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दुदोजी को परचा देना

दुदोजी को परचा देना

दुदोजी को परचा देना
दुदोजी को परचा देना

    जम्भेश्वर जी ग्वाल बालों के साथ गऊ आदि पशु धन को लेकर वन से लौट आये थे। बालक वहीं जंभेश्वर जी के पास खेल रहे थे। क्योंकि गऊ आदि पशुओं को पानी पिलाने का कार्य जाम्भोजी के ही अधीन था। कुएँ पर पानी पीने की जगह सीमित थी, पशु धन अत्यधिक था। गाय, भैंस,बकरी,ऊँट आदि।पानी तो सभी को ही पिलाना है, सभी प्यासे हैं, किन्तु पहले कौन पियेगा, प्रतीक्षा कौन करेगा। सभी इकट्ठे तो पानी पी भी नहीं सकते। इसीलिए बारी बारी से जल पिलाने का कार्य जाम्भोजी कर रहे थे।    

जो लोग पशुपालन करते हैं, वे ही जानते हैं कि यह कार्य कितना कठिन है। न तो वहाँ पर कोई अन्य सहयोगी है और न ही पास में कोई लट्ठी-डंडा है और न ही कोई भागदौड़ हो रही है, केवल हाथ की अंगुलियों के इशारे से पशुओं को पानी पिला रहे हैं। यह पींपासर वासियों के लिए तो कुछ भी अचम्भे की बात नहीं थी, यह तो नित्यप्रति होता था किन्तु किसी अजनबी के लिए तो अवश्य ही आश्चर्यजनक घटना ही थी। वह अजनबी भी कोई साधारण आदमी नहीं था, जोधपुर नरेश राव जोधा का पुत्र दूदा था।    

पीपासर के कुएँ पर एक तरफ तम्बू लगाकर बैठा हुआ, अपने भाग्य को कोसता था। कहीं कोई सहारा भी नहीं था। न ही कहीं कोई प्रकाश दिखाई देता था, चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देताथा। यहाँ पीपासर में कुछ अलौकिक ज्योति का दर्शन करके अपने को धन्य भागी मान रहा था।    वि.सं. 1519 में दूदे के बड़े भाई वरसिंग ने दूदे को देसोटो दे दिया था।

अपने देश राज्य से निकाल दिया था। वरसिंग और दूध अपने पिता जोधा की आज्ञा से मेड़ते का राज काज देखते थे किन्तु दोनों भाईयों में आपस में नहीं बनी। बड़े भाई ने छोटे भाई को निकाल दिया था। दूदा दुःखी होकर अपने बड़े भाई बीका के पास जा रहा था। थोड़े से सिपाही साथ में तथा तम्बू घोड़ा आदि थे। और तो राजकुमार के पास कुछ भी नहीं था। यदि पास में राजपाट,भूमि, धन आदि होते तो अहंकार में अन्धा हो जाता यहां पीपासर के कुएँ पर कुछ भी नहीं देख पाता।      

जब भगवान अपने भक्त को अपने बास बुलाते हैं तो उसका धन छीन लेते हैं ताकि अहंकार से निवत्त हो सके, और कुछ देख सके, कुछ सुन सके। यही दूदे के साथ हुआ था। दूदे ने देखा कि ये अबोल पश भी एक साथ बड़े प्रेम से खड़े हुए अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। क्योंकि इनके सामने कोई देव खडा है किन्तु हम मनुष्य इतनी सी मर्यादा को नहीं समझ पा रहे हैं, एक दूसरों से झगड़ने को तैयार हैं, पहली हम, पहले हम, यह मेरा है, मेरा ही यहाँ अधिकार है।

भाई-भाई आपस में झगड़ते हैं। एक दूसरो को मारने मरने को तैयार हो जाते हैं, यह कैसा मानव जीवन है। इन पशुओं की तरह हम भी यदि किसी एक परम पुरुष की शरण लेते तो झगड़ा समाप्त हो जाये। हमसे भी बड़ा कोई ओर है जो हमें श्वांस देता है। भोजन, अन्न, जलादि देकर हमारा जीवन बचाता है तो कुछ शांति का अनुभव किया जा सकता है। अन्यथा तो हम इन पशुओं से भी गये गुजरे हैं। इन पशुओं ने परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त किया है। दूदा संध्या, पूजा-पाठ करके निवृत्त हुआ और इस आश्चर्यजनक घटना को ध्यान से देखता रहा।      

दूदे ने देखा कि एक बालक खेजड़ी के पेड़ के नीचे बैठा हुआ हाथ की अंगुलियों से इशारा दे रहा है, जब सात अंगुली दिखाता है तो उन सैंकड़ों पशुओं में से सात गायें ही निकलकर जाती है। बाकी सभी जहां है, वहीं खड़ी रहती है। दुबारा दस अंगुली दिखाता है तो दस बकरियाँ ही जाती है, बाकी वहीं बैठी या खड़ी रहती है। पाँच अंगुली के इशारे से पांच भैंसे जाती है सभी पशु यंत्रवत खड़े रहते हैं, बारी-बारी से जल पीते हैं । वापिस आकर शीश झुकाते हैं। दूसरी तरफ तृप्त होकर खड़े हो जाते हैं। ज्यूं छक आई सारी।      

दूदे ने हाथ जोड़कर अपने तम्बू में बैठे ही बैठे आदेश किया। यह तो अवश्य ही हमारे ईष्ट देवता हैं। हम लोग अम्बा, शक्ति, लक्ष्मी के पुजारी हैं, यह तो अम्बा के ईश्वर ही हैं, इन्हें प्रणाम कहना उचित्त ही होगा। मेरे भाई ने तो मुझे निष्कासित कर ही दिया, अब मेरा सहारा कौन है? इनके निकट जाऊँ और अपनी व्यथा कथा कह दूं।

जब ये पशु भी इनको आज्ञा का पालन करते हैं तो मेरा भाई वरसिंग क्यों नहीं मानेगा? यहाँ तो मेरा कार्य सिद्ध हो जायेगा। मुझे किसी अन्य भाई की सहायता लेकर खन खराबा करने की शायद आवश्यकता नहीं पड़ेगी। किन्तु यहाँ पर तो सम्पूर्ण गाँव के लोग मुझे देख रहे हैं। यहीं पर जाकर इनके चरण पकड़ लूं और मेरा कार्य न बने तो अपमान ही होगा। ये लोग मुझ जैसे दुःखी व्यक्ति का दुःख और भी बढ़ा देंगे, ये लोग मेरी हँसी उड़ायेंगे। बिना विचारे झटिति आगे कदम न उठाये, यदि कार्य सफल न हो तो लोगों में हँसी का पात्र बन जाता है।      

अभी तो यह छोटा बालक ही है, ग्रामपति लोहटजी ठाकुर का बेटा है. मैं एक राजपुत्र हूँ।आयु,विद्या,बल में मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ, यहाँ मिलना ठीक नहीं होगा, अब मैं अपना पूजा-पाठ कार्य पूरा कर लेता हूँ। यह बालक आठवें चराने वन में जायेगा वहाँ एकान्त में मिलूंगा और अपना दुःखड़ा सुनाऊंगा।    गायें जल पीकर जंगल में चरने हेतु चल पड़ी थी, पीछे-पीछे जाम्भोजी भी चल पडे थे।

दूदे ने देखा कि अब तो गांव से बाहर चले गये हैं किन्तु आँखों से ओझल नहीं हुए हैं अभी थोड़ी दूर ओर जाने दा, मैं अपनी तुरंग बछेरी पर सवार होकर पंहुच जाऊंगा। दूदे ने किसी साथी को कुछ भी नहीं कहा आर अपनी मनपसंद तेजस्वी घोड़ी पर सवार होकर उतर की तरफ जिधर जाम्भोजी गये थे उधर ही घोड़ी हाक दी।  

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आगे-आगे गऊएं, पीछे-पीछे जाम्भोजी तथा उनके पीछे राव दूदा, छेती-फासला उतना ही, जितना |डामर से था। न तो आँखो से ओझल हुए हैं और न ही पंहुच सके हैं। दूदे ने सोचा- आज मेरी घोड़ी दौड़ नहीं रही है, मैं पंहुच नहीं पा रहा हूँ, घोड़ी के चाबुक मारा कि जल्दी पँहुच जाऊं, अभी पकड़ लं, पोडी छलांग मारने लगी, वायु की भांति तेज दौड़ने लगी, किन्तु ज्यों ज्यों घोड़ी भागने लगी त्यों-त्यों दूर की दर श्रीदेव दिखाई देने लगे।

अब तो कहीं आँखो से ओझल न हो जाये, फिर मैं कहीं का भी नहीं रहूंगा, अपने साथियों को तो छोड़ आया मैं अकेला क्या कर सकूंगा?      वेद भी जिनके बारे में नेति-नेति कहते हैं, मैं मूर्ख गैवार उनका अपनी शक्ति द्वारा है ज्यों-ज्यों अपनी अल्प शक्ति के द्वारा कैसे पार पा सकता उस महान को पकड़ने का प्रयत्न करूंगा त्यों-त्यों डूबता ही जाऊंगा, दूर ही होता चला जाऊंगा।

उनकी प्राप्ति हेतु तो अहंकार को त्यागना ही होगा। समर्पण भाव से शरण ग्रहण करनी ही होगी, तभी कहीं पार पाया जा सकता है। वहाँ तक पंहुचने की योग्यता आ सकतो है। अभी तो मैं उनकी कृपा का अधिकारी ही नहीं बन पाया हूँ। अभिमान को छोड़कर ही पंहुचा जा सकता है। मेरी यह तेजस्वी घोड़ी, पसीने में तरबतर हो गयी है।

मैं इसके ऊपर सवार भी अत्यंत खिन्न हो गया हूँ, इस प्रकार की सवारी से क्या लाभ जो मंजिल तक नहीं पंहुचा सके, ऐसा विचार करके दूदा घोड़ी से नीचे उतर गया। परमात्मा से मिलना है तो नीचे उतरना ही होगा। अपनी अहंकार ममता को त्यागना ही होगा। यही परमा के मिलन में बाधा बनती है।    

दूदे ने अपने अंगोछे से दोनों हाथ बाँध लिये, हाथ जुड़े रहे, वहाँ पंहुचू तब तक खुल न जाये, बार बार जोड़ना,तोड़ना ठीक नहीं है एक बार जुड़ गये तो फिर जुड़ ही गये, पुनः टूट न जाये, पैरों के जूते उतार दिये, नगे पाव, घोड़ी को पीछे खींचते हुए थोड़ी दूर ही भागे थे कि सम्भराथल पर भगदें भेष में दूदे ने जाम्भोजी के दर्शन किये।  

भगवां भेख देखकर दूदे ने आदेश-प्रणाम किया और अपने सिर को झुकाया। सिर की पगड़ी उतारकर सद्गुरु के चरणों में रख दी, स्वयं समर्पित हो गये, पीछे कुछ भी नहीं रखा जो कुछ है वह आपके ही चरणों में है, मेरा अपना कुछ भी नहीं।  

पाघ मेल्हरू चरन पकरे, दे मन्त्र शिष कीजिये।

 कृपा रावरी पाऊं अटल पद, देख दरशन जीजिये।

 देहुं भेख अलेख मो कहुँ, जगत में जस लीजिये।प

जम्भ नरेश फिर करि, भेख मोरा राखीजिये।

   जाम्भोजी ने कहा- हे दूदा! तुम वापिस जाओ। मेड़ता के राजा बनो। प्रजा का पालन-पोषण करो। दूदा बोला-है महाराज! मेरे बड़े भाई ने मुझे देश निकाला दे दिया है, मेरा मुँह काला करके मुझ निरपराधी को निकाला है। अब मैं कैसे वापिस जाऊं, यदि आपकी कृपा हो तो यह असंभव कार्य भी संभव हो सकता है। अन्यथा तो मेरा अन्त होना निश्चित ही है।      

जाम्भोजी ने कहा- हे कि! मेरी बात पर विश्वास करो, आज से तुम नरेश हो, मैनें जो कह दिया वही होगा। यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास नहीं हो तो तुम यहाँ से वापिस जाओगे तब नागौर के उतर दरवाजे पर तुम्हें दो घुड़सवार मिलेंगे, वे तुम्हें वापिस बुलाने के लिए आयेंगे, वहां से आगे बढ़ोगे तो मूण्डवा के लाब की पाल पर तुम जहाँ तम्बू गाड़े गए, वहीं तुम्हें अपार स्वर्णधन मिलेगा। रूपयों आदि के टोकणे मिलेंगे, वह तुम ले लेना वह तुम्हारा ही धन है।  

दूदा बोला- है महाराज। मेरा भाई मुझ पर क्रोधित हुआ है, अभी भी मुझे खाने के लिए दौडता है यह मैं देखता हूँ? यह कैसे सम्भव होगा?    जाम्भोजी बोले- हे दूदा! सुनो! जब से तुम वहाँ से छोड़कर आ गये हो तभी से वह विनम्र हो गया। है। यहाँ पर आने से तुम्हारा भी गर्व गलित हो गया है। तुमने अपनी अहंकार की प्रतीक पगडी समर्पित कर दी है, यह सभी कुछ नम्रशीलता से ही संभव हुआ है।

दोनों ओर से पत्थर से पत्थर टकराता है तभी आग प्रकट होती है। आग से जल टकराये तो आग बुझ जाती है। रंग को देखकर रंग बदलता है। यह सभी कुछ कृष्ण चरित्र से ही संभव हुआ है।      

दूदा ने पुनः प्रार्थना की कि हे गुरुदेव! आप मुझे अपने भेख का चिन्ह स्मृति के रूप में भेंट दौजये। वह तो मेरे यहाँ शान्ति-शक्ति के प्रतीक रूप में रहेगा, तथा आगामी आने वाले शत्रुओं का मैं सामना कर सकू इस हेतु मुझे शस्त्र प्रदान कीजिये आपकी अपार कृपा होगी तो मैं न्यायपूर्वक राज्य करते हुए प्रजा का पालन कर सकें, विधर्मियों से लड़ने हेतु मुझे ऐसा सम्बल प्रदान कीजिये।  

जम्भेश्वर कृपा करी, लियो भेख सिगार। काठ मूंठ कर्ता करी, तद सुँपी तरवार।

पलटेउ मूंठ पलक में, सकल गएउं भ्रम भाज। खाडे भेख जूं राखहो, तब लग अवचल राज।।

  जाम्भोजी महाराज ने दूदे को अपना भेख-वस्त्र दिया तथा एक केर वृक्ष की लकड़ी दी और कहा कि यह केर की लकड़ी ही तुम्हारे लिए तरवार है। जब तुम इसे कार्य हेतु प्रयोग करोगे तो यह खाण्डा-तरवार बन जायेगा।

ये दोनों वस्तुएं जब तक रखोगे तब तक तुम्हारा राज्य अडिग रहेगा। राव दूदा ये दोनों वस्तुएं लेकर सादर प्रणाम करते हुए, अपने को कृत्य कृत्य का अनुभव करते हुए वापिस मेड़ते के लिए प्रस्थान किया।  

दूदा को मार्ग में दो घुड़सवार बुलाने वाले मिल गये, मूण्डवा के तालाब पर सोने के भरे हुए चरू प्राप्त हुए जैसा श्रीदेव ने कहा वैसा ही फल प्राप्त करके वापिस मेड़ता पंहुच गये। वहाँ पर श्री देव की प्रेरणा से वरसी ने दूदे का स्वागत किया और उन्हें राज्य सौंप दिया। राव दूदा ने बहुत समय तक राज्य किया। जम्भेश्वर जी की आज्ञा का पालन किया।

दुदोजी को परचा देना,

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