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सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 4

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 4

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 4
सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 4

मुझे मारने से यदि धर्म बचता है तो आप मेरे से भी धर्म की कीमत ज्यादा समझिये। यदि आपके पास धर्म मौजूद रहेगा तो सत की बांधी लक्ष्मी फिर मिल जायेगी। धर्म चला गया तो सभी कुछ चला जायेगा। मुझे खुशी है कि मैनें धर्मरक्षार्थ प्राणों का बलिदान दे दिया। वे ही नर धन्य जो धर्म की रक्षा करते हैं। जीव तो पुनः मिल जायेगा किन्तु धर्मपालन का अवसर बार-बार नहीं मिलेगा।    

आप अतिशीघ्रता कीजिये, अपने धर्म का पालन कीजिये। आप कहीं मोहित न हो जाईये। मुझे इस बात का डर है कि कहीं मोहवश होकर धर्म का त्याग ही न कर दें। इस लिए मैं शीघ्रता के लिए कह रही हूँ।  

जिस समय हरिश्चन्द्र ने खड़ग उठाया कि अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करूं । विचार किया- मैं धन्य हूँ, जो मेरे धर्म की रक्षा करने में सहायक मेरी धर्मपत्नी आज मुझे स्वयं ही धर्म रक्षा का उपदेश दे रही है। यदि मेरी पत्नी, बेटा मुझे सहयोग न देते तो मैं कभी का फेल हो गया होता। धन्य हो देवी तारा! तुमने इतने कष्ट सहन किये।

मैं तुम्हें कुछ भी सुख न दे सका, मैनें अपनी पत्नी-बेटे को क्या दिया? इस देवी ने महान से भी महान दुःख झेला है, किन्तु कभी भी किसी प्रकार की शिकायत नहीं की। सभी कुछ अपने ही कर्मों का फल माना है। आज इस विषम परिस्थिति में मुझे डर था कि कहीं धर्म न छोड़ जाये। किन्तु अब मैं इस देवी की उदारता, धर्मपरायणता से प्रसन्न हो गया हूँ।      

अब तो भगवान ही इसकी रक्षा करे, मेरे वश की बात नहीं है। यह भयंकर खड़ग अब ही इसका जीवन छीन लेगा। एक की जगह दोनों माँ-बेटा को मरा हुआ देखूगा, कौन ऐसा बाप होगा जो इस प्रकार का दृश्य देखकर जीवित रहेगा। भले ही मुझे जीवित न रहना पड़े, किन्तु धर्म मुझे प्राणों से भी प्यारा है। पूर्णता से धर्म पालन करने का समय अब आ चुका है। परमात्मा मेरी रक्षा करे।    

ऐसा विचार करते हुए हरिश्चन्द्र ने अपनी भार्या को मारने के लिए खड़ा उठाया, वार करने की तैयारी की। ज्यों ही वार करने लगे त्यों ही जगत के पालन पोषण कर्त्ता भगवान विष्णु अकस्मात् प्रकट हुए और हरिश्चन्द्र का हाथ पकड़ लिया।  

भगवान ने कहा- हे वत्स! ऐसा ना करो? यह तुम्हारी परीक्षा थी, पूर्ण हो गयी है। अब तुम दास नहीं रहे तथा तारा दासी नहीं रही। यदि तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है तो देखो…….. तुम्हारे मृतपुत्र को मैं अभी जिन्दा कर देता हूँ। ऐसा कहते हुए भगवान ने कमण्डल से जल लेकर रोहिताश्व पर पानी छिड़का और कहा- बेटा! खड़े हो जाओ। अब तुम्हारी निद्रा समाप्त हो चुकी है।

आप तीनों ही प्राणी वापिस अपनी अयोध्या नगरी में जाओ। प्रजा आपकी प्रतीक्षा कर रही है। यह तो सभी कुछ विश्वामित्र का नाटक था। आप परीक्षा में उत्तीर्ण हुए हो।  

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उसी समय ही वहाँ पर विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषिगण तथा देवता-मानवादि सभी उपस्थित हुए। सभी ने भगवान के वचनों का ही समर्थन किया। विश्वामित्र ने माफी मांगी तथा कहा- हे राजन! आप अब वापिस लौटिये? आप जैसे सत्यवादी राजा की आवश्यकता है। मैंनें आपको सत्य से डिगाने के लिए अनेकों उपाय किये किन्तु आप सत्य पर दृढ़ रहे।

मैं आज से घोषणा करता हूँ कि इस मृत्युलोक में नर नारी भी पूर्णतया सत्य का पालन करने में समर्थ है। सत्य नियम शाश्वत है, इसे हटाया नहीं जा सकता. पालन किया जा सकता है। यह नियम ही सभी नियमों का मूल आधार है। ऐसे आधार को त्यागा नहीं जा सकता।  

भगवान विष्णु ने कहा- हे हरिश्चन्द्र! मैं तुम्हारे पर बहुत ही प्रसन्न हूँ क्योंकि तुमने अनेकों कष्टों को सहन करते हुए भी मेरी बनाई हुए मर्यादा को भंग नहीं किया। ऐसा भक्त ही मुझे अतिप्रिय है ऐसे भक्तों को मैं सर्वस्व देने के लिए तैयार हूँ। हे हरिश्चन्द्र ! तुम कुछ मेरे से अवश्य ही मांगो? विना कुछ दिए मुझे यहां आना अच्छा नहीं लगता।  

हरिश्चन्द्र ने कहा- हे प्रभु! मुझे अपने धर्म के लिए कुछ भी नहीं चाहिये। आप मुझे ऐसी शक्ति प्रदान कीजिये जिससे मैं आपकी भक्ति करते हुए धर्म मर्यादा पर अडिग रह सकू और यदि आप प्रसन है तो मेरे यहाँ आने के पश्चात मेरी प्रजा बहुत दुःखी हो गयी है, उन्हें प्रसन्न कीजिये।   हे प्रभु! पुनः आपसे प्रार्थना है कि इस प्रकार का भयंकर दुःख किसी अन्य को मत दीजिये ।

वह कष्ट सहन नहीं कर पायेगा, टूट जायेगा। यदि दुःख की अधिकता है तो सम्पूर्ण दुःख आप मुझे दे दीजिये,किन्तु मेरी प्रजा को नहीं। मैं आप से मिल सकूँ। जन्म मरण का बन्धन काट सकूं, किन्तु अकेला नहीं, मेरी सात करोड़ प्रजा का भी उद्धार होवे, ऐसा वरदान दीजिए।    भगवान बोले हे राजन! तुम्हारे में भक्ति भाव तो पूर्णरूपेण पहले से ही विद्यमान है।

हे वत्स ! इस भक्ति की वजह से ही तो तुमने सत्य का पालन करते हुए कष्ट उठाये हैं, किन्तु दुःखों की किंचित भी परवाह नहीं की। यह भाव आगे भी बना रहेगा। तुम्हारी कुल परम्परा में आने वाले सभी भक्त शूरवीर पैदा होंगे, जो यश कमायेंगे और प्रजा का पालन करेंगे।    

हे भक्त! तुम स्वयं परोपकारी हो, दूसरे के दुःख को देकर पिघल जाते हो। यही तुम्हारी महत्ता है और बनी रहेगी। यदि तुम्हें किसी प्रकार का दुःख आयेगा तो भी तुम ज्ञानी हो उस दुःख को दुःख ही नहीं समझते। ऐसा ज्ञान तुम्हारा सदा स्थिर रहेगा इस समय तो तुम वापिस राज्य में जाओ, प्रजा का पालन करो। दुबारा तुम्हारा जन्म-मरण नहीं होगा भगवान के बैकुण्ठ लोक में मेरे पास ही निवास करोगे। अथवा भगवान के पार्षद ही बन जाओगे या भगवान की स्वरूपता ही ग्रहण कर लोगे।    

इसकी तुम चिंता मत करो, मै स्वयं ही तुम्हारा उद्धार करूंगा तुम्हारी प्रजागण धीरे-धीरे सम्पूर्ण त्रेतायुग में उद्धार को प्राप्त हो जायेगी। अब तुम इस समय धर्म की स्थापना हेतु कलश की स्थापना करो। जिस-जिस को तुम मर्यादा का जल पाहल पिलाओगे वे तुम्हारे अनुयायी-शिष्य हो जायेंगे। हो सकता है उन्हें-दो चार जन्म अभी और भी लेने पड़ सकते हैं। जैसी जिसकी योग्यता है वैसा ही फल मिलेगा, किन्तु मैं तुम्हे यह भरोसा दिलाता हूँ कि तुम आगे पंहुचो, तुम्हारे पीछे ये तुम्हारे अनुयायी शीघ्र ही चले आयेंगे।  

राजा सदा ही अग्रगण्य होता है। यथा राजा तथा प्रजा। तुमने जिसको भी अपना बना लिया जिसके भी सिर पर हाथ रख दिया वह निश्चित ही तुम्हारा हो जायेगा। ऐसा कहते हुए भगवान विष्णु अन्तर्ध्यान हो गए। वहाँ का सम्पूर्ण दृश्य विलुप्त हो गया भगवान की आज्ञा शिरोधार्य मानकर हरिश्चन्द्र अपनी पत्नी पुत्र सहित वापिस अयोध्या पँहुचे |

शरीर पुनः हष्ट-पुष्ट हो गया। पीछे की सभी बातें विस्मृत हो गयी। मात्र एक खेल था जो पूरा हुआ। प्रजा ने अपने राजा को पाकर स्वागत किया। हरिश्चन्द्र ने ही प्रहलाद द्वारा स्थापित कलश की त्रेतायुग में पुनः स्थापना की।    गुरु जाम्भोजी ने बतलाया कि हरिश्चन्द्र के अनुयायी जो सात करोड़ थे उनका उद्धार हुआ। इस प्रकार से सत त्रेता दोनों युगों में पांच-सात मिलाकर 12 करोड़ का उद्धार हुआ। ये अद्भुत बात जा अन्यत्र दुलम है, गुरु जाम्भोजी ने बतलायी है।

सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र भाग 1

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