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बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 1

बिश्नोई पंथ की स्थापना की स्थापना भाग 1

बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 1
बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 1

बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 1

नाथोजी अपने प्रिय सुयोग्य शिष्य वील्होजी के प्रति इस प्रकार कहने लगे हे शिष्य ! पूल्होजी के स्वर्ग दर्शन के पश्चात जम्भेश्वर जी समराथल पर ही विराजमान रहने लगे थे। संसार में अवतार लेकर आये हुए बहुत समय व्यतीत हो गया था उस समय वि. सं. 1542 प्रारंभ हो गया था सिद्धेश्वर जी ने चौतीस वर्ष व्यतीत कर दिये थे किन्तु प्रहलाद पन्थी जीवों के उद्धार का प्रमुख कार्य करना तो बाकी ही पड़ा था सम्भराथल पर बैठे हुए विचार मग्न रहते। समय की प्रतीक्षा कर रहे थे। समय से ही अधूरे कार्य पूर्ण हो जाया करते है।समय से पूर्व बहुत सारे कार्य पूर्ण नहीं हो पाते हैं।

मरूभूमि में उस समय महा अकाल पङा इस देश में वर्षा की तो वैसे ही कमी रहती है। इस वर्ष तो | अक्षय तृतीया से ही आकाश की तरफ देखना प्रारम्भ कर दिया था कि कहीं पर बादल आते हुए दिखाई देते हैं क्या? ज्यों समय आगे गुजरता गया त्यों-त्यों प्रतीक्षा अधिक से अधिकतर होती जाती थी। प्रकार से प्रतीक्षा करते हुऐ शून्य में देखते हुए लोगों ने ज्येष्ठ आपाढ,श्रावण,भादवा तथा आशोज भी व्यतीत कर दिया किन्तु कहीं भी आकाश से जल की एक भी बून्द नहीं टपकी।

 सम्पूर्ण मण्डल में भारी आकाल पड़ा इस दौरान न तो कहीं बिजली चमकी और नही कहीं गर्जना सुनाई दी। सम्पूर्ण दुनियां में त्राही-त्राही होने लगी। दुर्भिक्ष पङ जाने से दुनिया भूख मरने लगी। कई कई जीव गरीबी के कारण बहुत दुखी हो गये थे। भूख का दुख कब तक सहन किया जा सकता है ? कहीं से भी अन्न मिलने की सम्भावना नहीं दिख रही थी।

जब तक अन्न कोठे में था तब तक तो जैसे तैसे समय को व्यतीत किया जा सकता था लेकिन अन्न का ज्यों ही अभाव आ जाता है,कोठे खाली दिखतें है तो यह पेट भी दुगुना भूखा हो जाता है। ऐसा ही चारो और हाहाकार मच गया था।

 भूख से मरेंगे इसमें कुछ भी संशय नहीं है । कुछ लोगों के पास थोडा कुछ गुजारे लायक था तो भी वो हुपाकर बैठ गये थे । इस समय तो भूखा रह लेंगे लेकिन आगे तो काम आयेगा । अज्ञानी कृपण लोग |अन्न पास में होते हुए भी भूख मरने को तैयार थे ।

 गाय पशु भी तो काल की दशा में भूख के कगार पर पहुँच चुके थे उनके मालिक स्वयं हो भूखे रहेंगे तो उन निरीह पशुओं को कौन खिलायेगा । फिर वन में विचरण करने वाले जीव तो कहीं कुछ न कुछ अपनी जिवारी के लिये हासिल कर ही रहे थे , क्योंकि पशु स्वभावतः संग्रह नहीं करता है। वह तो वर्तमान में जीता है ।

आज ठीक है, यह समय ठीक है, वैसी कल की चिन्ता नहीं है कल के लिये न तो संग्रह करेगा और न ही कल के लिये जियेगा , इसलिए मनुष्य की अपेक्षा पशु सुखी है। किन्तु मानव इस |सिद्धांत के विपरीत है । आज में नहीं जीना कल के लिये आज जी रहा है परन्तु कल का कुछ भी पता नहीं है। इसलिये मानव पशु से ज्यादा दुखी है ।

कल क्या होगा , आज तो ठीक ही है ।इस प्रकार से सौ वर्षों के लिये पहले से ही जुगाङकर लेने की कोशिश में जीता है । यही दुख का कारण भी है । कुछ लोगों के पास तो आज के लिये भी खाने को कुछ नहीं था, कल की आशा क्या करे। अन्य कुछ लोगों ने अन्न का संग्रह कर लिया था कल के लिये भी आज भूखे रह लेगें किन्तु कल से पेट भरकर खायेगे ।यह अव्यवस्था चारों और फैल गयी थी । उन्हे लूट-पाट का खतरा भी सता रहा था, भूखा आदमी क्या नहीं कर सकता है इस प्रकार से इस मरूदेश में रह कर जीना तो कठिन था ।

 कुछ गांवों के लोग एकत्रित हुऐ और विचार करने लगे- भाइयों ! क्या करे कैसे जियेंगे ? यहाँ पर रहने से तो भूख मर जायेंगे, हमने सुना है कि यहां से बहुत दूर मालवा देश है, वहां पर प्रत्येक वर्ष अच्छी वर्षा होती है, कभी अकाल नहीं पड़ता है । यदि हम लोग जीने के लिये यह अपनी मातृभूमि – देश छोडकर मालवा चले जायेंगे तो कैसा रहेगा? हम जानते है कि अपनी मातृभूमि छोडना कष्टदायी है किन्तु 

प्राणों की रक्षा करने का भी तो अपना प्रथम कर्तव्य है, वैसे तो श्री रामजी ने कहा भी है।

 यद्यपि स्वर्णमयी लंका , न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्म भूमिश्च , स्वर्गादपि गरीयसी ।।

कुछ गांवों के लोगों ने एक समूह बना कर अपने -अपने छकडों, ऊँटों पर सामान लाद कर के समूह रूप से गायों आदि पशुओं को आगे करके रवाना हुए।वे लोग समराथल के नीचे के मार्ग से होकर जा रहे थे।

जाम्भोजी ने समराथल के ऊपर से देखा कि इतना बड़ा समूह जा रहा है यह देश छोडकर, इस प्रकार से तो यह सम्पूर्ण देश ही खाली हो जायेगा। मैं तो देख रहा हूँ कि ये तो सभी प्रहलाद पंथी जीव है ।ह तो चेताना है, ये ही यहां से चले जायेंगे तो फिर मेरा यहां इस देश में आना इतने वर्षों तक यहां पर रहना क्या होगा? ये लोग थोडी सी विपति आने से ही व्याकुल हो गये है। आगे मैं देख रहा हूँ, यहां के निवासियों के लिये सुनहरा अवसर है, इनको रोकना चाहिये ।

ऐसा विचार करते हुऐ श्री देवजी सम्भराथल से नीचे उतरे और उनके मार्ग को रोककर खड़े हो गये । और उनसे कहा – भाई लोगो ! ठहर जाओ ! आगे मत बढी | मैं तुम्हारी सहायता करने आया हूँ, मैं जानता हूँ, तुम भूखे हो और भूखे भजन न होय गोपाला लेलो अपनी कंठी माला।

लोगों ने कहा- महाराज ! आप हमें क्यों रोक रहे हों ? यहां आप देख नहीं रहे हो भयंकर अकाल पड़ गया है , हम लोग मालवे जा रहे है आपके पास देने को कुछ है क्या? जो हम लोगों की भूख मिटा सके।आप तो स्वयं ही हमारे गृहस्थी के आधार पर जीवन जीते हैं, हमारे घर से ही आपको अन्न मिलता है।आप कहां से इन सभी को खिलाओगे? हम आपको जानते है। खास शिव भण्डारी बिना यहां अत्र की पूर्ति होना असम्भव ही है।

 सिद्धेश्वर जी ने कहा हे लोगों ! आप ऐसी छोटी बाते मत करो । मेरे पास सब कुछ है। तुम यहां से चले जाओगे तो क्या अकाल समाप्त हो जायेगा? क्या इस समस्या का समाधान हो सकेगा? यदि हो जाता है तो आप भले ही चले जाओ , क्या आप लोग बता सकते हो कि तुम्हारे इस देश में अकाल क्यों पड़ा?

हे महाराज ! हमें तो इस बात का ठीक से पता नहीं है किन्तु सुनतें है कि हमारा कोई पाप है जिस वजह से इन्द्र देवता हमसे रूठे है वर्षा नहीं होती है अकाल पडता है। देवजी ने पूछा- यह बतलाओगे क्या? कि कोनसा पाप है जिससे इन्द्र देवता रूष्ठ हो जाता है ? तथा वर्षा नहीं होती है । यह कहना कठिन है। महाराज ! आप ही बतलाये तो ठीक होगा सिद्धेश्वरजी ने बतलाया कि सुनो – तुम लोगो ने वृक्ष काट लिये है , इस धरती को नंगा कर दिया है , ये वृक्ष ही वर्षा लाते है , ये वृक्ष ही तुम्हारे जीवन का आधार है, तुमने अपने मूल का ही छेदन कर दिया है। तो अब कैसे फूलोगे फलोगे ?

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 जहां पर भी हरियाली होगी वहाँ पर वर्षा होगी, तथा जहाँ पर भी वर्षा होगी वहाँ पर हरियाली होगी। ये एक दूसरे के पुरक है, किन्तु मानव ने इस प्रकृति में विकृति पैदा कर दी है जो ठीक प्रकार से एक दूसरे के सहयोगी बन कर के खुशहाली लाते थे वे अब विकृत हो गये है, एक दूसरे से रूठ गये है यह सभी कुछ कार्य तो तुमने ही किया । यही तुम्हारा पाप है। जहां पर वन होगा वहीं पर मानव, पशु पक्षी आदि बहुतायत से होंगे, सुखी जीवन व्यतीत करेंगे।

दरखत जब अपनी स्वांस छोडता है तो उसे पशु, पक्षी , मानव आदि ग्रहण करके पुष्ट होते है । तथा मानव पशु पक्षी आदि अपनी स्वांस छोडतें हैं उसे पीकर वृक्ष पुष्ट होते हैं । इस प्रकार से एक दूसरे का गहरा सम्बन्ध है एक के बिना दूसरा जीवित नहीं रह सकता । इसलिये तुम लोगों ने हरे वृक्ष काटकर बहुत ब़ अपराध किया है इसी पाप का फल तुम लोग भोग रहे हो ।

 दूसरा कारण यज्ञ भी है जहां पर यज्ञ होगा वहाँ पर इन्द्र वर्षा करेगा तुम लोगों ने यज्ञ की जगह तंबाकू, चरस , अफीम , गांजा आदि के धुंए से पर्यावरण को दूषित किया है । देवता यज्ञ में उठी है यज्ञ धूम की पवित्र सुगन्धी ग्रहण करतें है, वे तुम्हे वर्षा के द्वारा तृप्त करते है । परस्पर जो देवता व मान

का पवित्र भाव था वह यज्ञ न करके तुमने तोङ दिया है । इसे पुन: स्थापित करो तभी तुम्हारे यहाँ पर वर्षा होगी , कभी अकाल नहीं पड़ेगा । यही तुम्हारा दूसरा सबसे बड़ा पाप है इससे वर्षा नहीं हो रही है ।

 उपस्थित जन समुह ने कहा – महाराज ! आपने जो ज्ञान की बाते बतलाई है ये हमें अच्छी लगी है किन्तु भूख तो अभी लगी है । इसका कोई तुरन्त इलाज है तो अभी बतलाओ ? कब वृक्ष लगेगें व कव वर्षा होगी , कब हमारे खेत निपजेंगे, कब हमारी भूख मिटेगी ? इस समय यज्ञ करने के लिये भी हमारे

पास कुछ नहीं है । यज्ञ भी तो समय-समय पर किया हुआ फलदायी होता है । अब तो वर्षा का मौसम भी चला गया है ये कार्य भी तो समय पर करने के है । इस समय तुरन्त कोई इलाज बताओ जिससे हमारी दूध की निवृति हो सके।

 जम्भेश्वर जी ने कहा- हे भक्तो ! आप इस समय चिन्ता न करे, मेरे अन्न का ढेर है, मैं आपको भर पेट भोजन दूंगा, ये तुम्हारे पशुधन भी यहाँ पर भूखे नहीं रहेगें इन्हें घास जल आदि मिलेगा यह सम्भराथल जंगल सभी को सब कुछ देगा । यदि आप लोगों को विश्वास नहीं हो रहा है तो मेरे साथ सम्भराथल पर चलो, मैं तुम्हे अन्न की ढेरी दिखाता हूँ।

ऐसा कहते हुए उन लोगों को सम्भराथल पर ले गये और सात अन्नों की सात अलग-अलग ढेरीयां दिखाई और कहा कि जिसको जितना अन्न चाहिए यहां आकर उतना अन्न ले जाइये । किसी को भी भूख से मरने की नौबत नहीं आने दी जायेगी ।

 लोगों ने जाकर अन्न की ढेरी तो अवश्य देखी किन्तु वे तो छोटी-छोटी ही थी । आपस में काना फू सी होने लगी- इतने लोगों के लिये ये ढेरीयाँ ज्यादा दिन नहीं चलेगी। इन बाबा लोगों का क्या भरोसा न जाने कब यहाँ से उठकर चल पडे? हमें पता भी नहीं चलेगा। तब हम क्या करेंगे? आगे के रहेगें न पीछे के । वैसे ये बाबाजी झूठ तो नहीं बोलते हैं तथा इनको झूठ बोलकर हमसे लेना भी क्या है ? किन्तु अर्थ लेने से पहेले ये बाते स्पष्ट कर लेनी चाहिये ।

 जम्भदेवजी से उपस्थित उन लोगों ने पूछा- हे महाराज ! हमें इन छोटी-छोटी ढेरीयों को देखकर तो सहसा विश्वास तो नहीं हो रहा है, इधर जनता को देखतें हैं तो बहुत ही ज्यादा है । अन्न बहुत ही कम है क्या सभी लोगों के लिये प्रयाप्त होगा ? नया अन्न खेतों में निपजने में तो बहुत ही देरी है जब तक हमारे खेतो में नया अन्न निपजेगा तब तक दोगे या बीच में ही “””””” गुरु देव ने कहा- आप लोग निश्चित रहो , मेरे पास एक बहुत बडा साहूकार है वह देगा।

उससे बढकर दुनियां में साहूकार कोई नहीं है ये तुम्हे छोटी -छोटी ढिगली दीख रही है किन्तु यह अखूट है ।ज्यों-ज्यों आप ले जायेंगे त्यों-त्यों ये बढती जायेगी । ज्यों ही ज्यादा ले जाओगे त्यों ही ज्यादा बढ़ेगी ।

मैं तुम्हारे सामने सच कहता हूँ कि आप लोग मेरे कहने अनुसार चलोगे तो तुम्हे एक दो वर्ष नहीं सदा- सदा के लिये अन्न देता रहूँगा , तुम नहीं जानते कि मैं कौन हूँ मैं ही तो सृष्टि का कर्ता वह साहुकार हूं तथा पालन पोषण कर्ता स्वयं विष्णू हूँ, तुम्हारे उद्धार हेतु यहाँ पर आया हूँ अब तुम लोग अपने जीवन का भार मेरे उपर छोडकर निश्चित हो जाओ । अपने – अपने गॉँवो को वापिस लौट जाओ । जो भी आपके साथ यहाँ पर नहीं आये है । उन्हे भी यह शुभ समाचार दे देना ।

इस समय तो आप लोग अन्न जल द्वारा भूख -प्यास मिटाओ, जब तुम लोग तृप्त हो जाओगे तो मैं तुम्हे कुछ अन्य ज्ञान ध्यान की बाते बताऊंगा । नित्य प्रति यहाँ से अन्न ले जाया करो, ऐसा कहते हुए उन लोगों को तो वापस लौटा दिया ।

 कुछ ही लोग यहाँ पर चलकर आये हैं किन्तु अन्य गाँवों की स्थिति भी अच्छी नहीं है वहाँ जाकर भी देखना चाहिये कि किस प्रकार से लोग अपना जीवन यापन कर रहें है। धर्म कर्म के बारे में लोगों का क्या ख्याल है, ऐसा विचार करके श्री जम्भदेवजी सम्भराथल से थोडी दूरी पर ही स्थित बापेऊ गाँव पहुंचे।

बिश्नोई पंथ की स्थापना भाग 2

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