा रहे हैं आराम से पहुंच जाऊंगा किन्तु ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये त्यों-त्यों बीच का फासला भी बढ़ता ही गया।

ददे ने सोचा कि हो सकता है घोड़ी आज बहुत ही धीरे चल रही है तब घोड़ी के चाबुक लगाया तो घोड़ी छलांग लगाने लगी जितनी दौड़ सकती है, उतना जोर लगा लिया किन्तु बीच की दूरी कम न हो सकी। दूदा नीचे उतर गया घोड़ी को पीछे खींच लिया और जूते खोल दिये दोनों हाथ अंगोछे से बांधकर जब कुछ दूर तक पीछे भागा तब जम्भदेव जी अति निकट ही सम्भराथल पर बैठे दिखायी दिये।    

वहां पर जम्भदेव जी दूदे को भगवे वस्त्र पहने हुए दिखाई दिये दूदे ने हाथ जोड़कर साष्टांग प्रणाम करते हुए आदेश कहा और विनती करने लगा कि मैने अपने अभिमान के द्वारा सच्चे स्वामी को प्राप्त करना चाहा था किन्तु अब मुझे पता चला है कि उस परम पुरुष की प्राप्ति के लिये तो निरभिमानी ही होना पड़ेगा। हे प्रभु! मैं आपसे क्या कहूं आप तो स्वयं मेरी स्थिति जानते हैं। मेरी आशापूर्ण कीजिये मैं आपका दास हूं।

तब जम्भदेव जी ने कहा कि तुम वापिस जाओ तुम्हें तुम्हारा राज्य वापिस मिलेगा तुम्हारा भाई तुम पर प्रसन्न हो जायेगा। इसके प्रमाण रूप में तुम्हें नागौर के उत्तर दरवाजे पर दो सुनहरी घोड़ी तुम्हें मिलेगी उन्हें अपने पास रख लेना तथा मुंडवे के तालाब पर तुम्हें सोने की मोहरें से भरे हुए चार चरू मिल जायेंगे उसी को लेकर वापिस अपने राज्य में पहुंचो और निष्कटंक राज्य करो, यही मेरी आज्ञा है तब राव दूदा हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा  

                                                      * छन्द *

                                    पाघ मेल्हरू चरन पकरेह, दे मन्त्र सिष कीजिये।

                                   कृपा रावरि पाऊं अटल पद, देख दशरन जीजिये।।

                                    देहू भेष अलेख मो कहं, जगत में जश लीजिये।

                                   पर्शेऊ जम्भ नरेश फिर कारी, भेष मोरा राखिजिये।।

  इस प्रकार से अपनी सिर की पगड़ी जम्भदेव जी के चरणों में रखकर बार-बार विनती की और कहा कि आप मुझे अपना भगवा भेष तथा अन्य कोई भेंट दीजिये वे मेरी पूजनीय वस्तु होगी मैं सदा ही उनको सामने रखकर आपकी आज्ञा से ही राज्य करूंगा। तब जम्भदेवजी ने अपना भगवा वस्त्र तथा एक केर की लकड़ी देते हुए कहा कि यही तुम्हारे लिये तलवार-खांडा हो जायेगी। इसी को सामने रखकर मर्यादा नीति से राज्य करना तुम्हारा राज्य अविचल रहेगा।

इस प्रकार से विदाई लेकर दूदा मेड़तियां वापिस अपने राज्य में पहुंचा था और बहुत काल पर्यन्त राज्य भी किया था। कहते हैं कि वही दूदे को दी हुई काठ मूंठ की तलवार ही अब रोटू ग्राम के मन्दिर में रखी हुई है जो दर्शनीय है।

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