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श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 2

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 2

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 2
श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 2

 उसी समय घर में एक योगी ने प्रवेश किया। हांसा ने देखा- हाथ में डमरूं, जटाजूट धारी, माला जपता है वह दिगम्बर वेशधारी। हांसा ने सामने जाकर स्वागत किया। आइये महाराज! आइये! हम आपकी क्या सेवा करें? भोजन दुग्धादि ग्रहण करके हमें कृतार्थ करें। हम गृहस्थ हैं। आप हमें अपना धर्म निभाने का सुअवसर प्रदान करें।

 आप कौन हैं? आप कहीं स्वयं भगवान विष्णु, ब्रह्मा या शिव तो मेरे घर पर योगी के रूप में नहीं आ गये हैं। यदि ऐसा है तो आज बड़ी धन्य भागी हूँ मैं आज कृतार्थ हो गयी हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया।

भगवान शिव बोले- ऐसा ही है! तेरे घर पर तो इस समय तीनों देवता आ गये हैं। यह जो तुम्हारा बालक है वह तो साक्षात् सृष्टि का पालन-पोषण कुत्ता भगवान विष्णु है। इस समय तुम्हारे पतिदेव लोहटजी तो ब्रह्मा के रूप में है और तुम्हारे सामने खड़ा मैं स्वयं शिव कल्याणकारी हूँ। इन तीनों को हे देवी! तूं प्रत्यक्ष देख! हे ब्रह्माणी ! तुम तो स्वयं मायास्वरूपा हो। भगवान विष्णु स्वयं कुछ नहीं करतें। वे तो वेमाता-ब्रह्मा से जैसा चाहते हैं वैसा कार्य करवा लेते हैं।

पूर्व में बहुत बार भी भगवान ने ऐसे ही नये-नये असंभव अनहोने रूप धारण किये थे जैसे नृसिंह, वराह, कच्छ, वामन इत्यादि। मैं तो स्वयं आश्चर्यचकित हूँ कि भगवान न जाने कैसे-कैसे विचित्र अवतार लेते हैं। अच्छा है! इस बार तो तुम्हें अपनी माता स्वीकार किया है। मैं देखता हूँ तुम्हारे लाला को कि ये तो मानव रूप में ही है। यह तुम्हारा बेटा तो सुन्दरता में तो राम-कृष्ण से भी अधिक है। यह मरुदेश कुछ विचित्र था किन्तु अब तो वृन्दावन-अयोध्या बन गया है।

यह स्वाभाविक ही है कि नवजात शिशु कुछ खाये पीये नहीं तो माता-पिता परिजनों को चिंता होगी ही। घर में सभी कुछ पदार्थ विद्यमान हो किन्तु भूख ही न लगे तो फिर सभी पदार्थ व्यर्थ है। इसलिए हे देवी! तुम्हें भी अच्छा नहीं लगता, बिना दुग्धपान किये बच्चे का रहना। मेरा बेटा अधिक दूध-मक्खन खाये, जल्दी बड़ा हो जाये।

मैं तुझे बतला देता हूँ कि यह साधारण बालक नहीं है। अभी द्वापर में कृष्ण ही थे वे ही तुम्हारे आये हैं। उस समय ब्रजभूमि में गायें चराते हुए माँ यशोदा तथा अन्य गोपियों के प्रेम की अधिकता के कारण दूध, मक्खन, दही, मलाई आदि पदार्थ कुछ ज्यादा ही जीम लिये थे, अब तक तो वही नहीं पच पाये हैं। उस समय ज्यादा जीम लेने से इस समय व्रत करना पड़ेगा।

यह तो प्रकृति का नियम है कि पहले ज्यादा खा जाओ तो फिर खाना-पीना बंद, उपवास करो और क्या इलाज है। यही कह रहे हैं क्योंकि इस जन्म में ये भोजन-पान नहीं करेगे, निराहारी रहेंगे इस बात को तुम सत्य जानो। हांसा हाथ जोड़े खड़ी योगी की बात सुनती रही, बीच में कुछ भी नहीं बोली।

हांसा कहने लगी- क्या मेरा बेटा कभी भोजन पानी नहीं करेगा? यदि ऐसा है तो जीवनधारण कैसे करेगा? हे योगी! मैं यह जानना चाहती हूँ कि कलयुग में अन्नमय प्राण है, तो बिना अन्न-जल के कैसे जीयेगा?

हे देवी! आप चिन्ता न करें, ये तो सभी जगत के आधार हैं। म्हापण को आधारूं हमारा तथा इनका | जीने का क्या आधार हो सकता है क्योंकि हम ही तो सम्पूर्ण सृष्टि के आधार है। हम तो परलोक के शरीरधारी हैं। हमें जो शरीर प्राप्त है यह इस लोक का नहीं है। इस शरीर को जीवित रखने के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। हमारे यहां तो जीवन आधार अमृत है। उस अमृत का हम देवता पान करते हैं।

उसी के प्रभाव से युगों-युगों तक जीते हैं। ये जो तुम्हारे पुत्ररूप में आये हैं ये अलौकिक है। इनका भोजन, रहन-सहन, कार्य-कलाप, जन्म-कर्म सभी कुछ दिव्य विचित्रता से भरे हुए हैं।

 हे देवी! आपने वृद्धावस्था में पुत्र प्राप्त किया है, आपको मोह कुछ ज्यादा ही है। मोह को छोड़कर ज्ञान की दृष्टि से देखिये तो आपको असलियत का पता चल जायेगा। ये स्वयं भगवान विष्णु ही तुम्हारे आये हैं। बारह करोड़ प्रहलाद पंथ के बिछुड़े हुए जीवों को पार उतारने के लिए। जब इनका कार्य हो जायेगा तो एक क्षण भी नहीं ठहरेंगे, आप लोग इन्हें समझ नहीं पा रहे हैं।

क्योंकि भगवान की माया बड़ी | बलवान है। भले ही आप लोग पुत्र रूप में देखिये, वह तो तुम्हारे पुत्ररूप में रहने को राजी है। वे तो सभी प्रकार से राजी है जैसा आप चाहें वैसा सम्बन्ध जोड़ें। भगवान तो स्वयं कहते हैं कि हम जगत के माता- पिता दादा-परदादा, पुत्र-पुत्री, सखा आदि रूप में विद्यमान हैं।

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ऐसा कहते हुए योगी असमित हो गये न जाने किधर गये। हांसा पीछे देखने लगी किन्तु कहाँ से आये कहाँ गये कुछ पता नहीं। पीछे पछताने लगी, मैं कैसी अज्ञानी मूढ़ हूँ। स्वयं शिव भगवान मेरे घर पर आये उनकी बातें ही बातों में उलझी रही। कुछ खाने पीने भिक्षा देने की भी सुध नहीं रही। उन्होनें तो बहुत प्रकार की भोजन की बातें ही बतलाई थी। क्या करूं मैं तो अपने लाला की चिंता में ही रही।

 हांसा ने यह समाचार लोहटजी को सुनाया तब लोहटजी ने पैरों के निशान देखे कि कौन आया था यह कैसी बातें कर रही है। यहां तो किसी के पैरों के निशान नहीं है, मैं कैसे मान लूं कि कोई योगीपुरुष आया था।

संत वचन सुन हरष अति, भई पुत्र की जान।

कछु प्रसन्न कछु चिंतन मन, हरि माया बलवान ।

 माता हांसा ने अपने प्रिय पुत्र को पीढ़े पर सुला दिया और आप स्वयं चारपाई पर सो गयी। प्रेम की अधिकता होने से माँ स्वयं पास में ही सोयी थी कहीं बालक को कछु हो न जाय। माँ नींद में भी बालक की रक्षा करती है, सचेत रहती है। न जाने कुछ क्या हो जाय। माँ को नींद कम ही आती है फिर भी नोंद तो अपना प्रभाव अवश्य ही जमायेगी। सावधान रहते-रहते नींद की एक झपकी माता हांसा को आ गयी।

 सत्वगुण सम्बन्ध होने से तो शांति रहती है, रजोगुण आने से कुछ करने की वासना जागृत होती है, उत्पादन शीलता आती है, तब नींद उड़ जाती है और तमोगुण का साम्राज्य होते ही नींद, आलस्य, प्रमाद छा जाता है। माता हंसा भी तमोगुण से आवृत्त हो गयी जिससे नींद की झपकी आ गयी।

थोड़ी देर के पश्चात जग गयी और स्वाभाविक रूप से अपने प्राणप्रिय पुत्र को देखने के लिए हाथ पीढ़े पर गया। आश्चर्य! हाथ से बालक का स्पर्श नहीं हो रहा है, पीढ़ा खाली है, क्या हो गया मेरे लाल को. कौन ले गया, उठकर देखा तो सचमुच में ही बालक पीढ़े पर नहीं है, कहीं नीचे तो नहीं गिर गया है,

पहले की तरह घर में प्रकाश भी तो नहीं है, अंधेरे में कुछ भी तो नहीं दिखता, क्या करूं? प्रकाश के लिए दीपक जलाऊं। हांसा ने दीपक जलाकर देखा घर में कहीं भी दिखाई नहीं दिया।

 तुरंत लोहटजी को जगाया। उठिये! बालक को तो कोई ले गया है, घर में नहीं है। मैनें तो पीढ़े पर सुलाया था किन्तु अब तो वहां पर नहीं है। क्या पता कोई कुता, भेड़िया उठाकर ले गया हो। लोहटजी झटपट क्रोधित होकर उठे और कहने लगे- मैं अभी देखता हूँ कौन कहां से ले गया तथा किधर गया है, अभी मैं पैरों के निशान देखता हूं जहां भी जिधर भी गया है, मैं पीछा करके पकडूंगा।

लोहटजी बड़े चिन्तित हुए कहाँ देखू क्या करूं? लोहटजी कहने लगे क्या तुमने किसी को घर में आते जाते देखा है जो आरोप लगा रही है कि कोई स्यावज बालक को ले गया। हांसा बोली- मैनें देखा तो नहीं, क्योंकि मैं तो नींद | में थी। कैसे देखती किन्तु जागने पर देख रही हूँ कि मेरा बालक नहीं है। लोहटजी ने विचार किया कि कहीं स्वप्न तो नहीं आ रहा है। कहीं मोह की आधिकता में इसकी बुद्धि भ्रमित तो नहीं हो रही है चलूं मैं स्वयं चलकर देखू । लोहटजी ने घर में जाकर देखा तो बालक पीढ़े पर सोया हुआ है।

 लोहटजी कहने लगे- अये! अंजली! इधर आकर देख यह तेरा प्यारा लाल सोया हुआ है। तूं कहती है कि कोई ले गया, आगे ऐसी व्यर्थ की बातें न किया कर हांसा कहने लगी हे पतिदेव! आप मुझे अंधली क्यों कहते हैं, आप स्वयं ही आकर देखिये ! मैनें बालक को पीढ़े पर पूर्व मुख करके सुलाया था किन्तु अब पश्चिम की तरफ मुख हो गया है। इतना यह छोटा सा बालक कैसे पूर्व से पश्चिम की तरफ हो गया,

अवश्य ही कहीं गया है या कोई ले गया है। इस समय वापिस सो गया है या कोई सुला गया है। मैं आप से सत्य कहती हूँ कि थोड़ी देर पहले यह बालक पीढ़े पर नहीं था। भगवान ही जाने इस बालक के बारे में तो, न जाने क्या-क्या आश्चर्यजनक लीला है? परमात्मा की अपार कृपा से यह अलौकिक बालक हमें प्राप्त हुआ है।

 वील्हा उवाच- हे गुरुदेव! अभी-अभी आपने कहा कि जाम्भोजी थोड़ी देर के लिए लुप्त हो गये। हांसा को भी दिखाई नहीं दिये बहुत परेशान हुई तथा लोहटजी पिता है उनको उसी स्थान पर दर्शन हुए, यह क्या लीला है, थोड़ी देर के लिए कहाँ चले गये थे तथा इस लीला से क्या शिक्षा देना चाहते हैं कृपा करके बतलायें?

नाथोजी उवाचः- हे शिष्य! असली बात तो भगवान ही जाने, क्या पता वो क्या करना चाहते हैं, किन्तु मानव तो अनुमान ही लगा सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि स्वयं जाम्भोजी विष्णु ही है, विष्णु की अर्धांगिनी भार्या लक्ष्मी है पूर्व अवतारों में विष्णु लक्ष्मी साथ रहे जैसे सीताराम, रूक्मणि-कृष्ण आदि। इस बार तो भगवान लक्ष्मी को पीछे ही छोड़ आये, साथ में आने की अनुमति प्रदान नहीं की थी।

 स्वयं जाम्भोजी ने कहा है कि त्रेतायुग में सीता मेरे साथ थी राधो सीता हनुमत पाखो, कौन बंधन धीरे।। द्वापर में रूक्मणी साथ थी-आतर पातर राही रूखमणी, मेल्हा मन्दिर भोयो। इस कलयुग में तो मैं अकेला हूं- रहा छड़ा सी जोयो इस समय तो अवधूत के रूप में ही रहूंगा, तभी मेरा कार्य पूर्ण हो सकेगा, लक्ष्मी को साथ नहीं लाये यही कारण था।

भगवान विष्णु कहाँ गये, कुछ दिनों से लक्ष्मी को सेवा का अवसर प्रदान नहीं कर रहे हैं। कहीं राजा बलि के बंधन की तरह स्वयं ही कहीं बंधन को स्वीकार तो नहीं कर लिया है। मैं जाकर देखू ऐसा विचार करते हुए लक्ष्मी जी जब सम्भराथल पहुंची। लक्ष्मी ने भगवान को विश्वभर के स्थान पर ही ढूंढ़ा, क्योंकि भगवान विष्णु का यही पुरातन स्थान है। भगवान विष्णु पीपासर में लोहट के घर पालने में सो रहे हैं।

 कहाँ लक्ष्मी यहीं पर आकर अपना आसन जमा लेगी तब तो कार्य में बाधा उत्पन्न होगी। ऐसा विचार करके स्वयं विष्णु जी लक्ष्मी से मिलने के लिए सम्भराथल पर पंहुच गये। पीछे हांसादेवी की आँखें खुल गयी। देखा, हमारे प्राणप्यारे कहाँ गये। कहीं लक्ष्मी मोहवश हमसे छीन न ले जिस प्रकार से बलि से भगवान को छीना था।

 भगवान ने लक्ष्मी को समझाया कि हे देवी! इस समय यहां तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। कुछ दिनों के लिए मैं यहाँ अवधूत योगी बन करके इस देश में विचरण करूंगा। अपना कार्य पूर्ण करके शीघ्र हो वापिस चला जाऊंगा। तब तक के लिए क्षमा करो। अब तुम वापिस प्रस्थान करो। मैं भी वापिस जाता हैं ऐसा दिव्य चरित्र भगवान ने दिखाया था।

 हांसा ने तो पूर्व परम्परा के अनुसार अपने बेटे का मुख पूर्व की ओर करके सुलाया था, किन्तु जाम्भोजी कहते हैं कि अइयो अपरम्पर बाणी हम तो तुम्हारी प्रचलित परम्परा से उपर उठकर वार्ता करते हैं। पूर्व दिशा में तो पहले भी अवतार हो चुके हैं, अब पश्चिम की बारी है।

यह जांगळ देश सदा से उपेक्षित ही रहा है, यहां न तो संतों की वाणी हे न हो कोकिल कूजती है और न ही वेद वाणी न ही यज्ञादिक शुभकर्म ही यहां दिखाई देते हैं। ऐसे देश में मैं आया हूं, यही संकेत दिया है। इसलिए तो पूर्व से पश्चिम मुख करके लेटे हैं।

मरुभूमि में चारो ओर अमावस्या ही थी, अज्ञान अंधकार का ही साम्राज्य था उस रात्रि के घने अंधकार में एक किरण प्रगट हुई थी जिस प्रकार से अमावस्या के पश्चात चन्द्रमा प्रतिदिन बढ़ता है और पूर्णिमा को पूर्ण सोलह कला से सम्पन्न हो जाता है उसी प्रकार हांसा कुमार की कला भी दिनोंदिन बढ़ने लगी। प्रतिदिन कुछ नया इतिहास चरित्र देखने को मिलता था ग्रामवासी क्या समझे भगवान की माया से आश्चर्य चकित हो जाते थे। कहते थे कि है तो कोई अचम्भा ही।

वील्हा उवाचः- हे गुरुदेव! अभी-अभी आपने कहा कि भगवान जाम्भोजी चन्द्रकला की तरह बढ़ने लगे, समय आने पर पूर्णमासी बन जायेंगे, सम्पूर्ण सोलह कलाओं से युक्त हो जायेंगे यह बात भी ठीक है किन्तु मुझे यह संदेह है कि जो बढ़ते हुए पूर्ण हो जायेंगे, वे पूर्ण होने के पश्चात क्षय को भी प्राप्त होंगे, जैसे चन्द्रमा पूर्णमासी के बाद घटना प्रारम्भ हो जाता है।

अमावस्या को बिल्कुल निश्तेज अस्तित्वहीन हो जाता है। ऐसे ही यदि विष्णु अवतार जाम्भोजी हो जायेंगे तो फिर सामान्य जन व उनमें क्या अन्तर होगा?

 नाथोजी उवाच:- हे शिष्य ! जैसा तुमने कहा है सामान्य मानव की तो यही गति है। प्रथम विकास उसके बाद स्थिर और अन्त में विनाश। किन्तु भगवान विष्णु में यह बात नहीं है। प्रथम विकास द्वितीय स्थिरता ही रहती। उनका विनाश नहीं होता। जिंहि का किसा बिनाणी उसका विनाश कैसा?

इसलिए तो भगवान तथा उनके अवतार कभी वृद्ध नहीं होते, सदा बाल्यावस्था में यति रहते है, दया धर्म थापले, निज बाल ब्रह्मचारी। बालै निरंजन गौरख जती। सदा ही बाल्यावस्था में रहने वाले गोरक्षक यति । स तु सर्वेषाम् गुरु कालेनानवच्छेदात्। वह तो सभी का गुरु है जो काल से परे है अथात् काल उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। ऐसे भगवान अपने शरीर को उतरोतर उन्नति को प्राप्त करवा रहे थे।

 लोहट जी की एक बहन थी तांतू यह ननेऊ में विवाहित थी भाई के पुत्ररत्न हुआ है, बहन को अत्यंत प्रसन्नता हुई। आज मैं भुआ हो गई हूँ, मेरे भतीजा हुआ है, उसे देखने के लिए पीपासर जाऊंगी। वह समय की प्रतीक्षा कर रही थी, वह शुभ समय आ गया। साथ में अपने पतिदेव तथा सेवकों को लेकर तातू पीपासर पहुंची। लोहट हांसा को समाचार मिला कि बहन आ रही है, उन्होंनें बहन-बहनोई की आगवाना की। सत्कार करने के बाद कुशल समाचार पूछा- भोजन जल से तृप्त किया।

 तांतू बोली- भैय्या एवं भाभीजी ! यह तो तुम्हारा बड़ा ही सौभाग्य है जो इस अवस्था में पुत्रत्न प्राप्ति हुई है। मुझे भी बहुत दिनों से भर्ती का दर्शन करने की लालसा थी। आज मैनें दर्शन किये हैं में तो कृतार्थ हो गयी। मैनें तो जन्म लेने का फल प्राप्त कर लिया है।

श्री गुरु जम्भेश्वर भगवान की बाल लीला भाग 3

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