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सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 1

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 1

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 1
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 1

    सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र ने त्रेतायुग का प्रतिनिधित्व किया था। इनके पिता त्रिशंकु नाम के राजा थे। इन्हीं त्रिशंकु ने अपनी परम्परा का धर्म छोड़कर विश्वामित्र को गुरु धारण कर लिया था। उसे सशरीर स्वर्ग जाने का लोभ था। इसलिए अपनी परम्परा के गुरु वशिष्ठ को त्याग दिया था। विश्वामित्र को गुरु बना लिया था।

विश्वामित्र ने तपस्या के तेज से त्रिशंकु को ऊपर उठाया। उधर स्वर्गवासी देवताओं ने देखा कि मृत्युलोक का दुर्गन्धी वाला प्राणी आ रहा है। देवताओं ने वापिस नीचे धकेला। विश्वामित्र ने ऊपर उठाया त्रिशंकु न ही ऊपर जा सका और न ही नीचे आ सका बीच में ही लटक गया।    

जो अपने निजधर्म को छोड़कर दूसरों के धर्म अपनाता है उसकी यही गति होती है। उसी त्रिशंकु का पुत्र हरिश्चन्द्र त्रेता युग में अपने पिता के राज्य का अधिकारी बना। हरिश्चन्द्र ने धर्मनीति से प्रजा का पालन किया।    

एक समय देव ऋषि, दानव, मानवों की विशेष धर्मसभा हुई जिसमें विचार रखा गया कि मानवों के लिए विशेष आचार संहिता-नियम निर्धारित किये गये हैं। उन नियमों में से एक विशेष नियम है कि सत्य बोलो। इस नियम का पालन होना अति कठिन है या ऐसे कहे की असम्भव है। मानव होकर इस नियम का पालन कर सके, यह कहना ही असत्य कहना है ।

यदि इस नियम का पालन नहीं हो सके तो, आचार संहिता से यह नियम निकाल दिया जाए, ऐसी कुछ वार्ताएं विश्वामित्र ने बड़े ही गर्व से कही। उसी सभा में वशिष्ठ जो भी बैठे हुए थे, वशिष्ट ने खड़े होकर विश्वामित्र की बात का खण्डन करते हुए कहा- हे राजर्षि यह बात आप न करे। आपको ऐसी बात शोभा नहीं देती।

मेरा शिष्य सत्यवादी हरिश्चन्द्र है, वह इस समय अयोध्या का राजा है। वह सत्य ही बोलता है, सत्य का ही पूर्णरूपेण आचरण करता है। हरिश्चन्द्र जैसे पुण्यात्मा इस धरती पर ही निवास करते हैं, जिनकी वजह से यह धरती टिकी हुई है।   विश्वामित्र कहने लगे- यह कैसे हो सकता है कि वशिष्ठ का शिष्य हरिश्चन्द्र पूर्णतया सत्य का पालन करता है।

जब तक परीक्षा में पास न हो जाये तब तक मैं कैसे स्वीकार कर सकता हूँ, जब तक सोने को तपाकर न देखे तब तक खरे-खोटे का पता नहीं चलता। इस बात को विश्वामित्र ने भरी सभा में कहा-मैं अभी जाऊंगा और हरिश्चन्द्र के सत्य की परीक्षा करूंगा। जैसे तैसे ही सत्य से डिगाउंगा सोने को तपाउंगा।

अनेकों कष्ट दूंगा, कष्टों में भी सत्य को न त्यागे, तभी मैं स्वीकार करूंगा, इससे मैं सत्यवादी की महिमा को बढ़ाउंगा। परम धर्म सत्य को हरिश्चन्द्र के द्वारा उजागर करूंगा ऐसा विचार करते हुए विश्वामित्र सभा से प्रस्थान कर गये तथा वहाँ की सभा भी विसर्जित हो गयी।    

राजा हरिश्चन्द्र अपने राज्य में रहते हुए नियम का पालन कर रहे थे उसी समय ही एक सेवक समाचार लेकर आया। राजा ने आने का कारण पूछा। सेवक ने बतलाया कि आपके बगीचे में एक जंगली जानवर प्रवेश कर गया है। हमने उसे भगाने की बड़ी कोशिश की है। वह तो बड़ा ही भंयकर सुअर मालूम पड़ता है, निकलता ही नहीं है । सम्पूर्ण बाग का विध्वंश कर दिया है। आप शूरवीर शासक प्रजापालक है, उससे हमारी तथा आपके बगीचे की रक्षा कीजिए, हम आपकी शरण मे हैं।      

राजा हरिश्चन्द्र ने शस्त्र तैयार किया और घोड़े पर सवार होकर उस सुवर को अपनी सीमा से बाहर भगाने हेतु प्रस्थान किया। सुवर ने राजा को आते हुए देखकर वन में भागना प्रारम्भ किया। आगे सुवर-पीछे हरिश्चन्द्र।   Must read : 

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  वह सुवर घने वन में राजा को ले गया और स्वयं अन्तर्ध्यान हो गया। राजा ने देखा कि न तो वहां सुवर है और न ही अपने राज्य की सीमा, मार्ग तथा दिशा का ही ज्ञान है । घने वन में राजा अकेला हो गया। राज्य का कुछ पता नहीं है, किधर से आये और कहाँ जाये। राजा स्वयं बेहाल हो गया। भूख-प्यास भी सताने लगी।

उसी समय वही सुवर जो स्वयं विश्वामित्र थे, एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में सामने प्रकट हुए। वृद्धावस्था के कारण हाथ पैर कांप रहे थे।    हरिश्चन्द्र ने देखा कि यह दुर्बल काया वाला वृद्ध ब्राह्मण अति दीन दुःखी है। साथ में अन्य कोई सहायक नहीं है, किन्तु एक कन्या पीछे चली आ रही है। यह बेचारी कन्या इसका क्या सहयोग करेगी।    

हरिश्चन्द्र ने पूछा- हे ब्राह्मण! आप इस निर्जन वन में कहाँ से आ रहे हैं?आपके पीछे-पीछे चलने वाली यह कन्या क्या आपकी बेटी है? जो इस प्रकार वृद्धावस्था में आपको प्राप्त हुई है। क्या इसी वजह से ही आप दुःखी हो रहे हो? क्या इसके माता-भाई, बन्धु आदि नहीं है। आप ही केवल मात्र सहारे हैं।    

वृद्ध ब्राह्मण ने लम्बी-लम्बी श्वासें खींचते हुए, अपने भाग्य को कोसते हुए राजा की बात को स्वीकृति प्रदान की और कहा कि-हे महाराज ! मैं आप से अपने दुर्भाग्य के बारे में क्या कहूँ? मैं कंगाल हूं, मेरे पास धन नहीं है। इस संसार में जो कंगाल की दुर्गति होती है उसे आप नहीं जानते।

आप तो राजपुत्र हो, आप क्या जाने धनहीन व्यक्ति की दुर्दशा को इस कन्या का विवाह लग्न तय कर दिया है, विवाह का समय आ चुका है, बिना धन के मैं कन्या दान कैसे करूं? यदि यह समय व्यतीत हो गया तो मेरी बेटी आजन्म कुंवारी हो रह जायेगी। हम तो इसी प्रयोजन हेतु आपके पास ही आ रहे थे। अच्छा हुआ कि आप यहीं मार्ग में मिल गये, अब आप जैसा चाहे वैसा करे, आप स्वयं ही समर्थ है।    

राजा हरिश्चन्द्र ने कहा-हे याचक अब जल्दी करो, मुझे भूख प्यास लगी है, वापिस नगरी में भी जाना है, पहले मैं कन्यादान करूंगा, फिर अन्न जल ग्रहण करूंगा इस विपत्ति काल में जो कुछ भी तुम मांगोगे, वही मैं तुम्हें दूंगा, ना नहीं कहंगा। उसी समय ही विश्वामित्र तुरंत अपनी विद्या द्वारा वहाँ पर दूल्हा बन गये तथा स्वयं ही पुरोहित बनकर, लकड़ियां चुनकर अग्निदेव को प्रज्वलित किया और हवन करने के लिए बैठ गये। वेद मंत्र पढ़कर अग्नि की परिक्रमादिक सभी कार्य सुचारू रूप से सम्पन्न करवा दिए।    

उस पुरोहित ने कहा- अब कन्यादान की शुभ वेला है, इस समय हे राजन्। आप हमारे यजमान है, कन्या दान करें तथा पुण्य का भागी बनें। हरिश्चन्द्र ने स्वाभाविक रूप से कहा- यह कन्या एवं वर दोनों जो कुछ भी मांगेगे वही मैं अवश्य ही दूंगा। आप नि:संकोच होकर मांगिये। मैं अवश्य ही आपकी भावना पूरी करूंगा। मै स्वयं न जाने क्या दूं? आप लोग पता नहीं क्या चाहते हैं ? आवश्यकता के अनुसार दिया हुआ दान ही सात्विक होता है।    

उसी समय दूल्हा-दुल्हन ने राजा से छल किया और सम्पूर्ण राज्य ही मांग लिया। उन्होनें कहा-जहाँ तक आपके राज्य की सीमा है वहां तक राज हमें दे दीजिए और अपने वचनों को सत्य कीजिये। हरिश्चन्द्र न हो कहते हुए देना स्वीकार किया और कहा- मेरे राज्य में चलो, वहीं पर मैं भी सभी कुछ दूंगा। इस समय में भूख-प्यास से बेहाल हूँ, मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है।

वहाँ पर चलने से ही तुम्हारा राजन सिद्ध हो सकेगा। ऐसा कहते हुए उन सभी को अपने साथ अयोध्यानगरी में ले गये वहां जाकर न अन्न जल ग्रहण किया राजा सचेत हुए, किन्तु अब क्या हो सकता था, वह तो स्वप्न जैसी बात हो गयी थी।  

उन पुरोहित, वृद्ध बाह्मण तथा वर वधू ने राजा से कहा- अब राजन् देर नहीं कीजिये, अपने वचनों का पूरा कीजिए आप हमें अतिशीघ्र खजाने की चाबो, राजपाट सम्पूर्ण धरती धन धान्य है वा सभी कुछ सौंप दीजिये अथवा अपने वचन असत्य कर दीजिये। हम ज्यादा आपकी प्रतीक्षा नहीं करेंगे। राजा ने सही राजखजाने की चाबी उनके हाथ सौंप दी और सम्पूर्ण राज्य का दान कर दिया।

दान करके उनके ऋण में उऋण हो गये।   उसी समय पुरोहित ने कहा- हे राजन् ! आप ही तो हमारे यजमान कन्या दानदाता है, इतना बड़ा दान आपके सिवाय कौन कर सकता है, आप महादानी सत्यवादी हैं। मैनें पुरोहित कार्य किया है किन्तु मझे दक्षिणा नहीं मिली है। आप मुझे दक्षिणा तो अवश्य ही दोगे, क्या बिना दक्षिणा के ही पुरोहित से कार्य करवा लिया? आपसे ऐसी आशा नहीं थी। अब तक तो ज्यादा देर नहीं हुई है क्षमा किया जा सकता है,अब आप मुझे श्रद्धानुसार दक्षिणा दीजिये।    

हरिश्चन्द्र ने कहा-हे पुरोहित् ! अब तो आप इस राज खजाने से ही दक्षिणा ले लें, मेरे पास तो अव देने को कुछ भी नहीं है। पुरोहित ने कहा हे राजन्! आप जैसे धर्मज्ञ राजा को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। जब आपका राज ही नहीं रहा तो आपको उसमें से देने का अधिकार ही क्या है? आपने स्वयं ही वर वधू को सम्पूर्ण राज दान कर दिया है तो फिर दुवारा दान कैसे किया जा सकता है?

अब तो आपको अपने पास से ही दान देना होगा। आप दोगे तो हम लेंगे अन्यथा आप झूठे हो जाआगे आज से आपको सत्यवादी कहलवाने का कोई हक नहीं होगा। हम तो अपना गुजारा कहीं अन्यत्र कर लेंगे किन्तु आपके लिए यह बहुत ही अपमान जनक होगा।      

हे पुरोहित! मुझे यह बतलाओ कि आपकी दक्षिणा के रूप में मुझे क्या देन होगा? मैं आपकी दक्षिणा पूरी करने में समर्थ हूँ या नहीं। पुरोहित ने बतलाया कि सेवा सेर सोना कम से कम आपको मुझे देना ही चाहिये। इतने सोने की मुझे आवश्यकता भी है, घबराएं नहीं राजन् आपने इतना बड़ा दान किया है तो  दक्षिणा भी तो उतनी ही बड़ी होनी चाहिए। बड़े दान की बड़ी ही दक्षिणा।      

हरिश्चन्द्र ने कहा- आप हमारे खजाने से दक्षिणा ले लीजिये। पुरोहित ने टोकते हुए कहा-हरिश्चन्द्र! यह तुम फिर भूल कर रहे हो। अव तुम्हारा खजाना भी कहाँ रहा, यह तो तुम पहले ही दान कर चुके हो यदि तुम्हारे पास अपनी निजी कमाई से कुछ राज खजाने में अलग रखा है तो उसमें से दे दो। मैं अवश्य ही स्वीकार करूंगा। अन्यथा मैं तो जाता हूँ और आप सत्यवादी नियम से भ्रष्ट हो रहे हैं।

यदि नियम में बंधकर रहना है तो सत्य का पालन करें। आप झूठ बोलने का पाप मत उठाये। आप जैसे सत्यवादी से ऐसी आशा नहीं की जा सकती।   हरिश्चन्द्र ने कहा- है रोहित! अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं है। अपना निजी तो यह शरीर ही है, आप इसे ही बेच डालिये किन्तु झूठ बोलने के कलंक से बचाईये। मैं सत्य नहीं छोड़ूंगा, असत्य का कलंक नहीं लगाउंगा।

मेरे रग-रग में सत्य-धर्म प्रवेश कर गया है। अब मैं इसे कैसे बाहर निकालू। प्राणों का बलिदान देकर भी सत्य धर्म की रक्षा करूंगा।   सत्य-धर्म के लिए अब मुझे प्रिय पुत्र रोहिताश्व तथा धर्मपत्नी तारादेवी को भी बेचना होगा। अन्यथा इतने सोने की दक्षिणा पूरी कैसे कर पाउंगा? मैं इस धर्मसंकट में फंस गया हूँ,

अपना स्वयं का ही बलिदान मैं दे सकता हूं, दूसरों का जीवन अधिकार छीनने का मुझे किसी प्रकार का हक नहीं है। उनकी इच्छा के बिना मैं उन्हें कैसे बेच सकता हूँ, पहले उनसे पूछ तो लूं वे क्या कहते हैं? अपनी धर्मपत्नी तारादेवी एवं पत्र रोहिताश्व से हरिश्चन्द्र ने कहा- मेरा राज्य दान में चला गया है,

अब मैं राजा नहीं रहा, इसलिए हे देवी तुम रानी कैसे हो सकती हो और तुम्हारा प्रिय पुत्र राजकुमार नहीं रहा, इस समय हम सभी सामान्य प्रजा हैं। अब आप लोग मेरे से सुख की उपेक्षा न करें। मैं तुम्हें किसी प्रकार का सुख नहीं दे सका। अब तो दुःख की घड़ी आने वाली हैं।आपने सुख में तो मेरा साथ दिया किन्तु अब आने वाले दुःख में भी साथ दोगे या नहीं….?  

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 2

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