अजब हैरान हूं भगवन!
तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं ।
कोई वस्तु नहीं ऐसी,
जिसे सेवा में लाऊं मैं ॥
करें किस तौर आवाहन कि,
तुम मौजूद हो हर जां ।
निरादर है बुलाने को,
अगर घंटी बजाऊं मैं ॥
तुम्हीं हो मूर्ति में भी,
तुम्हीं व्यापक हो फूलों में ।
भला भगवान पर,
भगवान को कैसे चढाऊं मैं ॥
लगाना भोग कुछ तुमको,
यह एक अपमान करना है ।
खिलाता है जो सब जग को,
उसे कैसे खिलाऊं मैं ॥
तुम्हारी ज्योति से रोशन हैं,
सूरज-चांद और तारे ।
महा अन्धेर है कैसे तुम्हें,
दीपक दिखाऊं मैं ॥
भुजाएं हैं। न गर्दन है,
न सीना है न पेशानी ।
तुम हो निर्लेप नारायण,
कहां चंदन लगाऊँ मैं ॥
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बड़े नादान है वे जन,
जो गढ़ते आपकी मूरत ।
बनाता है जो सब जग को,
उसे कैसे बनाऊँ मैं ॥
अजब हैरान हूं भगवन!
तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं ।
कोई वस्तु नहीं ऐसी,
जिसे सेवा में लाऊं मैं ॥
अजब हैरान हूं भगवन!
तुम्हें कैसे रिझाऊं मैं ।
कोई वस्तु नहीं ऐसी,
जिसे सेवा में लाऊं मैं ॥








