जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 4

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         जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 4

जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 4
जाम्भोजी का जैसलमेर पधारना भाग 4

पांचवी आज्ञा यह है कि जो लोग विश्नोई बन गये है वे लोग आप के पास न्याय हेतु आये तो उन्हें | न्याय देना। विश्नोइयो से जगात – कर नहीं लेना उन्हें माफकर देना क्योंकि ये लोग पूर्णतया धार्मिक है ये लोग हरे वृक्ष नहीं काटते, जीवों को नहीं मारते और नहीं मारने देते। खेती करते है,यज्ञ करते है,इससे राज्य में खुशहाली बनी रहती है राज्य दिन दूना रात चौगुना अभी वृद्धि को प्राप्त होता है। यह पांचवी आज्ञा है इसका पालन करो।

इन पांच नियमों पर चलने का जेतसी से संकल्प करवाया देवजी ने कहा – हे राजन! यदि तू इन नियमों का पालन करते हुए राज शासन चलायेगा तो तुम्हारा इह लोक एवं परलोक दोनो ही बन जायेगे।

 हे वील्हा! उस प्रकार से जैसलमेर गढ के अधिपति के ऊपर धर्म न्याय एवं मर्यादा की छत्र छाया की। देवजी द्वारा जीवो की रक्षा का दिया हुआ वचन पालन किया । न जाने कितनो जीवो रक्षा जेतसी के यज्ञ में हुई तथा आगे के लिये भी जीव रक्षा का बीड़ा उठाया। धन्य धन्य है जीवा ध्णी जो पापी पर प्रहार करते है।

 जेतसी ने देवजी की आज्ञानुसार सभी जगह ढिंढोरा पिटवा दिया, आज से आगे अब कोई राज्य में जीव हत्या नहीं करेगा, कोई बावरी शिकारी आदि जीव नहीं मारेगे। यह घोषणा सभी ने सुनी और राजा व प्रजा दोनो ने ही बहुत बहुत धन्यवाद किया। मरते हुऐ जीवो को बचाया यह कार्य तो सतगुरु के आने से ही संभव हो सका।

 वील्हा उवाच – हे गुरुदेव ! सुना है कि उस समय एक कन्या का विवाह भी किया था। एक बारात  का स्वागत राजा ने किस प्रकार से किया था । क्योकि अनावश्यक प्राचीन परंपरा के तो जाम्भोजी विरोधी | थे। उन्हें तोड़ने की सलाह देते थे। जाम्भोजी का सिद्धान्त तो प्रगतिशील था। जेतसी के यहां नयी परंपरा कौन सी प्रारम्भ की, वह कैसी परंपरा थी मुझे बतलाने का कष्ट करे।

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नाथोजी उवाच – हे शिष्य ! जब मांसाहार का पूर्णतया त्याग करवा दिया तब जेतसी ने बारात का स्वागत शाकाहारी भोजन से किया। अनेको प्रकार की मिठाइया शाक पात यही मानवोचित एवं प्रिय भोजन है यही करना उचित था वही जेतसी ने किया। भोजन का समय होने पर मेहमानो को आमन्त्रित करके बुलाया उन्हे पंक्ति लगा कर के बिठाया गया। अलग अलग थालिया रखी गयी। भोजन वितरण करने वाले सेवको ने झूठन से बचा कर भगवान के लगा हुआ भोग प्रसाद के रूप में प्रदान किया।

भगवान का प्रसाद मान कर भोजन करने से उन आये हुऐ आगन्तुको का मन शुद्ध पवित्र हुआ। जिस यज्ञ को श्री देवजी ने स्वंय जैत संमद की प्रतिष्ठा हेतु किया था उनके प्रसाद का तो फिर कहना ही क्या था जो भी भोजन करते गये शुद्ध पवित्र होते गये यही तो उनके चमत्कार की महिमा थी।

 भोजन के पश्चात् विवाह का कार्यक्रम हुआ मुहूर्त के अनुसार चंवरी मांडी गयी। चारो तरफ खंटी रोप कर सूत फिराया गया, घड़ा जल का भर कर वेदी पर रखा गया। वेद मन्त्री द्वारा कलश की स्थापना हुई वासुदेव की वन्दना द्वारा विवाह का कार्य प्रारम्भ हुआ। अग्नि को प्रज्वलित करने के लिये गोत्राचार पढा गया। हवन प्रचंड होने पर वैदिक ब्राह्मणों ने वेद मन्त्र पढ कर यज्ञ में गो घृत को आहुति दी गयी। जैसा श्री देवजी ने बतलाया उसमें फर्क नहीं आने दिया। प्रथम ओउम शब्द का उच्चारण किया।

विप्रो ने वेद मन्त्रों का सस्वर उच्चारण किया। सुनने में कर्ण प्रिय लगते थे। महिलाऐ सोलह श्रृंगार करके मंगल गीत गाने लगी। कन्या एवं दूल्हे का हथलेवा कर शाखोचार पढकर के कन्या का विवाह राजा ने विधि पूर्वक किया। अन्त में अग्नि की परिक्रमा कर के फेरा कार्य पूर्ण किया।

 अपनी शक्ति के अनुसार रावण ने कन्यादान किया। जो वहां उपस्थित दान देने के अधिकारी थे उन्हें यथा योग्य दान देकर संतुष्ट किया। सभी याचको ने सन्तुष्ट होकर जेतसी को धन्यवाद दिया जिस प्रकार से पांडवों ने यज्ञ किया, पांडवों के यज्ञ में भगवान कृष्ण उपस्थित थे उन्हे आशीर्वाद दे रहे थे। जेत संमद की प्रतिष्ठा हुई, राव जेतसी ने अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न किया, सभी कार्य देवजी की कृपा से पूर्ण हुऐ।

रावलजी ने विनती करते हुए कहा- आपकी अति कृपा से में कृतार्थ हुआ। किन्तु मेरी एक इच्छा है। कि आप अपने शिष्य विश्नोई को मेरे राज्य में बसाओ। उनकी प्रेरणा से हमारी प्रजा भी सुखी क्रियावान हो सकेगी। हे देव ! आप तो सम्भराथल चले जायेगे किन्तु मैं आपके शिष्य का दर्शन करके कृतार्थ हो जाऊंगा।

 सतगुरु देव ने जमात में खबर पहुचाई कि आप में से यहां जैसलमेर बसने के लिये कौन तैयार है? जमात में से लक्ष्मण एवं पाण्डू गोदारा ने सतगुरु की बात को सहर्ष स्वीकार किया। और लक्ष्मण पाण्डू को खरीगे गांव में बसाया। धन्य है ऐसे भक्त जन जो गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करके अपने जन्म को सफल कर लिया।अपनी जन्म भूमि छोड़ कर लक्ष्मण पाण्डू खरीगें गांव में सदा सदा के लिये बस गये।

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 देवजी ने कहा – हे जेतसी ! तुम्हारे राज्य में ये दो भक्त बसेंगे जिस राज्य में भक्त निवास करते है, जहां पर क्रिया कर्म संयम आदि नियमों का पालन होता है, विष्णु का जप, यज्ञ होता है उस राज्य में किसी प्रकार की विपति नहीं आयेगी। सदा खुशहाली बनी रहेगी। ऐसा धर्म का प्रभाव है। इस धर्म की नींव तुम्हारे राज्य में पड़ चुकी है।

जेतसी ने हाथ जोड़ कर देवता के आशीर्वाद को शिरोधार्य किया। कृष्ण चरित्र के प्रभाव को अपनी आंखो से देखा। स्वीकार किया कि यह जैसलमेर गढ मर्यादा में बंधा रहेगा तो कभी पलटेगा नहीं। पुनः रावल ने हाथ जोड़ कर विनती करते हुए कहा -हे देवजी ! आपकी कृपा से मेरा यज्ञ सफल हुआ। मुझे किसी प्रकार का कलंक नहीं लगा। मैने आपकी कृपा से अन्न धन बहुत ही खर्च किया किन्तु किसी बात की कमी नहीं आई। आपकी कृपा से दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही गयी हे देव ! जैसा आपने कहा वैसा ही मैंने किया।

आपके दर्शनसे मेरे पाप प्रलय हो गये। क्यों न होगा हमारा यज्ञ पूर्ण करने आदि गुरु साक्षात विष्णु हमारे यज्ञ में पधारे है। मेरा भाग्य बलवान है जो मैं आपका सेवक बना।

 रावल ने एक विनती करते हुए कहा – हे देव ! इस कलयुग में जीवो का उद्धार कैसे होगा। सुना है

| कि कलयुग में जीवो की मुक्ति नहीं होती। यह मेरी शंका थी उसका समाधान मुझे मिल गया। एक बार जाम्भा सरोवर का जल चलू भर पीलू तो मेरे सम्पूर्ण झंझट कट जायेगे। जन्मो जन्मो तक मुनि लोग यत्न करते हैं, धोती आसमान में अधर सुखाते है, कुण्डलिनी आदि जागृत करके योग करते है, कठिन तपस्या

करते हैं, उनको भी युक्ति मुक्ति संभव नहीं है किन्तु मेरा धन्य भाग है मुझे मुक्ति का वरदान मिला। आवागवण मिटाकर के श्री देव जी ने स्वर्ग – मुक्ति

का वरदान दिया।

रावण कहने लगा केवल मैं ही अकेला नहीं हूं, देव जी के कृपा पात्र दिल्ली का सिकन्दर लोदी, मद खां नागौरी, मेड़ते रा दूदा राव जोधपुर नरेश सांतल, चितौड़ का सांगा राणा, बीकानेर का लूणकरण, । नेतसी एवं अजमेर का महलूखान आदि अनेक राजा लोग कृपा पात्र बने।

हे वील्हा ! रावल जैतसी धन्यवाद का पात्र है जिन्होने जाम्भोजी की आज्ञा का पालन किया, और परोपकार का कार्य जाम्भोलाव तालाब खुदवा कर किया। विष्णु का जप करते हुऐ मुक्ति के पथ के पथिक बने। अपने राज्य में जीव हत्या बंद करवायी। जैसलमेर में यज्ञ करवाया, अपने राज्य में धर्म की नींव रखी।

रावल जी के प्रति देवजी ने शब्द सुनाया – हे रावल ! गोरख को प्राप्त करो, वह भी साक्षात विष्णु है। गोपाल को प्राप्त करो वह भी गोपालक विष्णु ही है। इस धरती पर बड़े बड़े उथल पुथल हुऐ हैं किन्तु हम तो ज्यो के त्यों ही है।हमारे आदि मूल भेद को कौन जानते है। रावलजी को शब्द सुना कर श्री देवजी साथरियो सहित विदा हुऐ। शब्द – गोरख लो गोपाल लो

  रावल जी ने अश्रुपूर्ण नेत्रो से एक पलक निहारते हुऐ विदाई दी। पुनः दर्शन होगे इसी आशा से अरावली अपने को संयमित कर के अपना कर्तव्य कर्म निभाया। श्री देवजी वापिस सम्भराथल पहुचें | सीरिया प्रसन्न चित हुए, सभी ने प्रणाम किया।

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Sandeep Bishnoi

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